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सर्वोच्च न्यायालय द्वारा UGC अधिसूचित उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता संवर्धन नियम-2026 पर रोक (Supreme Court stays UGC notified Promotion of Equality in Higher Educational Institutions Rules 2026) | Apni Pathshala

Supreme Court stays UGC notified Promotion of Equality in Higher Educational Institutions Rules 2026

Supreme Court stays UGC notified Promotion of Equality in Higher Educational Institutions Rules 2026v

संदर्भ:

29 जनवरी, 2026 को भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा अधिसूचित “उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता संवर्धन नियम-2026” (Promotion of Equity in HEIs Regulations, 2026) के क्रियान्वयन पर अगले आदेश तक रोक लगा दी है। 

  • मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जोयमाल्य बागची की पीठ ने इन नियमों को “अस्पष्ट” और “दुरुपयोग की संभावना वाला” बताते हुए स्थगित करने का निर्देश दिया। 

नियम-2026 के प्रावधान:

  • समान अवसर केंद्र (Equal Opportunity Centres): प्रत्येक संस्थान में समावेशिता को बढ़ावा देने के लिए इसका गठन अनिवार्य था।
  • समानता समिति (Equity Committee): भेदभाव की शिकायतों की जांच के लिए SC, ST, OBC और महिलाओं के प्रतिनिधित्व वाली समिति का प्रावधान।
  • दंडात्मक कार्रवाई: नियमों का पालन न करने पर संस्थान की फंडिंग में कटौती या मान्यता रद्द करने जैसे कड़े दंड का प्रावधान था।

 

विवाद का मुख्य केंद्र: विनियमन 3(C):

  • विवाद की मुख्य जड़ नियमों के सेक्शन 3(C) में निहित है, जिसमें ‘जाति-आधारित भेदभाव’ को परिभाषित किया गया है। याचिकाकर्ताओं के अनुसार: 
    • चयनात्मक सुरक्षा: यह नियम केवल अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के छात्रों के विरुद्ध होने वाले भेदभाव को ही कवर करता है।
    • सामान्य वर्ग की उपेक्षा: याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि यह परिभाषा गैर-आरक्षित (General Category) छात्रों को संस्थागत सुरक्षा और शिकायत निवारण तंत्र से बाहर कर देती है, जो संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है।
    • जाति-तटस्थता का अभाव: सर्वोच्च न्यायालय में दी गई दलीलों में मांग की गई कि भेदभाव की परिभाषा ‘जाति-तटस्थ’ होनी चाहिए ताकि किसी भी छात्र के साथ उसकी जाति के आधार पर होने वाले उत्पीड़न को रोका जा सके। 

विशेष:

  • अनुच्छेद 14 और 15: न्यायालय ने संकेत दिया कि यदि कोई नियम समाज के एक वर्ग को सुरक्षा देता है जबकि दूसरे को उसी प्रकार के उत्पीड़न के प्रति असुरक्षित छोड़ देता है, तो वह “मनमाना” और भेदभावपूर्ण हो सकता है।
  • अनुच्छेद 142 का प्रयोग: सर्वोच्च न्यायालय ने अपनी पूर्ण न्याय करने की शक्ति (Article 142) का प्रयोग करते हुए इन नियमों को ‘अबीन्स’ (Abeyance) में रखा है। 
  • न्यायालय ने कहा कि बीते 75 वर्षों में हमने एक “जातिविहीन समाज” की ओर जो प्रगति की है, ये नियम उस दिशा में “प्रतिगामी” (Regressive) साबित हो सकते हैं और शैक्षणिक परिसरों में विभाजनकारी प्रभाव डाल सकते हैं। 
  • न्यायालय ने सुझाव दिया है कि इन नियमों की समीक्षा प्रतिष्ठित न्यायविदों या विशेषज्ञों की एक समिति द्वारा की जानी चाहिए ताकि इनमें स्पष्टता और संतुलन लाया जा सके।

आगे की राह:

  • अंतरिम व्यवस्था: अगले आदेश तक UGC रेगुलेशन 2012 प्रभावी रहेंगे ताकि छात्रों के पास शिकायत निवारण के लिए कोई न कोई तंत्र उपलब्ध रहे।
  • सरकारी पक्ष: केंद्र सरकार और UGC को 19 मार्च, 2026 तक विस्तृत जवाब दाखिल करने का नोटिस जारी किया गया है।

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