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कश्मीरी पंडित समुदाय का हेरथ महोत्सव (Herath Festival of Kashmiri Pandit Community) | Ankit Avasthi Sir

Herath Festival of Kashmiri Pandit Community

Herath Festival of Kashmiri Pandit Community

संदर्भ:

हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कश्मीरी पंडित समुदाय को उनके सबसे महत्वपूर्ण त्योहार ‘हेरथ’ (Herath) के अवसर पर ‘हेरथ पोश्ते’ कहकर शुभकामनाएं दीं।

हेरथ महोत्सव के बारे मे:

    • परिचय: हेरथ महोत्सव कश्मीरी पंडित समुदाय का सबसे प्राचीन और महत्वपूर्ण सामाजिक-धार्मिक उत्सव है।
    • शाब्दिक अर्थ: ‘हेरथ’ शब्द संस्कृत के ‘हररात्रि’ (Hararatri) से निकला है, जिसका अर्थ है ‘शिव की रात’।
    • तिथि: यह महोत्सव फाल्गुन कृष्ण त्रयोदशी को मनाया जाता हैं।
    • पौराणिक मान्यता: माना जाता है कि इसी दिन भगवान शिव का विवाह माता पार्वती (सती) के साथ हुआ था। एक अन्य मान्यता के अनुसार, इसी दिन भगवान शिव ने ‘ज्वालालिंग’ के रूप में स्वयं को प्रकट किया था।
  • कश्मीरी शैव दर्शन: हेरथ का अनुष्ठान कश्मीरी शैव मत के ‘त्रिका’ (Trika) दर्शन पर आधारित है। ​यह दर्शन ‘अद्वैत’ (Monism) पर बल देता है, जहाँ शिव और शक्ति को एक ही माना जाता है।
  • पूजा: ​हेरथ पूजा में ‘वटुक नाथ’ (भगवान शिव का एक स्वरूप) की पूजा मुख्य होती है। वटुक का अर्थ है ‘ब्रह्मचारी’, जो ज्ञान और अनुशासन का प्रतीक है।
  • शंकराचार्य मंदिर: श्रीनगर स्थित शंकराचार्य मंदिर इस उत्सव का मुख्य केंद्र होता है, जहां श्रद्धालु विशेष पूजा-अर्चना करते हैं।
  • प्रमुख परंपराएँ: यह उत्सव 15 दिनों तक चलने वाला एक विस्तृत आयोजन है:
    • वटुक पूजा: घर के एक विशेष स्थान पर मिट्टी या तांबे के कलशों (जिन्हें ‘वटुक गद’ कहा जाता है) की स्थापना की जाती है। इन्हें पुष्पों और सिंदूर से सजाया जाता है।
    • अखरोट: ‘प्रसाद’ के रूप में अखरोट का उपयोग अनिवार्य है। अखरोट को पानी से भरे कलशों में रखा जाता है। अखरोट के चार भाग चार वेदों या चेतना के चार स्तरों (जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीय) का प्रतिनिधित्व करते हैं।
    • खान-पान की विशिष्टता: कश्मीरी पंडितों में हेरथ के दौरान मांसाहार (विशेषकर मछली) पकाने की भी परंपरा रही है, जो इसे देश के अन्य हिस्सों की ‘शाकाहारी’ शिवरात्रि से अलग है। 
    • सलाम (Salam): त्योहार के अगले दिन (अमावस्या) को ‘सलाम’ कहा जाता है। इस दिन मुस्लिम पड़ोसी अपने हिंदू मित्रों के घर जाकर ‘हेरथ पोश्ते’ (शुभकामनाएं) देते है।
    • सांस्कृतिक निरंतरता: 1990 के दशक में हुए विस्थापन के बाद भी, कश्मीरी पंडितों ने इस त्योहार को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़े रहने का सबसे सशक्त माध्यम बनाया है।

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