Meghalaya world-famous living root bridge nominated for UNESCO World Heritage Site
संदर्भ:
भारत सरकार ने मेघालय के विश्व प्रसिद्ध ‘जीवित जड़ पुलों’ (Living Root Bridges) को यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल का दर्जा दिलाने के लिए आधिकारिक तौर पर अपना नामांकन दाखिल कर दिया है। 29 जनवरी 2026 को पेरिस में यूनेस्को के महानिदेशक को यह ‘नामांकन डोजियर’ सौंपा गया।
पृष्ठभूमि:
मेघालय के ये पुल 2022 से यूनेस्को की ‘संभावित सूची’ में थे। अब सरकार ने इन्हें 2026-27 के मूल्यांकन चक्र के लिए अंतिम रूप से नामित किया है। यह कदम स्वदेशी ज्ञान और ‘प्रकृति-संस्कृति’ के अद्भुत समन्वय को वैश्विक मान्यता दिलाने की दिशा में एक बड़ा मील का पत्थर है।
जीवित जड़ पुल (Jingkieng Jri) के बारे में:
- स्थानीय रूप से ‘जिंगकीेंग जरी’ कहलाने वाले ये पुल किसी कंक्रीट या स्टील से नहीं, बल्कि ‘फाइकस इलास्टिका’ (Ficus elastica) या भारतीय रबर के पेड़ की हवाई जड़ों (Aerial Roots) से बने होते हैं।
- निर्माण प्रक्रिया: खासी और जयंतिया जनजातियाँ इन जड़ों को बांस या सुपारी के खोखले तनों के माध्यम से नदियों के आर-पार दिशा देती हैं। धीरे-धीरे ये जड़ें आपस में जुड़कर एक मजबूत ढांचा बना लेती हैं।
- समय सीमा: एक पुल को पूरी तरह तैयार होने में 15 से 30 वर्ष का समय लगता है, लेकिन ये 500 वर्षों तक सुरक्षित रह सकते हैं।
- विशेषता: अन्य पुलों के विपरीत, ये समय के साथ कमजोर होने के बजाय और मजबूत होते जाते हैं क्योंकि पेड़ जीवित रहता है और उसकी जड़ें मोटी होती रहती हैं।
सांस्कृतिक एवं पारिस्थितिक महत्व:
- सांस्कृतिक परिदृश्य (Cultural Landscape): यह सदियों से चली आ रही परंपरा और ‘मे रामेव’ (Mei Ramew – धरती माता) के प्रति सम्मान का प्रतीक है।
- जैव-अभियांत्रिकी (Bio-engineering): ये दुनिया में स्वदेशी जैव-अभियांत्रिकी के सर्वश्रेष्ठ उदाहरणों में से एक हैं, जो बिना किसी पर्यावरणीय नुकसान के कनेक्टिविटी प्रदान करते हैं।
- जैव विविधता का संरक्षण: इन पुलों के आसपास के क्षेत्र में कई दुर्लभ ऑर्किड, उभयचर और स्तनधारी प्रजातियां पाई जाती हैं।
- सतत विकास: यह संयुक्त राष्ट्र के ‘सतत विकास लक्ष्यों’ (SDGs) विशेषकर ‘जलवायु कार्रवाई’ और ‘स्थानीय समुदायों के सशक्तीकरण’ के साथ मेल खाता है।
प्रमुख स्थल और संरक्षण प्रयास:
- मेघालय में लगभग 100 से अधिक जीवित जड़ पुल 72 गांवों में फैले हुए हैं। इनमें से चेरापूंजी (Sohra) का ‘डबल-डेकर’ पुल (उमशियांग गांव) और मावलिननॉन्ग (Mawlynnong) का ‘रिवई’ पुल पर्यटकों के बीच सर्वाधिक लोकप्रिय हैं।
- हाल ही में, इस कला के संरक्षक हैली वार (Hally War) को स्वदेशी पारिस्थितिक ज्ञान के संरक्षण के लिए पद्म श्री 2026 से सम्मानित किया गया है, जो इस परंपरा के राष्ट्रीय महत्व को दर्शाता है।

