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ग्लोबल वॉटर बैंकरप्सी 2026 (Global Water Bankruptcy 2026) | UPSC Preparation

Global Water Bankruptcy 2026

Global Water Bankruptcy 2026

संदर्भ:

हाल ही में संयुक्त राष्ट्र विश्वविद्यालय के जल, पर्यावरण और स्वास्थ्य संस्थान (UNU-INWEH) ने ‘ग्लोबल वॉटर बैंकरप्सी (वैश्विक जल दिवालियापन) शीर्षक से एक रिपोर्ट जारी की है। इस रिपोर्ट में यह चेतावनी दी गई है कि दुनिया अब केवल ‘जल संकट’ से इतर ‘जल दिवालियापन’ (Water Bankruptcy) के युग में प्रवेश कर चुकी है। 

 वैश्विक जल दिवालियापन क्या है?

  • रिपोर्ट के अनुसार, जल दिवालियापन एक ऐसी स्थायी स्थिति है जहां जल प्रणालियों (नदियों, झीलों और भूजल) का दोहन उनकी प्राकृतिक पुनर्भरण (Replenishment) क्षमता से कहीं अधिक हो चुका है। 
  • ‘जल संकट’ एक अस्थायी समस्या है जिससे उबरा जा सकता है, लेकिन ‘दिवालियापन’ एक ऐसी स्थिति है जहाँ जल प्रणालियाँ अपनी ऐतिहासिक आधारभूत स्थिति में वापस नहीं लौट सकतीं।
  • यह स्थिति तब उत्पन्न होती है जब अत्यधिक दोहन और प्रदूषण के कारण जल स्रोत स्थायी रूप से नष्ट हो जाते हैं। 

रिपोर्ट के मुख्य निष्कर्ष:

  • सिंचित भूमि पर दबाव: दुनिया की 170 मिलियन हेक्टेयर से अधिक सिंचित कृषि भूमि ‘उच्च’ या ‘अत्यधिक उच्च’ जल तनाव (Water Stress) का सामना कर रही है।
  • खाद्य असुरक्षा: वैश्विक खाद्य उत्पादन का 50% से अधिक हिस्सा उन क्षेत्रों में केंद्रित है जहां जल भंडारण का स्तर लगातार गिर रहा है।
  • आर्थिक नुकसान: भूमि क्षरण, भूजल की कमी और जलवायु परिवर्तन के कारण जल संकट से होने वाला आर्थिक नुकसान प्रति वर्ष $300 बिलियन से अधिक हो गया है।
  • आर्द्रभूमि (Wetlands) का विनाश: पिछले 5 दशकों में दुनिया ने लगभग 410 मिलियन हेक्टेयर आर्द्रभूमि खो दी है, जो यूरोपीय संघ के आकार के बराबर है।
  • जनसंख्या का प्रभाव: दुनिया की लगभग 3 बिलियन आबादी और लगभग 2 बिलियन लोग (जकार्ता, बैंकॉक जैसे शहरों में) भूजल की कमी के कारण भूमि धंसने (Land Subsidence) जैसी समस्याओं का सामना कर रहे हैं। 

जल दिवालियापन के प्रमुख कारक:

  • मानवीय गतिविधियों द्वारा निर्मित सूखा: मानवीय गतिविधियों द्वारा निर्मित सूखा जिसे रिपोर्ट में ‘एन्थ्रोपोजेनिक ड्रॉट’ (Anthropogenic Drought) कहा गया है, जो खराब प्रबंधन और पर्यावरण क्षरण का परिणाम है।
  • क्रायोस्फीयर (Cryosphere) का पिघलना: ग्लेशियरों के पिघलने से दीर्घकालिक जल बफर (Water Buffer) समाप्त हो रहे हैं।
  • कृषि क्षेत्र का दबाव: कृषि दुनिया में ताजे पानी के कुल उपयोग का लगभग 70-72% हिस्सा है, जो इसे इस दिवालियापन का मुख्य कारण है।
  • प्रदूषण: औद्योगिक और घरेलू कचरे के कारण उपयोग योग्य पानी की गुणवत्ता में भारी गिरावट आई है, जिससे वास्तविक उपलब्ध पानी और कम हो गया है। 

भारत के लिए निहितार्थ:

भारत, जो दुनिया की 18% आबादी का घर है लेकिन जिसके पास केवल 4% वैश्विक जल संसाधन हैं, इस रिपोर्ट के संदर्भ में अत्यंत संवेदनशील है। 

  • भूजल संकट: भारत दुनिया का सबसे बड़ा भूजल उपभोक्ता है। रिपोर्ट में उल्लेखित ‘दिवालियापन’ की स्थिति भारत के कई राज्यों (विशेषकर उत्तर-पश्चिम भारत) में पहले से ही स्पष्ट दिख रही है।
  • खाद्य सुरक्षा पर खतरा: भारत की कृषि मुख्य रूप से मानसून और सिंचाई पर निर्भर है। पानी की कमी सीधे तौर पर देश की खाद्य आत्मनिर्भरता को प्रभावित करेगी। 

समाधान:

रिपोर्ट ने सरकारों से ‘संकट प्रबंधन’ से हटकर ‘दिवालियापन प्रबंधन’ (Bankruptcy Management) की ओर बढ़ने का आग्रह किया है। 

  • वैश्विक जल एजेंडा 2026: सरकारों को 2026 और 2028 के संयुक्त राष्ट्र जल सम्मेलनों का उपयोग करके जल को शांति, जलवायु और खाद्य सुरक्षा के सेतु के रूप में स्थापित करना चाहिए।
  • कृषि सुधार: जल-गहन फसलों (Water-intensive crops) से हटकर जलवायु-अनुकूल फसलों की ओर जाना और सिंचाई दक्षता बढ़ाना अनिवार्य है।
  • अपशिष्ट जल का पुनर्चक्रण: चक्रीय अर्थव्यवस्था (Circular Economy) को बढ़ावा देकर जल के पुन: उपयोग को प्राथमिकता देनी होगी।

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