Chautal
संदर्भ:
भारत के प्रधानमंत्री ने त्रिनिदाद एंड टोबैगो के पोर्ट ऑफ स्पेन दौरे के दौरान भोजपुरी चौताल की प्रस्तुति के माध्यम से भारत और प्रवासी भारतीय समुदाय के बीच गहरे सांस्कृतिक संबंधों को उजागर किया। यह सांस्कृतिक कार्यक्रम भारतीय विरासत के प्रति सम्मान और वैश्विक मंच पर भारतीय संस्कृति के प्रसार का प्रतीक बना।
Chautal (चौताल): हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत का प्राचीन ताल चक्र
परिचय:
- चौताल (Chautal), जिसे चौताल या चारताल भी कहा जाता है, हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत का एक प्राचीन और महत्वपूर्ण ताल है।
- यह मुख्यतः ध्रुपद शैली से जुड़ा है, जो भारतीय शास्त्रीय संगीत की सबसे प्राचीन जीवित शैली मानी जाती है।
- यह ताल पारंपरिक रूप से पखावज पर बजाया जाता है — एक प्राचीन, मृदंग जैसे वाद्य जो तबले से भी पहले का है।
ताल संरचना:
- मात्राएँ (Beats): कुल 12 मात्रा होती हैं।
- चौताल नाम का अर्थ है – चार ताली।
मुख्य विभाजन की दो व्याख्याएँ होती हैं:
- चार भागों में विभाजन: 4 + 4 + 2 + 2 मात्रा (सभी ताली, कोई खालि नहीं)
- छह भागों में विभाजन (एकताल जैसा):
- 2 + 2 + 2 + 2 + 2 + 2 मात्रा
- ताली और खालि का क्रम शामिल होता है।
विशेषताएँ:
- शक्ति और गहराई: चौताल में शक्तिशाली, गंभीर और प्रभावशाली लयबद्धता को प्रमुखता दी जाती है।
- थापी शैली: इसमें पारंपरिक “थेका” की जगह अधिक प्रवाहमयी और कल्पनाशील थापी शैली का उपयोग होता है।
- आध्यात्मिकता: यह ताल ध्रुपद की आध्यात्मिक और परंपरागत प्रकृति को दर्शाता है।
निष्कर्ष: चौताल केवल एक ताल नहीं, बल्कि प्राचीन भारतीय संगीत की आत्मा है, जो परंपरा, लयबद्ध शक्ति और आध्यात्मिकता का सजीव उदाहरण है। ध्रुपद में इसका प्रयोग संगीत को एक गंभीर, गूढ़ और ध्यानात्मक आयाम प्रदान करता है।