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Kasturirangan Report क्या हैं? कर्नाटक विधानसभा ने क्यों किया इसे खारिज?

Kasturirangan Report क्या हैं? कर्नाटक विधानसभा ने क्यों किया इसे खारिज?

Kasturirangan Report

संदर्भ:

हाल ही में कर्नाटक विधानसभा (Karnataka Assembly) ने पश्चिमी घाट को पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र (ESA) घोषित करने संबंधी केंद्र सरकार की सातवीं मसौदा अधिसूचना और कस्तूरीरंगन रिपोर्ट (Kasturirangan Report) को सर्वसम्मति से खारिज किया। राज्य सरकार ने इसे त्रुटिपूर्ण बताते हुए केंद्र से समीक्षा की मांग की।

कस्तूरीरंगन रिपोर्ट क्या हैं?

  • परिचय: कस्तूरीरंगन रिपोर्ट पश्चिमी घाट के संरक्षण और सतत विकास के बीच संतुलन बनाने के लिए कस्तूरीरंगन समिति द्वारा प्रस्तुत की गई एक उच्च-स्तरीय कार्य समूह रिपोर्ट है।
  • गठन: पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा वर्ष 2012 में प्रसिद्ध अंतरिक्ष वैज्ञानिक डॉ. के. कस्तूरीरंगन की अध्यक्षता में एक उच्च-स्तरीय कार्य समूह (High-Level Working Group – HLWG) का गठन किया गया था।
  • उद्देश्य: इसका मुख्य उद्देश्य इससे पहले आई अत्यधिक सख्त माधव गाडगिल समिति (2011) की रिपोर्ट का समग्र मूल्यांकन करना और पर्यावरण संरक्षण व आर्थिक विकास के बीच एक व्यावहारिक संतुलन बनाना था।
  • रिपोर्ट प्रस्तुतीकरण: कस्तूरीरंगन समिति ने अपनी अंतिम रिपोर्ट 15 अप्रैल 2013 को केंद्र सरकार को सौंपी थी।
  • प्रमुख सिफारिशें: कस्तूरीरंगन समिति की रिपोर्ट (Kasturirangan Committee Report) में पश्चिमी घाट पर्यावरण संरक्षण (Western Ghats Environmental Protection) के लिए निम्नलिखित मुख्य बिंदु सुझाए गए:
  • 37% क्षेत्र का संरक्षण: पश्चिमी घाट के कुल भौगोलिक क्षेत्र का लगभग 37% हिस्सा (लगभग 59,940 वर्ग किलोमीटर) पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र (Ecologically Sensitive Area – ESA) घोषित किया जाए. इसमें गुजरात, महाराष्ट्र, गोवा, कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु शामिल हैं।
  • गतिविधियों पर पूर्ण प्रतिबंध: चिह्नित ईएसए (ESA) सीमाओं के भीतर खनन (Mining), उत्खनन (Quarrying), रेत खनन और अत्यधिक प्रदूषण फैलाने वाले ‘लाल श्रेणी’ (Red Category) के उद्योगों की स्थापना पर पूर्ण प्रतिबंध हो।
  • बुनियादी ढांचा विनियमन: जलविद्युत परियोजनाओं (Hydropower Projects) की अनुमति केवल सख्त पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (EIA) के बाद ही दी जाए, जबकि नए थर्मल पावर प्लांटों पर रोक हो।
  • परिदृश्य वर्गीकरण (Landscape Classification): रिपोर्ट ने पश्चिमी घाट को दो हिस्सों में बांटा: प्राकृतिक परिदृश्य (Natural Landscape – लगभग 90% वन क्षेत्र जिसे संरक्षित करना है) और सांस्कृतिक परिदृश्य (Cultural Landscape – मानव बस्तियाँ, कृषि और बागान क्षेत्र जिन्हें नियमों से छूट दी जा सकती है)।

कर्नाटक विधानसभा द्वारा रिपोर्ट खारिज किए जाने के मुख्य कारण:

Kasturirangan Report 2026 के विरोध में पारित प्रस्ताव (Karnataka Assembly Resolution) के पीछे के प्रशासनिक और सामाजिक-आर्थिक कारण निम्नलिखित हैं:

