Coral cover in Lakshadweep saw 50% reduction in 24 years
Coral cover in Lakshadweep saw 50% reduction in 24 years –
संदर्भ:
हाल ही में लक्षद्वीप द्वीपसमूह के अगत्ती, कदमत और कवरेत्ती द्वीपों में प्रवाल भित्तियों की स्थिति पर आधारित एक अध्ययन सामने आया है, जिसने प्रवालों की दीर्घकालिक स्थिरता को लेकर गंभीर चिंता जताई है। अध्ययन के प्रमुख निष्कर्ष निम्नलिखित हैं:
- 24 वर्षों में 50% गिरावट: अध्ययन के अनुसार पिछले 24 वर्षों में प्रवालों की पुनर्प्राप्ति दर (recovery rate) में लगभग 50% की कमी आई है। इसका मुख्य कारण हर बार होने वाले ब्लीचिंग (bleaching) के बाद प्रवालों का धीमा पुनरुत्थान है।
- तीन प्रमुख ENSO घटनाएं: प्रवालों ने तीन बड़े एल–नीनो सदर्न ऑस्सीलेशन (ENSO) घटनाओं — 1998, 2010 और 2016 — के दौरान भारी क्षति झेली और फिर कुछ हद तक रिकवर किया, लेकिन हर बार पुनर्प्राप्ति दर घटती गई।
कोरल (Corals) क्या हैं?
कोरल समुद्री अकशेरुकी (invertebrates) जीव होते हैं जो Cnidaria नामक जंतुओं के एक बड़े समूह से संबंधित होते हैं।
मुख्य विशेषताएँ:
- संरचना: कोरल कई छोटे-छोटे नरम जीवों (polyps) से मिलकर बनते हैं। ये calcium carbonate (चूना-पत्थर जैसा पदार्थ) का एक कठोर बाहरी कंकाल बनाते हैं जो उन्हें सुरक्षा देता है।
- कोरल रीफ (Coral Reef): लाखों पॉलीप्स द्वारा मिलकर बनाए गए यह विशाल carbonate संरचनाएं होती हैं जिन्हें कोरल रीफ कहा जाता है।
- रंग और सुंदरता: कोरल का रंग लाल, बैंगनी, नीला, भूरा और हरा हो सकता है।
इनकी चमक और रंगों का कारण सूक्ष्म शैवाल (zooxanthellae) होते हैं जो इनके साथ सहजीवी संबंध में रहते हैं।
कोरल रीफ के प्रकार:
- Fringing Reefs: तटीय क्षेत्रों के किनारे बनते हैं।
- Barrier Reefs: समुद्र के अंदर गहरे पानी में तट से दूर बनते हैं।
- Atolls: डूबे हुए ज्वालामुखियों के चारों ओर वृत्ताकार रूप में बनते हैं।
भारत में प्रमुख कोरल रीफ क्षेत्र:
- गुल्फ ऑफ कच्छ (Gujarat), गुल्फ ऑफ मन्नार (Tamil Nadu), अंडमान और निकोबार द्वीप समूह, लक्षद्वीप द्वीप समूह, मालवन (महाराष्ट्र)
महत्त्व:
- समुद्री जीवन के 25% हिस्से को भोजन, आश्रय और प्रजनन स्थल प्रदान करते हैं।
- ये जैव विविधता के लिए nurseries और refuge zones की तरह कार्य करते हैं।
- विश्वभर के 1 अरब से अधिक तटीय लोग भोजन, रोजगार और पर्यटन के लिए कोरल रीफ्स पर निर्भर हैं।
कोरल ब्लीचिंग (Coral Bleaching) के प्रमुख कारण:
- समुद्री हीटवेव और जलवायु परिवर्तन:
- समुद्री सतह का तापमान बढ़ने से कोरल और उसमें सहजीवी रूप से रहने वाले zooxanthellae शैवाल के बीच संबंध टूट जाता है।
- इससे कोरल अपना रंग (शैवाल) खो बैठते हैं और “ब्लीच” हो जाते हैं, जो अंततः उनकी मृत्यु का कारण बन सकता है।
- महासागरीय अम्लीकरण (Ocean Acidification):
- वायुमंडलीय CO₂ का अधिक मात्रा में महासागरों में घुलना, पानी का pH कम कर देता है।
- इससे कोरल के लिए calcium carbonate से बना कंकाल बनाना कठिन हो जाता है।
- प्रदूषण: कृषि अपवाह (runoff) से समुद्र में पहुंचने वाले उर्वरक, कीटनाशक और भारी धातुएं (जैसे सीसा) कोरल की रोग प्रतिरोधक क्षमता को घटा देते हैं।
- यह कोरल को रोगों और पर्यावरणीय तनावों के प्रति संवेदनशील बना देता है।
- भौतिक क्षति: तटीय विकास, अस्थिर मत्स्यन (fishing), गाद जमाव (sedimentation), और कोरल खनन सीधे कोरल संरचनाओं को नुकसान पहुंचाते हैं।
- इससे कोरल के रहने, सांस लेने और पुनः वृद्धि करने की क्षमता प्रभावित होती है।
- अत्यधिक मछली पकड़ना: कुछ मछलियां (जैसे तोता मछली) शैवाल को नियंत्रित करने में मदद करती हैं।
- इन मछलियों की संख्या कम होने से शैवाल अत्यधिक बढ़ जाते हैं, जिससे कोरल का दम घुटने लगता है और वे कमजोर हो जाते हैं।