Dokdo/Takeshima Island dispute
संदर्भ:
हाल ही में जापान द्वारा लियानकोर्ट रॉक्स में मनाए गए “ताकेशिमा दिवस” (Takeshima Day) के विरोध में दक्षिण कोरिया ने कड़ा राजनयिक विरोध दर्ज कराया है। दक्षिण कोरिया ने स्पष्ट किया कि डोकडो ऐतिहासिक, भौगोलिक और अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत उनका अभिन्न अंग है और जापान को इस तरह के “उकसावे वाले” दावों को तुरंत बंद करना चाहिए।
डोकडो/ताकेशिमा द्वीप के बारे में:
- स्थिति: भौगोलिक स्थिति: यह जापान सागर (Sea of Japan) में स्थित छोटे ज्वालामुखी द्वीपों का समूह है। इसे दक्षिण कोरिया ‘डोकडो’ और जापान ‘ताकेशिमा’ कहता है।
- कुल क्षेत्रफल: लगभग 0.18 वर्ग किलोमीटर। इसमें मुख्य रूप से दो बड़े द्वीप और लगभग 89 छोटी चट्टानें शामिल हैं।
- दूरी: यह दक्षिण कोरियाई द्वीप उलुंगडो से 87 किमी और जापानी ओकी द्वीप से 157 किमी दूर है।
- प्रशासन: वर्तमान में दक्षिण कोरिया का यहाँ प्रभावी नियंत्रण (Effective Control) है, जहाँ उसने एक छोटा पुलिस दस्ता, लाइटहाउस और संचार टावर स्थापित किए हैं।
- कठोर जलवायु: यहाँ तेज हवाएं और समुद्री कोहरा सामान्य है, जिससे यहाँ स्थायी वनस्पतियों का अभाव है।
- मत्स्य पालन: यह क्षेत्र ठंडी और गर्म समुद्री धाराओं के मिलन स्थल पर स्थित है, जिससे यहाँ ‘प्लैंकटन’ की प्रचुरता रहती है। यह इसे दुनिया के सबसे समृद्ध मत्स्यन क्षेत्रों (Fishing Grounds) में से एक बनाता है।
- गैस हाइड्रेट्स: वैज्ञानिक सर्वेक्षणों के अनुसार, इन द्वीपों के समुद्री तल में ‘मीथेन हाइड्रेट्स’ (Methane Hydrates) के विशाल भंडार मौजूद हैं, जो भविष्य में स्वच्छ ऊर्जा का प्रमुख स्रोत बन सकते हैं।
डोकडो/ताकेशिमा द्वीप विवाद:
- दक्षिण कोरिया (डोकडो के पक्ष में): सियोल का दावा है कि डोकडो ऐतिहासिक रूप से 512 ईस्वी (सिला साम्राज्य के दौरान) से कोरियाई क्षेत्र का हिस्सा रहा है।
- ऐतिहासिक दस्तावेज: कोरियाई ग्रंथ ‘सेजोंग सिलोक’ (1454) में इन द्वीपों का स्पष्ट उल्लेख है।
- 1900 की शाही डिक्री: कोरियाई साम्राज्य ने 1900 में आधिकारिक रूप से इन द्वीपों को उलुंगडो के अधिकार क्षेत्र में रखा था।
- जापानी साम्राज्यवाद: कोरिया का तर्क है कि 1905 में जापान ने इन पर जो कब्जा किया, वह कोरिया के औपनिवेशिक शोषण की शुरुआत थी, जिसे 1945 में स्वतंत्रता के बाद अमान्य कर दिया गया।
- जापान (ताकेशिमा के पक्ष में): टोक्यो का तर्क है कि ये द्वीप प्राचीन काल से जापान के “अभिन्न अंग” रहे हैं।
- टेरा नलियस (Terra Nullius): जापान का दावा है कि 1905 में जब उसने इन द्वीपों को अपने मानचित्र में शामिल किया, तब ये किसी भी राज्य के नियंत्रण में नहीं थे (लावारिस भूमि)।
- 1951 की सैन फ्रांसिस्को संधि: जापान के अनुसार, द्वितीय विश्व युद्ध के बाद हुई इस संधि में डोकडो को उन क्षेत्रों की सूची में शामिल नहीं किया गया था जिन्हें जापान को कोरिया को सौंपना था।
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- विवाद का मुख्य कारण: 1905 में 22 फरवरी को ही जापानी शिमाने प्रान्त ने इन द्वीपों को अपने प्रशासन में शामिल करने की घोषणा की थी। 2005 में, इस घटना के 100 वर्ष पूरे होने पर शिमाने प्रान्त ने ‘ताकेशिमा दिवस’ घोषित किया। दक्षिण कोरिया इसे अपनी संप्रभुता का अपमान और जापान के “साम्राज्यवादी अतीत के महिमामंडन” के रूप में देखता है।
- मध्यस्थता: जापान ने कई बार इस मुद्दे को अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) में ले जाने का प्रस्ताव दिया है। लेकिन दक्षिण कोरिया ने इसे हर बार खारिज कर दिया है। डोकडो कोई “विवादित क्षेत्र” नहीं है, बल्कि दक्षिण कोरिया का अपना क्षेत्र है। अतः, किसी तीसरे पक्ष की मध्यस्थता का प्रश्न ही नहीं उठता।
- US-Japan-South Korea त्रिपक्षीय गठबंधन: अमेरिका चाहता है कि ये दोनों देश उत्तर कोरिया और चीन के खिलाफ एकजुट रहें, लेकिन यह विवाद उनके बीच सहयोग (जैसे खुफिया जानकारी साझा करना – GSOMIA) को कमजोर करता है।
- भारत का दृष्टिकोण: भारत ‘नियम आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था’ (Rules-based International Order) का समर्थक है। भारत का रुख संतुलित है, वह समुद्री विवादों को UNCLOS (समुद्र के कानून पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन) के तहत शांतिपूर्ण ढंग से सुलझाने की वकालत करता है।

