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हिमाचल प्रदेश में लोसार महोत्सव का आयोजन (Losar Festival celebrated in Himachal Pradesh) | Apni Pathshala

Losar Festival celebrated in Himachal Pradesh

Losar Festival celebrated in Himachal Pradesh

संदर्भ:

हिमाचल प्रदेश के मक्लोडगंज (धर्मशाला) में 18 से 20 फरवरी 2026 तक लोसार महोत्सव (Losar Festival) का आयोजन तिब्बती समुदाय द्वारा अत्यंत उत्साह के साथ किया जा रहा है।

लोसार महोत्सव के बारे में:

  • अर्थ: ​’लोसार’ शब्द दो तिब्बती शब्दों से मिलकर बना है— ‘लो’ (Lo) का अर्थ है ‘वर्ष’ और ‘सार’ (Sar) का अर्थ है ‘नया’।
  • ऐतिहासिक मूल: यह बौद्ध धर्म के आगमन से पूर्व ‘बोन’ (Bon) धर्म की परंपराओं में उल्लेखित हैं। इसे फसलों की कटाई और देवताओं को प्रसन्न करने के लिए एक ‘कृषि उत्सव’ के रूप में मनाया जाता था।
  • बौद्ध प्रभाव: 7वीं शताब्दी के बाद जब बौद्ध धर्म तिब्बत में फैला, तो इस उत्सव ने धार्मिक और आध्यात्मिक रूप ले लिया। वर्तमान में यह तिब्बती चंद्र कैलेंडर के पहले महीने के पहले दिन मनाया जाता है।
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  • वर्ष 2153: तिब्बती गणना के अनुसार, 18 फरवरी 2026 को ‘अग्नि अश्व वर्ष’ (Year of the Fire Horse) की शुरुआत हुई है।
  • गतिवधियां: लोसार का जश्न 15 दिनों तक चलता है, लेकिन पहले तीन दिन सबसे महत्वपूर्ण होते हैं:
      • प्रथम दिन (लामा लोसार): यह दिन गुरुओं और धर्म के प्रति समर्पित होता है। श्रद्धालु मठों (Monasteries) में जाते हैं, ‘मक्खन के दीपक’ (Butter Lamps) जलाते हैं और दलाई लामा जैसे आध्यात्मिक नेताओं का आशीर्वाद लेते हैं।
      • द्वितीय दिन (ग्यालपो लोसार): इसे ‘राजा का लोसार’ कहा जाता है। इस दिन समुदाय के लोग आपस में मिलते हैं और सार्वजनिक समारोहों में भाग लेते हैं। मैकलॉडगंज में इस दिन पारंपरिक ‘छम’ (Chham) नृत्य का प्रदर्शन होता है, जिसमें नर्तक रंगीन मास्क और वेशभूषा पहनते हैं।
      • तृतीय दिन (चोक्योंग लोसार): यह दिन रक्षक देवताओं (Dharma Protectors) को समर्पित है। लोग छतों पर नए प्रार्थना ध्वज (Prayer Flags) फहराते हैं और शांति एवं समृद्धि की कामना करते हैं।
  • रीति-रिवाज: 
    • मेथो (Metho) अनुष्ठान: लोग जलती हुई मशालें लेकर जुलूस निकालते हैं और मंत्रोच्चार करते हैं। माना जाता है कि अग्नि और मंत्रों की शक्ति से पिछले वर्ष की नकारात्मकता और बुरी शक्तियां दूर हो जाती हैं।
    • गुथुक (Guthuk) सूप: उत्सव की पूर्व संध्या पर एक विशेष सूप बनाया जाता है जिसमें आटे की गोलियाँ होती हैं। इन गोलियों के अंदर कोयला, ऊन या पत्थर जैसे प्रतीक रखे जाते हैं, जो व्यक्ति के व्यक्तित्व का प्रतिनिधित्व करते हैं।
    • चेमार (Chemar): यह भुने हुए जौ के आटे और मक्खन से भरा एक सजावटी लकड़ी का डिब्बा है, जो प्रचुरता और सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है।
    • खप्से (Khapse): यह एक पारंपरिक तले हुए आटे का व्यंजन है जिसे उत्सव के दौरान मेहमानों को परोसा जाता है।

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