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यूनेस्को अमूर्त सांस्कृतिक विरासत समिति (ICHC) | Ankit Avasthi Sir

ICHC

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संदर्भ:

भारत ने 8–13 दिसंबर 2025 के बीच नई दिल्ली मे यूनेस्को अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की सुरक्षा हेतु यूनेस्को अमूर्त सांस्कृतिक विरासत समिति/अंतर-सरकारी समिति (ICHC) के 20वें सत्र की मेजबानी की। इस सत्र में 180 देशों से 800+ प्रतिनिधियों की भागीदारी रही जो भारत को विश्व संस्कृति विमर्श के केंद्र में स्थापित करता है।

यूनेस्को अंतर-सरकारी समिति (ICHC) क्या हैं?

    • परिचय: यूनेस्को अंतर-सरकारी समिति (ICHC), जिसे Intergovernmental Committee for the Safeguarding of the Intangible Cultural Heritage कहा जाता है, एक वैश्विक निकाय है जो सदस्य देशों की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत—जैसे परंपराएँ, कौशल, लोककला, उत्सव के संरक्षण, संवर्धन और दस्तावेज़ीकरण पर कार्य करता है। 
    • गठन: यह समिति 2003 के यूनेस्को कन्वेंशन के तहत बनी है।
  • उद्देश्य: इसका मुख्य उद्देश्य अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की सुरक्षा, सर्वोत्तम प्रथाओं की पहचान, अंतर्राष्ट्रीय सहायता और वैश्विक सहयोग को बढ़ावा देना है।
  • नियमन: समिति सदस्य देशों द्वारा प्रस्तुत नामांकन फ़ाइलें, सुरक्षा रिपोर्ट, और कार्यक्रम/परियोजना प्रस्ताव की समीक्षा करती है तथा अमूर्त विरासत संरक्षण के लिए आवश्यक सहायता प्रदान करती है।

यूनेस्को अंतर-सरकारी समिति (ICHC) की संरचना:

  • सदस्यता: यूनेस्को की महासभा द्वारा समान भौगोलिक प्रतिनिधित्व (Equitable Geographical Representation) के सिद्धांत पर समिति के 24 सदस्य चुने जाते हैं।
  • कार्यकाल: प्रत्येक सदस्य देश का कार्यकाल चार वर्ष का होता है और हर दो वर्ष में आधे सदस्य नवीनीकरण हेतु चुने जाते हैं।
  • विशेष प्रावधान: समिति के सदस्य ऐसे विशेषज्ञों को नामित करते हैं जिनके पास अमूर्त सांस्कृतिक विरासत के विभिन्न क्षेत्रों में योग्यता एवं अनुभव हो।

ICH सूची में भारत की सांस्कृतिक धरोहर:

भारत के 15 तत्व यूनेस्को की प्रतिनिधि सूची में अंकित हैं, जिनमें शामिल हैं— संस्कृत थिएटर कुटियाट्टम (2008), वैदिक मंत्रोच्चार (2008), रामलीला (2008), रम्माण (2009), मुदियेट्टू (2010), कालबेलिया नृत्य (2010), छऊ (2010), लद्दाख बौद्ध जप (2012), मणिपुरी संकीर्तन (2013), जंडियाला गुरु की पीतल-तांबा कारीगरी (2014), योग (2016), नवरोज़ (2016), कुंभ मेला (2017), कोलकाता दुर्गा पूजा (2021), तथा गुजरात का गरबा (2023)।

भारत द्वारा मेजबानी का महत्व:

  • कूटनीतिक लाभ: यह सम्मेलन भारत को उसकी विविध सांस्कृतिक विरासत को दुनिया के सामने प्रस्तुत करने का अवसर देता है और यूनेस्को में उसका प्रभाव बढ़ाता है।
  • सॉफ्ट पावर विस्तार: अमूर्त विरासत पर ऐसा वैश्विक मंच भारत की सॉफ्ट पावर को मजबूती देता है, जिससे वह उभरती वैश्विक शक्ति के रूप में और भी प्रभावशाली दिखाई देता है।
  • विरासत पर्यटन में बढ़ोतरी: अमूर्त विरासत पर अंतर्राष्ट्रीय अयोजन से भारत में सांस्कृतिक पर्यटन को बढ़ावा मिलता है, जो भारत के पर्यटन बाजार को बढ़ावा देता है।
  • अंतरराष्ट्रीय सहयोग का विस्तार: भारत अन्य देशों के साथ ज्ञान-साझेदारी, क्षमता निर्माण, और विरासत प्रबंधन तकनीकों पर सहयोग मजबूत करने पर फोकस कर सकता है।

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