1% reservation policy for orphan children in Maharashtra
संदर्भ:
महाराष्ट्र सरकार ने अप्रैल 2018 में एक अभूतपूर्व निर्णय लेते हुए अनाथ बच्चों के लिए शिक्षा और सरकारी नौकरियों में 1% आरक्षण की नीति लागू की थी। इसी के तहत अब तक 800 से अधिक अनाथ युवाओं को सरकारी नौकरी मिली है। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने इसे “ऐतिहासिक मील का पत्थर” बताया, क्योंकि यह नीति भारत में पहली बार किसी विशेष रूप से उपेक्षित वर्ग के लिए संरक्षित अवसर प्रदान करती है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि:
- सरकार ने अप्रैल 2018 में एक सरकारी संकल्प (Government Resolution) जारी किया, जिसमें अनाथ बच्चों को एक स्वतंत्र श्रेणी के रूप में मान्यता दी गई।
- इस नीति को मजबूत करने के लिए बाद के वर्षों में कई दिशानिर्देश जारी किए गए ताकि आरक्षण का सख्ती से पालन सुनिश्चित किया जा सके।
- महाराष्ट्र की यह नीति विशेष थी क्योंकि यह अन्य चल रही आरक्षण बहसों—जैसे मराठा आरक्षण से पूरी तरह स्वतंत्र थी और किसी भी मौजूदा श्रेणी में कटौती किए बिना लागू की गई थी।
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नीति का मूल उद्देश्य समान अवसर, मुख्यधारा में समावेशन, और स्वावलंबन को बढ़ावा देना है। यह कदम कल्याणकारी राज्य की अवधारणा को मजबूत करता है।
महाराष्ट्र में अनाथ बच्चों के लिए 1% आरक्षण नीति के मुख्य प्रावधान:
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लाभार्थी श्रेणी: इस आरक्षण का लाभ उन बच्चों को दिया जाता है, जिनके माता–पिता दोनों का 18 वर्ष की आयु से पहले निधन हो चुका हो और जिनके किसी भी रिश्तेदार का पता नहीं चल सका हो। ऐसे बच्चों को अक्सर जाति प्रमाणपत्र या सामाजिक श्रेणी निर्धारित करने में कठिनाई होती है, इसलिए उन्हें एक स्वतंत्र अनाथ वर्ग प्रदान किया गया।
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कोटा का स्वरूप: 1% आरक्षण एक “समानांतर आरक्षण” है, जो सामान्य (Open) श्रेणी के भीतर लागू होता है। यानी यह राज्य के कुल आरक्षण प्रतिशत में किसी वृद्धि का कारण नहीं बनता और न ही SC, ST या OBC के कोटे में हस्तक्षेप करता है। सामान्य श्रेणी के हर 100 पदों में से 1 पद अनाथों के लिए आरक्षित रहेगा।
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लागू क्षेत्र: यह आरक्षण सरकारी, अर्द्ध-सरकारी और सरकारी अनुदान प्राप्त संस्थानों में शिक्षा तथा नौकरियों दोनों पर लागू होता है।
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अतिरिक्त लाभ: लाभार्थियों को आयु सीमा में छूट, शुल्क रियायतें और वे सभी सुविधाएँ भी मिलती हैं जो सामान्यतः पिछड़े वर्गों को प्रदान की जाती हैं।
नीति की आवश्यकता:
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ऐतिहासिक वंचना: अनाथ बच्चे अक्सर अपने माता-पिता के बिना होने के कारण जाति प्रमाण पत्र प्राप्त करने या नौकरी के लिए आवेदन करने की प्रक्रियाओं से जूझते हैं, जिससे वे अवसरों से वंचित रह जाते हैं।
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सामाजिक समावेश: यह कोटा उन्हें समाज की मुख्यधारा से जोड़ने और सरकारी सेवाओं व शिक्षा में उनका प्रतिनिधित्व बढ़ाने में मदद करता है, जिससे समावेशी विकास होता है।
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आत्मनिर्भरता को बढ़ावा: आरक्षण के माध्यम से, अनाथों को आर्थिक रूप से मजबूत बनाने और आत्मनिर्भर बनाने का लक्ष्य है, जिससे वे समाज में सम्मानजनक स्थान प्राप्त कर सकें।
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स्पष्टता और संशोधन: सरकार ने समय-समय पर इस नीति में संशोधन किए हैं, ताकि परिभाषाएं स्पष्ट हों (जैसे “जैविक माता-पिता”) और आरक्षण का लाभ उन तक पहुंचे जो वास्तव में इसके हकदार हैं, जैसे कि किशोर न्याय अधिनियम के तहत पालित बच्चे।

