India-United Kingdom Social Security Agreement
संदर्भ:
हाल ही में भारत और यूनाइटेड किंगडम (UK) ने एक ऐतिहासिक सामाजिक सुरक्षा समझौते (Social Security Agreement – SSA) पर हस्ताक्षर किए। यह समझौता दोनों देशों के बीच व्यापारिक सुगमता को सुदृढ़ करने की दिशा में एक बड़ा कदम है।
भारत-यूके सामाजिक सुरक्षा समझौता 2026:
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दोहरे योगदान से मुक्ति: वर्तमान में, यदि कोई भारतीय पेशेवर अल्पकालिक कार्य के लिए ब्रिटेन जाता है, तो उसे भारत (EPFO) और ब्रिटेन (National Insurance) दोनों जगहों पर सामाजिक सुरक्षा कर देना पड़ता था। इससे समाप्त किया गया है।
- सामाजिक सुरक्षा अंशदान: अब 36 महीने (3 वर्ष) तक की अस्थायी नियुक्ति पर जाने वाले कर्मचारियों को केवल अपने गृह देश (Home Country) में ही सामाजिक सुरक्षा अंशदान देना होगा।
- प्रमाणपत्र: इसके लिए कर्मचारियों को ‘कवरेज प्रमाणपत्र’ (Certificate of Coverage – CoC) प्राप्त करना होगा, जो उन्हें दूसरे देश में कर भुगतान से छूट दिलाएगा।
सामाजिक सुरक्षा समझौता क्या हैं?
सामाजिक सुरक्षा समझौता (Social Security Agreement – SSA) एक द्विपक्षीय संधि है जो दो देशों के बीच उन श्रमिकों के हितों की रक्षा के लिए की जाती है जो अपने देश को छोड़कर दूसरे देश में काम करने जाते हैं।
SSA के तीन मुख्य स्तंभ:
- डिटैचमेंट (Detachment): यदि कोई भारतीय कर्मचारी अल्पकालिक अवधि (जैसे 3-5 साल) के लिए विदेश जाता है, तो उसे उस देश की सामाजिक सुरक्षा प्रणाली में योगदान देने से छूट मिल जाती है, बशर्ते वह भारत में (EPFO में) अपना योगदान जारी रखे।
- निर्यात योग्यता (Exportability): यदि कोई व्यक्ति विदेश में काम करके वापस भारत आ जाता है, तो वह विदेश में जमा की गई अपनी पेंशन या लाभ को भारत में भी प्राप्त कर सकता है। लाभों को दूसरे देश में भेजने की इस प्रक्रिया को ‘एक्सपोर्टेबिलिटी’ कहते हैं।
- टोटलाइजेशन (Totalization): कई देशों में पेंशन पाने के लिए न्यूनतम 10 या 15 साल काम करना अनिवार्य होता है। यदि आपने 5 साल भारत में और 6 साल विदेश में काम किया है, तो SSA के तहत दोनों अवधियों को जोड़कर (5+6 = 11 वर्ष) आपको पेंशन का पात्र माना जा सकता है।
भारत की वर्तमान स्थिति:
- निर्यातक: भारत एक ‘श्रमिक निर्यातक’ देश है, इसलिए SSA हमारी आर्थिक कूटनीति का एक अनिवार्य हिस्सा है।
- सक्रिय समझौते: भारत ने अब तक 20 से अधिक देशों के साथ SSA पर हस्ताक्षर किए हैं। इनमें प्रमुख हैं:
- यूरोप: जर्मनी, फ्रांस, बेल्जियम, स्विट्जरलैंड, नीदरलैंड, और हाल ही में यूनाइटेड किंगडम (10 फरवरी 2026)।
- अन्य: कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, जापान, दक्षिण कोरिया।
- नोडल एजेंसी: भारत में इन समझौतों को लागू करने वाली मुख्य संस्था कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (EPFO) है।
- कवरेज प्रमाणपत्र (CoC): विदेश जाने वाले भारतीय पेशेवरों को EPFO से एक CoC लेना होता है, जिसे दिखाने पर उन्हें विदेशी देश में सामाजिक सुरक्षा कर देने से छूट मिल जाती है।
महत्व:
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CETA का अभिन्न अंग: यह समझौता जुलाई 2025 में हस्ताक्षरित भारत-यूके व्यापक आर्थिक व्यापार समझौते (CETA) का एक हिस्सा है। इसे 2026 की पहली छमाही में CETA के साथ ही पूरी तरह से लागू किया जाएगा।
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प्रेषण और बचत: दोहरे कर के हटने से भारतीय पेशेवरों की ‘डिस्पोजेबल इनकम’ (हाथ में आने वाला पैसा) बढ़ेगी। इससे भारत में आने वाले विदेशी मुद्रा प्रेषण में भी सकारात्मक वृद्धि की संभावना है।
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प्रतिभा गतिशीलता: यह समझौता भारत की ‘यंग स्किल्ड वर्कफोर्स’ के लिए वैश्विक बाजार खोलने की रणनीति का हिस्सा है। ब्रिटेन के लिए, यह उनके सेवा क्षेत्र में कुशल श्रम की कमी को दूर करने में सहायक होगा।
- प्रभावित जनसंख्या: अनुमान है कि इससे ब्रिटेन में कार्यरत लगभग 75,000 भारतीय पेशेवरों को सीधा लाभ होगा।
- क्षेत्र: विशेष रूप से आईटी (IT), वित्त, और इंजीनियरिंग जैसे सेवा क्षेत्रों की कंपनियों (जैसे TCS, Infosys) के लिए परिचालन लागत में भारी कमी आएगी।

