Tamil-Brahmi inscriptions Egypt

संदर्भ:
हाल ही में मिस्र की ‘वैली ऑफ द किंग्स’ (Valley of the Kings) में तमिल-ब्राह्मी शिलालेखों की खोज हुई, जो प्राचीन भारत और मिस्र के बीच व्यापारिक एवं सांस्कृतिक संबंधो की पुष्टि करता है।
तमिल-ब्राह्मी शिलालेख खोज के मुख्य बिंदु:
- स्थान: मिस्र के थेबन नेक्रोपोलिस में स्थित वैली ऑफ द किंग्स की कब्रों में लगभग 30 भारतीय शिलालेख पाए गए हैं। ये शिलालेख मुख्य रूप से पहली से तीसरी शताब्दी ईस्वी (1st–3rd Century CE) के हैं।
- शोधकर्ता: यह अध्ययन शार्लोट श्मिट (EFEO, पेरिस) और इंगो स्ट्रॉच (लुसाने विश्वविद्यालय, स्विट्जरलैंड) द्वारा किया गया।
- लिपि और भाषा: इन शिलालेखों में तमिल-ब्राह्मी (सबसे अधिक 20), प्राकृत, और संस्कृत का उपयोग किया गया है। कुछ शिलालेख गांधारी-खरोष्ठी लिपि में भी मिले हैं।
- शिलालेखों की प्रकृति: ये प्राचीन भारतीय आगंतुकों (व्यापारियों या दूतों) द्वारा मकबरों की दीवारों और गलियारों पर छोड़े गए संक्षिप्त ‘ग्रैफिटी’ (भित्ति-लेख) हैं।
- स्थानीय परंपरा: ये शिलालेख ग्रीक यात्रियों द्वारा छोड़े गए हजारों ग्रैफिटी के साथ पाए गए हैं। इससे पता चलता है कि भारतीय आगंतुक भी प्राचीन काल में स्मारकों को देखने और वहां अपनी के स्थानीय परंपरा का पालन कर रहे थे।
- नाम: शिलालेखों में कुछ विशिष्ट नाम और वाक्यांश पाए गए हैं। ‘सीकै कोट्टन’ (Cikai Koṟraṉ) नाम 5 अलग-अलग मकबरों में 8 बार मिला है। ‘सीकै’ का संबंध संस्कृत शब्द ‘शिखा’ (मुकुट/चोटी) से हो सकता है। ‘कोट्टन’ तमिल मूल शब्द ‘कोट्टम’ (विजय) से लिया गया है, जो चेर योद्धा परंपरा और देवी ‘कोट्टवई’ से संबंधित है।
- अन्य नाम: कोपान (Kopāṉ), चातन (Cātaṉ) और किरण (Kiraṉ) जैसे नाम भी मिले हैं। एक वाक्यांश है— “Kopāṉ varata kantan” (कोपान आया और देखा)।
- क्षहरात राजवंश: एक संस्कृत शिलालेख में पश्चिमी भारत के क्षहरात (Kshaharata) राजवंश के एक दूत का उल्लेख है, जो पहली शताब्दी ईस्वी में वहां पहुंचा था।
ऐतिहासिक और भौगोलिक महत्व:
- इंडो-रोमन व्यापार: यह खोज बेरेनीके और कुसीर अल-कादिम जैसे रेड सी बंदरगाहों से मिले पूर्व प्रमाणों की पुष्टि करती है। यह साबित करता है कि भारतीय व्यापारी बंदरगाहों तक ही सीमित नहीं थे, बल्कि मिस्र के अंदरूनी हिस्सों (नील घाटी) तक यात्रा करते थे।
- संगम साहित्य का प्रमाण: शिलालेखों में मिले नाम संगम काल के ग्रंथों (जैसे पुगलुर शिलालेख और चेर राजाओं के संदर्भ) से मेल खाते हैं, जो दक्षिण भारत की समुद्री शक्ति की पुष्टि करते हैं।
- वैश्विक नेटवर्क: संस्कृत, प्राकृत और तमिल-ब्राह्मी का एक साथ मिलना यह दर्शाता है कि प्राचीन भारत के उत्तर-पश्चिमी (गुजरात/महाराष्ट्र) और दक्षिणी (तमिलगाम) दोनों क्षेत्र वैश्विक व्यापार नेटवर्क का हिस्सा थे।
- पुरातात्विक साक्ष्य: यह ‘पेरिप्लस ऑफ द एरीथ्रियन सी’ (Periplus of the Erythraean Sea) जैसे प्राचीन ग्रीक ग्रंथों में वर्णित विवरणों को भौतिक साक्ष्य प्रदान करता है।
