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बोर्ड ऑफ पीस (Board of peace) | Apni Pathshala

Board of peace

Board of peace

संदर्भ:

भारत ने हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा गठित ‘बोर्ड ऑफ पीस’ (Board of Peace) की पहली बैठक में ‘पर्यवेक्षक’ (Observer) के रूप में भाग लिया।

ट्रंप का ‘बोर्ड ऑफ पीस’ क्या है?

    • परिचय: डोनाल्ड ट्रंप का ‘बोर्ड ऑफ पीस’ अमेरिकी नेतृत्व वाला एक अंतरराष्ट्रीय संगठन है, जिसे गाजा में संघर्ष विराम की निगरानी, वहां के पुनर्निर्माण और भविष्य के शासन को संभालने के लिए स्थापित किया गया है। 
    • प्रस्ताव: इसे पहली बार सितंबर 2025 में ट्रंप की ‘गाजा संघर्ष समाप्त करने की व्यापक योजना’ (20-सूत्री रोडमैप) के हिस्से के रूप में प्रस्तावित किया गया था।
    • औपचारिक गठन: बोर्ड के चार्टर पर 22 जनवरी 2026 को दावोस में आयोजित ‘विश्व आर्थिक मंच’ (WEF) के दौरान हस्ताक्षर किए गए थे।
    • UNSC समर्थन: संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव 2803 (2025) ने गाजा शांति योजना की प्रक्रियाओं की निगरानी के लिए इस निकाय को मान्यता दी है। 
    • नेतृत्व: डोनाल्ड ट्रंप इसके आजीवन अध्यक्ष हैं।
    • कार्यकारी बोर्ड: इसमें अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो, जेरेड कुशनर, स्टीव विटकॉफ, ब्रिटेन के पूर्व पीएम टोनी ब्लेयर और विश्व बैंक के अध्यक्ष अजय बंगा शामिल हैं।
    • सदस्य देश: वर्तमान में 22 पूर्ण सदस्य हैं, जिनमें इज़राइल, सऊदी अरब, कतर, तुर्की, यूएई, पाकिस्तान, इंडोनेशिया और जॉर्डन प्रमुख हैं।
    • पर्यवेक्षक: भारत, यूरोपीय संघ, जर्मनी और इटली सहित 11 पर्यवेक्षक सदस्य हैं। 

मुख्य फोकस:

      • गाजा का पुनर्निर्माण: $70 बिलियन की अनुमानित लागत वाले गाजा पुनर्निर्माण के लिए वित्त और बुनियादी ढांचे की रूपरेखा तैयार करना।
      • सुरक्षा प्रबंधन: 20,000 सैनिकों की एक ‘अंतरराष्ट्रीय स्थिरता बल’ (ISF) और 12,000 कर्मियों वाली एक नई संक्रमणकालीन पुलिस बल की तैनाती की निगरानी करना।
      • अस्थायी शासन: जब तक फिलिस्तीनी प्राधिकरण सुधार पूरा नहीं कर लेता, तब तक गाजा के शासन और निवेश के लिए ढांचा प्रदान करना।
      • वैश्विक विस्तार: ट्रंप ने इसे गाजा से आगे बढ़कर यूक्रेन-रूस जैसे अन्य वैश्विक ‘हॉटस्पॉट्स’ में मध्यस्थता करने वाले एक “स्यूडो-सुरक्षा परिषद” के रूप में वर्णित किया है।

सहयोग:

    • फंडिंग: बोर्ड की पहली बैठक में लगभग $17 बिलियन की प्रतिज्ञा की गई है। इसमें अमेरिका ने $10 बिलियन और खाड़ी देशों (जैसे सऊदी अरब, कतर, यूएई) व अन्य ने $7 बिलियन का योगदान देने का वादा किया है।
    • सैन्य सहयोग: इंडोनेशिया ने ISF के लिए 8,000 सैनिकों की प्रतिबद्धता जताई है। मोरक्को, कजाकिस्तान और अल्बानिया ने भी सैनिक भेजने का वादा किया है, जबकि मिस्र और जॉर्डन पुलिस प्रशिक्षण पर ध्यान केंद्रित करेंगे। 

भारत का रुख:

  • रणनीतिक स्वायत्तता: भारत किसी भी ऐसे गठबंधन का हिस्सा बनने से बचता है जो संयुक्त राष्ट्र (UN) की प्रासंगिकता को कम करता हो। 
  • दो-राष्ट्र समाधान: भारत का पारंपरिक स्टैंड इज़राइल और फिलिस्तीन के लिए ‘टू-स्टेट सॉल्यूशन’ रहा है। इस बोर्ड में अभी तक किसी फिलिस्तीनी प्रतिनिधि को शामिल नहीं किया गया है।
  • सैन्य भागीदारी: भारत गाजा में प्रस्तावित अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा बल (ISF) में अपनी सेना नहीं भेजेगा, क्योंकि यह संयुक्त राष्ट्र शांति सेना (UN Peacekeeping) का हिस्सा नहीं है।

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