₹3.70 crore sanctioned for Medaram Jatra 2026
संदर्भ:
हाल ही में भारत सरकार ने मेदाराम जात्रा 2026 के विकास और सफल आयोजन के लिए अतिरिक्त ₹3.70 करोड़ की धनराशि मंजूर की है। यह राशि जनजातीय कार्य मंत्रालय और पर्यटन मंत्रालय द्वारा संयुक्त रूप से जारी की गई है। यह उत्सव 28 जनवरी से 31 जनवरी 2026 तक आयोजित किया जाएगा।
मेदाराम जात्रा के बारे में:
- मेदाराम जात्रा, तेलंगाना के मुलगु जिले के ताडवई मंडल स्थित मेदाराम गाँव में चार दिनों तक मनाया जाने वाला एक द्विवार्षिक (हर दो साल में एक बार) उत्सव है। इसे ‘दक्षिण का कुंभ मेला’ और ‘जनजातियों का कुंभ’ भी कहा जाता है।
- मेदाराम जात्रा को सम्माक्का-सारलम्मा जात्रा के नाम से भी जाना जाता है, जो एशिया का सबसे बड़ा जनजातीय उत्सव है। इसे वर्ष 1996 में एक राज्य महोत्सव घोषित किया गया था।
- यह उत्सव 13वीं शताब्दी के काकतीय शासकों के विरुद्ध कोया जनजाति की दो महिलाओं, सम्माक्का और उनकी बेटी सारलम्मा के संघर्ष की याद में मनाया जाता है।
- प्रमुख धार्मिक रीति-रिवाज:
- प्रसाद (स्वर्ण): भक्त अपनी मन्नत पूरी होने पर देवी को अपने वजन के बराबर गुड़ (Jaggery) चढ़ाते हैं, जिसे स्थानीय रूप से ‘बँगारम’ (सोना) कहा जाता है।
- पवित्र स्नान: श्रद्धालु ‘जम्पन्ना वागु’ (गोदावरी की एक सहायक नदी) में स्नान करते हैं। मान्यता है कि जम्पन्ना (सम्माक्का के पुत्र) ने इसी नदी में युद्ध के दौरान प्राण त्यागे थे।
- अ-ब्राह्मणवादी परंपरा: यहाँ कोई स्थायी मंदिर या मूर्ति नहीं है। इसके बजाय, पेड़ों के नीचे स्थित मिट्टी के चबूतरों (गद्दे) पर पूजा की जाती है, जिसका नेतृत्व जनजातीय पुजारी करते हैं।
- भौगोलिक संदर्भ: मेदाराम ‘एतूरनगरम वन्यजीव अभयारण्य’ (Eturnagaram Wildlife Sanctuary) के भीतर स्थित है, जो गोदावरी नदी के कछार का हिस्सा है।
कोया जनजाति (Koya Tribe):
- भौगोलिक स्थिति: कोया जनजाति भारत की प्रमुख जनजातियों में से एक है, जो मुख्य रूप से तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़ और ओडिशा के पहाड़ी व जंगली क्षेत्रों (गोदावरी बेसिन) में निवास करती है।
- भाषा: ये ‘कोया’ भाषा बोलते हैं, जो द्रविड़ भाषा परिवार का हिस्सा है। कई क्षेत्रों में ये ‘गोंडी’ से मिलती-जुलती भाषा और तेलुगु का भी प्रयोग करते हैं।
- सामाजिक संरचना: कोया समुदाय पारंपरिक रूप से ‘गोटुल’ (Ghotul) जैसी संस्थाओं और कबीलाई स्वायत्तता के लिए जाना जाता है। इनका समाज पितृसत्तात्मक होता है।
- जीविका: ऐतिहासिक रूप से ये पोडु खेती (झूम कृषि/Shifting Cultivation) करते रहे हैं, लेकिन अब ये स्थायी कृषि और लघु वनोपज (जैसे महुआ, इमली) के संग्रह पर निर्भर हैं।
- धार्मिक विश्वास: ये प्रकृति पूजक हैं। इनका सबसे महत्वपूर्ण उत्सव मेदाराम जात्रा है, जहाँ ये अपनी पूर्वज वीरांगनाओं सम्माक्का और सारलम्मा की पूजा करते हैं।
- नृत्य: ‘पेरमकॉक आता’ (बाइसन हॉर्न डांस) इनका प्रसिद्ध पारंपरिक नृत्य है, जिसमें पुरुष जंगली भैंसे के सींगों से बना मुकुट पहनते हैं।
- संवैधानिक स्थिति: इन्हें अनुसूचित जनजाति (ST) का दर्जा प्राप्त है। गोदावरी नदी पर बनी पोलावरम परियोजना के कारण इस जनजाति का बड़े पैमाने पर विस्थापन एक प्रमुख समसामयिक मुद्दा है।

