Need for UNFCCC Reform
Need for UNFCCC Reform –
संदर्भ:
पिछले कुछ वर्षों में संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन रूपरेखा सम्मेलन (UNFCCC) के तहत होने वाली जलवायु वार्ताएं महत्वपूर्ण प्रगति हासिल करने में असफल रही हैं। वित्तीय सहयोग, जवाबदेही और जलवायु न्याय जैसे क्षेत्रों में निराशाजनक परिणाम सामने आए हैं। इसी कड़ी में, बॉन जलवायु सम्मेलन 2025 ने गहरी असहमति और धीमी प्रगति को उजागर किया, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि COP30 (ब्राज़ील) से पहले वैश्विक जलवायु प्रयासों को पटरी पर लाना बेहद जरूरी है। इसके साथ ही, UNFCCC की संरचनात्मक सुधार की मांग और भी ज़ोर पकड़ने लगी है।
UNFCCC के बारे में:
परिचय: संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन फ्रेमवर्क कन्वेंशन (UNFCCC) एक अंतरराष्ट्रीय संधि है, जिसका उद्देश्य मानवजनित जलवायु परिवर्तन को खतरनाक स्तर तक पहुंचने से रोकना है।
स्थापना और प्रभाव:
- 1992 में रियो डी जनेरियो में आयोजित Earth Summit (UNCED) के दौरान 154 देशों ने इस संधि पर हस्ताक्षर किए।
- संधि 21 मार्च 1994 से प्रभावी हुई।
- यह संधि वायुमंडलीय ग्रीनहाउस गैसों की वृद्धि को सीमित करने के उपायों पर केंद्रित है।
संरचना:
- UNFCCC Secretariat इस संधि की कार्यप्रणाली को समर्थन देने वाली इकाई है, जिसका मुख्यालय बॉन, जर्मनी में स्थित है।
- 2022 तक, इसके 198 सदस्य देश हो चुके थे, जिससे यह लगभग सार्वभौमिक सदस्यता वाला संगठन बन गया है।
प्रमुख निकाय:
- COP (Conference of the Parties) – यह UNFCCC का सर्वोच्च निर्णय लेने वाला निकाय है, जो हर वर्ष बैठक करता है और जलवायु समझौतों पर निर्णय लेता है।
मुख्य उद्देश्य:
- जलवायु प्रणाली में खतरनाक मानव हस्तक्षेप को रोकना।
- वैश्विक तापमान और उत्सर्जन को नियंत्रण में रखना।
UNFCCC में सुधार की आवश्यकता:
- विश्वसनीयता संकट (Credibility Crisis):
- जलवायु लक्ष्यों की प्राप्ति में प्रगति की कमी के कारण UNFCCC की विश्वसनीयता पर प्रश्न उठ रहे हैं।
- 2009 (COP15, कोपेनहेगन) में विकसित देशों ने यह वादा किया था कि वे विकासशील देशों को जलवायु परिवर्तन से निपटने में मदद के लिए हर साल $100 बिलियन जुटाएंगे।
- यह लक्ष्य 2020 तक नहीं पूरा हो सका, जिससे विश्वास में भारी गिरावट आई।
- जवाबदेही की कमी (Lack of Accountability):
- विकसित देश बार-बार वित्तीय प्रतिबद्धताएं निभाने में विफल रहे हैं।
- इनके खिलाफ कोई ठोस प्रतिबंध या परिणाम तय नहीं हैं, जिससे कमजोर और विकासशील देशों में निराशा और असंतोष बढ़ा है।
- अत्यधिक नौकरशाही (Excessive Bureaucracy):
- UNFCCC वार्ताएं अक्सर लंबे एजेंडे, विस्तृत चर्चाओं और सर्वसम्मति की आवश्यकता के कारण धीमी होती हैं।
- प्रस्ताव: टीम साइज़ कम करना, भाषणों को सीमित करना—प्रक्रिया को तेज़ और कुशल बनाने हेतु।
- समावेशी भागीदारी की चुनौतियाँ:
- विकासशील और छोटे देशों को संसाधनों की कमी के कारण प्रभावी भागीदारी में कठिनाई होती है।
- प्रस्ताव: लागत में कमी, सहायता निधि और प्रवेश बाधाओं में सुधार — लेकिन इसमें कई बड़े देशों का विरोध।
- जीवाश्म ईंधन हितों का प्रभाव:
- COP बैठकों में फॉसिल फ्यूल कंपनियों के प्रतिनिधियों की भागीदारी विवादास्पद रही है।
- आशंका: ये लॉबी नीतियों को प्रभावित कर जीवाश्म ईंधन के पक्ष में झुका देती हैं।
- प्रस्ताव:
- ऐसे प्रतिनिधियों की भूमिका सीमित हो।
- जिन देशों का जलवायु रिकॉर्ड खराब हो, उन्हें COP की मेज़बानी न दी जाए।
- पारदर्शिता और निष्पक्षता को प्राथमिकता मिले।
निष्कर्ष:
UNFCCC की प्रभावशीलता बढ़ाने के लिए संरचनात्मक, वित्तीय और भागीदारी से जुड़े सुधार आवश्यक हैं। ऐसा करना वैश्विक जलवायु न्याय को मजबूती देने और विकासशील देशों का भरोसा बहाल करने के लिए अनिवार्य है