  • अवैज्ञानिक उपग्रह मानचित्रण (Unscientific Satellite Mapping): कर्नाटक सरकार (MP Government) का आरोप है कि रिपोर्ट पूरी तरह से उपग्रह डेटा (Satellite Data) पर आधारित है। बिना किसी जमीनी भौतिक सत्यापन (Ground Verification) के, केवल रिमोट सेंसिंग इमेज देखकर वास्तविक वन भूमि के साथ-साथ खेतों, बागानों और रिहायशी मकानों को भी संवेदनशील क्षेत्र (ESA) में शामिल कर लिया गया है.
  • आजीविका और विस्थापन का डर (Threat to Livelihood): केंद्र की सातवीं मसौदा अधिसूचना में कर्नाटक के 10 पहाड़ी जिलों के 1,449 गाँवों (लगभग 20,668 वर्ग किलोमीटर) को ईएसए में शामिल किया गया है। स्थानीय किसानों को डर है कि कृषि, भूमि लेनदेन (Land Transactions) और बागवानी पर प्रतिबंध लगने से उनका आर्थिक पतन हो जाएगा।
  • बुनियादी ढांचे का अवरुद्ध होना: ईएसए नियमों के कारण इन दुर्गम ग्रामीण क्षेत्रों में सड़क, बिजली लाइन, अस्पताल और पेयजल जैसी बुनियादी अवसंरचना विकास (Infrastructure Development) की योजनाएं पूरी तरह ठप हो जाएंगी।
  • विधिक एवं भूमि अधिकार संबंधी विसंगतियां: राज्य में पहले से ही बगायर हुकुम वन अधिकार (Bagair Hukum Forest Rights), डीम्ड फॉरेस्ट (Deemed Forests) और भूमि नियमितीकरण से जुड़े हजारों अदालती मामले लंबित हैं। नया कानून इन विवादों को और अधिक जटिल बना देगा।

कर्नाटक सरकार द्वारा केंद्र को दिए गए सुझाव और भावी कदम:

इस विवाद (Kasturirangan Report Controversy) को सुलझाने के लिए मुख्यमंत्री डी. के. शिवकुमार के नेतृत्व में राज्य विधानमंडल ने केंद्र सरकार के समक्ष निम्नलिखित वैकल्पिक प्रस्ताव रखे हैं:

  • केवल अधिसूचित वनों तक सीमित रखना: कर्नाटक की मांग है कि ईएसए (ESA) के कड़े प्रतिबंधों को केवल अधिसूचित सरकारी वन क्षेत्रों (Notified Forests) तक ही सीमित रखा जाए। मानव बस्तियों और कृषि भूमि को इससे पूर्णतः बाहर किया जाए।
  • एक वर्ष का समय और भौतिक सर्वेक्षण: राज्य ने केंद्र से इस अधिसूचना को एक वर्ष के लिए स्थगित रखने का अनुरोध किया है। इस अवधि में राजस्व और वन विभाग संयुक्त रूप से प्रत्येक संपत्ति के सर्वेक्षण नंबर (Survey Number) के आधार पर जमीनी स्तर पर वास्तविक भौतिक माप करेंगे.
  • उच्च-स्तरीय विशेषज्ञ समिति का गठन: राज्य सरकार एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में उच्च-स्तरीय समिति का गठन कर रही है। इसमें वैज्ञानिक, राजस्व अधिकारी और किसानों के प्रतिनिधि शामिल होंगे जो रिपोर्ट की कमियों को दूर करने के लिए संशोधन सुझाएंगे।
  • आर्थिक सहायता और दिशानिर्देश: कस्तूरीरंगन रिपोर्ट में प्रभावित होने वाले स्थानीय किसानों और श्रमिकों के वैकल्पिक आजीविका पुनर्वास के लिए केंद्र सरकार स्पष्ट वित्तीय पैकेज (Economic Assistance) के दिशानिर्देश जारी करे।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

प्रश्न 1: Kasturirangan Report क्या है?

उत्तर: यह पश्चिमी घाट (Western Ghats) के पारिस्थितिक संरक्षण और सतत विकास के बीच संतुलन बनाने के लिए डॉ. कस्तूरीरंगन की अध्यक्षता में वर्ष 2013 में सौंपी गई एक तकनीकी रिपोर्ट है।

प्रश्न 2: Kasturirangan Report में Western Ghats को लेकर क्या recommendation दी गई है?

उत्तर: रिपोर्ट में पश्चिमी घाट के 37% हिस्से को पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र (ESA) घोषित करने और वहाँ खनन, प्रदूषणकारी उद्योगों व बड़े निर्माणों पर प्रतिबंध लगाने की सिफारिश है।

प्रश्न 3: Karnataka Assembly ने Kasturirangan Report को क्यों reject किया?

उत्तर: क्योंकि उपग्रह डेटा आधारित इस रिपोर्ट (Karnataka Assembly Kasturirangan Report) में बिना जमीनी सत्यापन के किसानों के खेतों, बागानों और बस्तियों को भी प्रतिबंधित ईएसए दायरे में शामिल कर लिया गया है।

प्रश्न 4: Western Ghats में Ecologically Sensitive Area क्या होता है?

उत्तर: पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 के तहत चिह्नित ऐसा नाजुक जैविक क्षेत्र (Eco-Sensitive Area) जहाँ पर्यावरण क्षरण को रोकने के लिए व्यावसायिक और औद्योगिक गतिविधियों को विनियमित या प्रतिबंधित किया जाता है।

प्रश्न 5: Kasturirangan Report से Karnataka के किसानों पर क्या असर पड़ सकता है?

उत्तर: इसके लागू होने से किसानों की निजी संपत्तियों पर कड़े विधिक प्रतिबंध लग सकते हैं, जिससे कृषि विस्तार, बुनियादी ढांचा और भूमि मूल्य (Land Value) पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंका है।

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