161st birth anniversary of Lala Lajpat Rai
संदर्भ:
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 28 जनवरी, 2026 को ‘पंजाब केसरी’ लाला लाजपत राय की 161वीं जयंती पर उन्हें भावपूर्ण श्रद्धांजलि अर्पित की। प्रधानमंत्री ने उन्हें “मातृभूमि का अमर पुत्र” कहा।
लाला लाजपत राय के बारे में:
- प्रारंभिक जीवन
- जन्म: 28 जनवरी, 1865 को पंजाब के मोगा जिले के धुड़के गाँव में हुआ था।
- शिक्षा: उन्होंने लाहौर के गवर्नमेंट कॉलेज से कानून की पढ़ाई की।
- वैचारिक प्रेरणा: वे स्वामी दयानंद सरस्वती और आर्य समाज के सिद्धांतों से अत्यधिक प्रभावित थे। वे इटली के क्रांतिकारी मेजिनी को अपना राजनीतिक गुरु मानते थे।
- स्वतंत्रता संग्राम में भूमिका:
- ‘गरम दल’: लाला लाजपत राय भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के ‘गरम दल’ के प्रमुख स्तंभ थे। बाल गंगाधर तिलक और बिपिन चंद्र पाल के साथ उनकी तिकड़ी ‘लाल-बाल-पाल’ के नाम से विख्यात हुई।
- स्वदेशी आंदोलन (1905): बंगाल विभाजन के विरोध में उन्होंने पंजाब में स्वदेशी और बहिष्कार आंदोलन का नेतृत्व किया।
- कांग्रेस अध्यक्षता: 1920 के कलकत्ता विशेष अधिवेशन में वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए, जहाँ ‘असहयोग आंदोलन’ का प्रस्ताव पारित किया गया था।
- अंतरराष्ट्रीय प्रयास: 1917 में उन्होंने न्यूयॉर्क में ‘इंडियन होम रूल लीग ऑफ अमेरिका’ की स्थापना की ताकि भारत की स्वतंत्रता के लिए अंतरराष्ट्रीय समर्थन जुटाया जा सके।
- सामाजिक और आर्थिक योगदान:
- बैंकिंग क्षेत्र: उन्होंने 1894 में पंजाब नेशनल बैंक (PNB) की नींव रखी और लक्ष्मी बीमा कंपनी की स्थापना की।
- समाज सेवा: 1921 में उन्होंने ‘सर्वेंट्स ऑफ द पीपुल सोसाइटी’ (लोक सेवक मंडल) की स्थापना की, जिसका उद्देश्य अछूतों के उत्थान और शिक्षा का प्रसार करना था।
- शिक्षा: उन्होंने लाला हंसराज के साथ मिलकर दयानंद एंग्लो-वैदिक (DAV) कॉलेजों के प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
- साहित्यिक योगदान:
लाला लाजपत राय एक प्रखर लेखक और पत्रकार भी थे। उनकी प्रमुख कृतियाँ हैं:
- अनहैप्पी इंडिया (Unhappy India): कैथरीन मेयो की पुस्तक ‘मदर इंडिया’ के जवाब में लिखी गई।
- यंग इंडिया (Young India): भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की व्याख्या।
- द स्टोरी ऑफ माई डिपोर्टेशन: मांडले जेल में उनके कारावास के अनुभवों पर आधारित।
- आत्मकथा: ‘द स्टोरी ऑफ माय लाइफ’।
- जीवनी लेखन: उन्होंने शिवाजी, श्री कृष्ण, मेजिनी और गैरीबाल्डी की जीवनियाँ लिखीं।
- साइमन कमीशन का विरोध:
- शांतिपूर्ण मार्च: 1928 में जब साइमन कमीशन भारत आया (जिसमें एक भी भारतीय सदस्य नहीं था), तो लाला जी ने लाहौर में इसके विरुद्ध एक शांतिपूर्ण मार्च का नेतृत्व किया।
- लाठीचार्ज: 30 अक्टूबर, 1928 को पुलिस अधीक्षक जेम्स स्कॉट के आदेश पर उन पर लाठीचार्ज किया गया।
- ऐतिहासिक कथन: घायल अवस्था में उन्होंने कहा था, “मेरे शरीर पर पड़ी एक-एक लाठी ब्रिटिश साम्राज्य के ताबूत की आखिरी कील साबित होगी”।
- शहादत: गंभीर चोटों के कारण 17 नवंबर, 1928 को उनका निधन हो गया।

