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नेट-ज़ीरो लक्ष्य हेतु CCUS अनुसंधान रोडमैप (CCUS Research Roadmap for Net-Zero Goals) | UPSC

CCUS Research Roadmap for Net-Zero Goals

CCUS Research Roadmap for Net-Zero Goals

संदर्भ:

भारत ने 2070 तक नेट-ज़ीरो उत्सर्जन का लक्ष्य प्राप्त करने के उद्देश्य से विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST) ने पहला राष्ट्रीय CCUS R&D रोडमैप जारी किया, जिसे भारत सरकार के प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार ने लॉन्च किया। यह रोडमैप भारत के औद्योगिक डिकार्बोनाइजेशन को तेज करने के लिए एक रणनीतिक दिशा प्रदान करता है।

कार्बन कैप्चर, यूटिलाइज़ेशन एंड स्टोरेज (CCUS) क्या हैं? 

  • परिचय: कार्बन कैप्चर, यूटिलाइज़ेशन एंड स्टोरेज (CCUS) एक ऐसी तकनीक है जो बिजली संयंत्रों और उद्योगों से निकलने वाले कार्बन डाइऑक्साइड को पकड़ती है, उसे उपयोगी उत्पादों (जैसे ईंधन, रसायन) में बदलती है ताकि वह वायुमंडल में न जाए। 

  • कार्यप्रणाली: 

    1. कैप्चर (Capture): कार्बन डाइऑक्साइड को बड़े औद्योगिक स्रोतों (जैसे कोयला बिजलीघर, सीमेंट प्लांट, रिफाइनरी) से अलग किया जाता है।

    2. यूटिलाइज़ेशन (Utilization): पकड़ी गई कार्बन डाइऑक्साइड का उपयोग नए उत्पादों जैसे निर्माण सामग्री, रसायनों या सिंथेटिक ईंधन बनाने में किया जाता है।

    3. स्टोरेज (Sequestration): कार्बन डाइऑक्साइड को गहरे भूमिगत भूगर्भीय संरचनाओं में स्थायी रूप से संग्रहीत किया जाता है ताकि वह वायुमंडल में न मिल सके।

CCUS क्यों आवश्यक है?

  • जलवायु परिवर्तन शमन: यह ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को सीधे कम करता है, जो 1.5°C वैश्विक तापमान लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए आवश्यक है।
  • औद्योगिक डीकार्बोनाइजेशन: यह स्टील और सीमेंट जैसे ‘कठिन-से-कम’ क्षेत्रों में उत्सर्जन को कम करने में मदद करता है।
  • ऊर्जा सुरक्षा: यह स्वच्छ हाइड्रोजन उत्पादन और निम्न-कार्बन बिजली उत्पादन के पूरक के रूप में कार्य करता है।
  • शुद्ध-शून्य लक्ष्य: यह नेट-ज़ीरो उत्सर्जन प्राप्त करने के लिए एक महत्वपूर्ण तकनीक है।
  • प्रभावी समाधान: भारत में ऊर्जा, इस्पात, सीमेंट और रसायन जैसे क्षेत्रों में उत्सर्जन को तुरंत कम करना कठिन है। CCUS तकनीक इन क्षेत्रों के लिए एकमात्र प्रभावी समाधान है।

रोडमैप की मुख्य विशेषताएँ:

    • समन्वित जलवायु कार्यवाही का मार्गदर्शन: यह रोडमैप भारत को विकसित भारत@2047 की दृष्टि के अनुरूप प्रौद्योगिकी-आधारित डीकार्बोनाइजेशन की दिशा में अग्रसर करता है। इसमें अनुसंधान, निवेश, नीति और अवसंरचना के लिए स्पष्ट दिशा दी गई है।

    • अगली पीढ़ी के समाधान: रोडमैप न केवल मौजूदा तकनीकों को व्यावसायिक स्तर तक ले जाने पर बल देता है, बल्कि नेक्स्ट-जनरेशन CCUS विज्ञान को भी प्राथमिकता देता है। इसमें नकारात्मक उत्सर्जन तकनीकें, जैसे BECCS, शामिल हैं।

  • मानव संसाधन और संस्थागत ढाँचा: रोडमैप के माध्यम से कुशल मानव संसाधन, सुरक्षा मानक, नियामक ढाँचा और साझा अवसंरचना CCUS के तेज विस्तार के लिए अनिवार्य होंगे।

तकनीकी प्राथमिकताएँ:

  • कार्बन कैप्चर तकनीकें: यह क्षेत्र बड़े उत्सर्जन स्रोतों से CO₂ पकड़ने की लागत कम करने और दक्षता बढ़ाने पर केंद्रित है। उन्नत सॉर्बेंट्स और मेम्ब्रेन का विकास, सीमेंट व इस्पात जैसे कठिन क्षेत्रों के लिए नवाचार, डायरेक्ट एयर कैप्चर (DAC) में लागत में कमी।

  • CO₂ उपयोग: इसका उद्देश्य CO₂ को मूल्यवान उत्पादों में परिवर्तित कर कार्बन सर्कुलर अर्थव्यवस्था बनाना है। इसका मुख्य फोकस CO₂ आधारित वैकल्पिक ईंधन, निर्माण सामग्री जैसे कार्बनयुक्त कंक्रीट, औद्योगिक रसायन निर्माण करना है।

  • CO₂ परिवहन अवसंरचना: कार्बन कैप्चर स्टेशनों को उपयोग/भंडारण स्थलों से जोड़ने हेतु साझा अवसंरचना आवश्यक है। इसमें पाइपलाइन नेटवर्क की क्षेत्रीय योजना, गैर-पाइपलाइन विकल्प: जहाज, रेल, ट्रक, सुरक्षा और विनियमन मानकों का विकास शामिल है।

  • भू-भंडारण और निगरानी: CO₂ का दीर्घकालिक और सुरक्षित भंडारण इस तकनीक की प्राथमिकता है। इसमें गहरे सलाइन जलभृतों और समाप्त तेल-गैस संरचनाओं का आकलन, भारत की संभावित भंडारण क्षमता 600 गीगाटन तक होना, निगरानी, सत्यापन और जोखिम प्रबंधन के मानक विकसित करना है।

कार्यान्वयन ढाँचा:

  • वित्तीय मॉडल: रोडमैप में सार्वजनिक–निजी भागीदारी, बहुपक्षीय सहयोग और ₹1 लाख करोड़ RDI स्कीम को प्रमुख वित्तीय स्रोत बताया गया है।

  • सामाजिक भागीदारी: स्थानीय समुदायों में जागरूकता और स्वीकृति बढ़ाने के लिए सार्वजनिक सहभागिता रणनीतियाँ अनिवार्य बताई गई हैं। 

  • DST की भूमिका: DST पिछले 7 वर्षों से CCUS अनुसंधान को समर्थन दे रहा है। भारत में पहली बार औद्योगिक वातावरण में CCUS टेस्ट बेड स्थापित किए गए हैं। DST ने हाई-लेवल टास्क फोर्स बनाकर इस रोडमैप का वैज्ञानिक आधार मजबूत किया।

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