WHO Global Infertility Guidelines

संदर्भ:
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने 28 नवंबर 2025 को इनफर्टिलिटी (बांझपन) की रोकथाम, निदान और उपचार के लिए पहली बार वैश्विक तौर पर दिशानिर्देश जारी किए हैं। इन दिशा-निर्देशों का उद्देश्य सभी देशों में निष्पक्ष, सुलभ और सुरक्षित प्रजनन स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करना है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के वैश्विक बांझपन दिशा-निर्देश:
- क्लिनिकल प्रैक्टिस: बांझपन के निदान में साक्ष्य-आधारित परीक्षणों का उपयोग किया जाए। दवाइयों के उपयोग और हार्मोनल इलाज के लिए स्टैंडर्ड प्रोटोकॉल अपनाए जाएँ। अनावश्यक टेस्ट और अधिक आक्रामक तकनीकों से बचने की सलाह दी गई है।
- ART उपचार: IVF और ICSI जैसी तकनीकों में रोगी सुरक्षा (Patient Safety) को सर्वोपरि रखा जाए। एम्ब्रियो ट्रांसफर के समय Single Embryo Transfer (SET) को प्राथमिकता दी जाए ताकि बहुविवाही गर्भधारण (multiple pregnancy) के जोखिम कम हों। साथ हीं Cryopreservation तकनीकों को अपनाने की सिफारिश की गई है।
- स्वास्थ्य ढांचा: देशों को सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली में बांझपन सेवाएँ शामिल करने की सलाह दी गई है। कम आय वाले देशों को वित्तीय सहायता एवं तकनीकी सहयोग देकर ART की लागत घटाने और डेटा निगरानी प्रणाली (Monitoring system) विकसित करने की सिफारिश की गई है।
- मानव अधिकार: उपचार में सूचित सहमति (Informed Consent) को अनिवार्य किया जाए। मरीजों की गोपनीयता (Privacy) और सम्मान (Dignity) की रक्षा पर जोर दिया जाए। युगल, अविवाहित व्यक्तियों और LGBTQ+ समुदाय के लिए भेदभाव रहित उपचार को बढ़ावा दिया जाए।
WHO दिशा-निर्देशों का मुख्य उद्देश्य:
WHO का प्रमुख लक्ष्य समानता (Equity) और सुलभता (Accessibility) आधारित प्रजनन स्वास्थ्य प्रणाली का विकास करना है। दिशा-निर्देशों के प्रमुख उद्देश्य:
- उच्च-गुणवत्ता वाली बांझपन सेवाएँ सभी लोगों तक पहुँचाना है, चाहे उनकी आय, लिंग, सामाजिक स्थिति या भौगोलिक स्थान कुछ भी हो।
- सुरक्षित और किफायती ART तकनीकों की उपलब्धता सुनिश्चित करना। IVF, ICSI और IUI जैसी प्रजनन तकनीकों में मानक तय करना।
- बांझपन से जुड़े कलंक (Stigma) को कम करना और इसे एक वैध स्वास्थ्य स्थिति के रूप में मान्यता देना।
- देशों को राष्ट्रीय प्रजनन नीति (National Fertility Policy) तैयार करने के लिए सक्षम बनाना।
- उपचार प्रक्रियाओं में पारदर्शिता, सुरक्षा, नैतिकता और मरीज अधिकारों को सर्वोच्च प्राथमिकता देना।
भारत में बांझपन की स्थिति:
- भारत में लगभग 1.5–2 करोड़ दंपति बांझपन से प्रभावित है, और इसकी व्यापकता 3.9% से 16.8% तक आंकी जाती है। ग्रामीण क्षेत्रों (8-10%) की तुलना में शहरी क्षेत्रों (15-20%) में बांझपन की दर अधिक है। जिसका कारण बदलती जीवनशैली, तनाव, प्रदूषण एवं मातृत्व/पितृत्व की बढ़ती आयु जैसे कारक हैं।
- भारत में पुरुष कारक लगभग 40–50% मामलों में पाए गए हैं, जिसमें कम शुक्राणु संख्या, गतिशीलता की कमी और हार्मोनल असंतुलन प्रमुख कारण हैं। वहीं महिलाओं में PCOS, एंडोमेट्रियोसिस, हार्मोनल असंतुलन और आयु-संबंधी कारक प्रमुख कारण हैं।
- विशेष रूप से द्वितीयक बांझपन (पहली संतान के बाद गर्भधारण में असमर्थता) में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, जो 1992–93 में 19.5% थी, जबकि 2015–16 तक यह 28.6% तक पहुंच गई।
- भारत में सामाजिक दबाव, कलंक और महिलाओं पर दोषारोपण जैसी सामाजिक समस्याएँ इस स्वास्थ्य स्थिति को और जटिल बनाती हैं। यह मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव डालता है।
