Approval given for the proposal to rename Kerala as Keralam
संदर्भ:
हाल ही में प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में केंद्रीय कैबिनेट ने केरल राज्य का नाम बदलकर आधिकारिक तौर पर “केरलम” (Keralam) करने के प्रस्ताव को मंजूरी दी है।
- केरल विधानसभा ने जून 2024 में सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पारित किया था, जिसमें केंद्र सरकार से संविधान की पहली अनुसूची और आठवीं अनुसूची में बदलाव कर नाम “केरलम” करने का आग्रह किया गया था।
नाम बदलने का मुख्य कारण:
- भाषाई और सांस्कृतिक पहचान: मलयालम भाषा में राज्य का मूल नाम ‘केरलम’ है। 1956 में राज्यों का पुनर्गठन भाषाई आधार पर हुआ था। विधानसभा का तर्क है कि आधिकारिक नाम स्थानीय उच्चारण के अनुरूप होना चाहिए ताकि राज्य की सांस्कृतिक अस्मिता संरक्षित रहे।
- उपनिवेशवाद से मुक्ति (Decolonization): ‘केरल’ (Kerala) शब्द को अंग्रेजी और औपनिवेशिक प्रभाव का परिणाम माना जाता है। नाम परिवर्तन का उद्देश्य प्रशासनिक शब्दावली से “अंग्रजीकरण” (Anglicization) को हटाकर स्वदेशी ऐतिहासिक जड़ों को पुनर्स्थापित करना है।
- संवैधानिक एकरूपता: संविधान की पहली अनुसूची में राज्य ‘केरल’ के रूप में दर्ज है, जबकि स्थानीय स्तर पर ‘केरलम’ प्रचलित हैं। यह संशोधन आठवीं अनुसूची की सभी 22 भाषाओं में एक ही आधिकारिक नाम “केरलम” सुनिश्चित करेगा।
- ऐतिहासिक साक्ष्य: सम्राट अशोक के शिलालेखों (257 ईसा पूर्व) में ‘केरलपुत्र’ का उल्लेख है। ‘केरलम’ शब्द इसी प्राचीन विरासत और चेर राजवंश (Cheralam) की निरंतरता को दर्शाता है।
राज्य का नाम बदलने की संवैधानिक प्रक्रिया:
भारत में किसी राज्य का नाम बदलने की प्रक्रिया संविधान के अनुच्छेद 3 के अंतर्गत आती है।
- प्रारंभिक चरण (राज्य का संकल्प): सबसे पहले राज्य विधानसभा सर्वसम्मति से नाम बदलने का एक प्रस्ताव पारित कर केंद्र सरकार (गृह मंत्रालय) को भेजती है। जैसा कि केरल ने जून 2024 में किया।
- राष्ट्रपति की पूर्व अनुशंसा: अनुच्छेद 3 के तहत ऐसा कोई भी विधेयक संसद में केवल राष्ट्रपति की पूर्व अनुमति से ही पेश किया जा सकता है।
- राज्य को प्रेषण (परामर्श): विधेयक पेश करने से पहले राष्ट्रपति इसे संबंधित राज्य विधानमंडल को उनके विचार व्यक्त करने के लिए भेजते हैं। केरलम के मामले में, राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू अब ‘केरल (नाम परिवर्तन) विधेयक, 2026’ को केरल विधानसभा को भेजेंगी।
- समय सीमा और बाध्यता: राष्ट्रपति विधानसभा के लिए एक समय सीमा तय करते हैं। हालांकि, राज्य के विचार संसद पर बाध्यकारी नहीं हैं; संसद राज्य की सहमति के बिना भी आगे बढ़ सकती है।
- संसदीय अनुमोदन (साधारण बहुमत): विधेयक को संसद के किसी भी सदन में पेश किया जा सकता है और इसे साधारण बहुमत (उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों का 50% से अधिक) से पारित होना अनिवार्य है।
- अनुसूचियों में संशोधन: विधेयक पारित होने और राष्ट्रपति की अंतिम सहमति के बाद, संविधान की पहली अनुसूची (राज्यों के नाम) और चौथी अनुसूची (राज्यसभा सीटों का आवंटन) में बदलाव किया जाता है।
नाम परिवर्तन वाले राज्यों के उदाहरण:
- संयुक्त प्रांत (United Provinces) → उत्तर प्रदेश: 1950 में नाम बदला गया।
- मद्रास (Madras) → तमिलनाडु: 1969 में आधिकारिक तौर पर नाम परिवर्तित हुआ।
- मैसूर (Mysore) → कर्नाटक: 1973 में नाम बदला गया।
- लक्कादीव, मिनिकॉय और अमीनदीवी द्वीप → लक्षद्वीप: 1973 में नाम परिवर्तन।
- उत्तरांचल (Uttaranchal) → उत्तराखंड: 2007 में आधिकारिक नाम बदला गया।
- पॉन्डिचेरी (Pondicherry) → पुडुचेरी: 2006 में नाम परिवर्तन।
- उड़ीसा (Orissa) → ओडिशा: 2011 में 113वें संविधान संशोधन और ‘ओडिशा (नाम परिवर्तन) अधिनियम’ के माध्यम से।

