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क्या सर्वोच्च न्यायालय किसी राज्य द्वारा पारित अधिनियम को रोक सकता है (Can the Supreme Court halt an Act passed by a State) | Apni Pathshala

Can the Supreme Court halt an Act passed by a State

Can the Supreme Court halt an Act passed by a State

Can the Supreme Court halt an Act passed by a State – 

संदर्भ:

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा सहायक बलों (Auxiliary Forces) पर लाया गया कानून उसकी 2011 की उस व्यवस्था का उल्लंघन नहीं करता, जिसमें विशेष पुलिस अधिकारियों (SPOs) की नियुक्ति पर प्रतिबंध लगाया गया था। कोर्ट ने कहा कि वैध रूप से पारित कोई भी कानून अवमानना की श्रेणी में नहीं आता।

कानूनी पृष्ठभूमि और अदालती स्थिति:

2011 का सुप्रीम कोर्ट आदेश

  • मुख्य निर्देश:
  • छत्तीसगढ़ राज्य को निर्देश दिया गया कि वह विशेष पुलिस अधिकारियों (SPOs) का माओवाद विरोधी कार्यों में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से उपयोग बंद करे।
  • राज्य को सलवा जुडूम और कोया कमांडोज़ जैसे समूहों की गतिविधियों पर रोक लगाने का आदेश दिया गया।
  • भारत सरकार को निर्देश दिया गया कि वह SPOs की भर्ती में वित्तीय सहायता देना बंद करे, चाहे वह प्रत्यक्ष हो या परोक्ष।

संवैधानिक आधार: कोर्ट ने कहा कि कम वेतन और अल्प प्रशिक्षण वाले SPOs की नियुक्ति, अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) का उल्लंघन है।

सुप्रीम कोर्ट आदेश के बाद: नया कानून

छत्तीसगढ़ सहायक सशस्त्र पुलिस बल अधिनियम, 2011:

  • धारा 4(1): सहायक बल का गठन सुरक्षा बलों की सहायता के लिए किया जाएगा, विशेष रूप से माओवाद और नक्सल हिंसा की रोकथाम हेतु।
  • सहायक बल के सदस्य ऑपरेशन में फ्रंटलाइन पर तैनात नहीं होंगे, और वे हमेशा सुरक्षा बलों की निगरानी में काम करेंगे।
  • कम से कम 6 महीने का अनिवार्य प्रशिक्षण अनिवार्य किया गया।
  • SPOs की स्क्रीनिंग कमेटी द्वारा छंटनी कर योग्य लोगों को ही सहायक बल में शामिल किया जाएगा।

अदालत में चुनौती और सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला

  • याचिका: यह दलील दी गई कि नया अधिनियम 2011 के आदेश की अवमानना है।
  • सुप्रीम कोर्ट का निर्णय (Contempt Petition खारिज):
    • छत्तीसगढ़ सरकार ने सभी आदेशों का पालन किया।
    • किसी राज्य या संसद द्वारा पारित कोई भी कानून, केवल इसलिए अवमानना नहीं माना जा सकता कि वह कोर्ट के पुराने निर्णय के विपरीत है।
  • यदि कोई कानून संविधान के प्रावधानों का उल्लंघन नहीं करता, तो वह वैध है।
  • विधायिका को अधिकार है कि वह निर्णय के आधार को हटाकर नया कानून पारित करे या उसे वैध बनाए — यह संविधानिक लोकतंत्र में शक्तियों के पृथक्करण का मूल है।
  • अदालत कानून को केवल तभी असंवैधानिक घोषित कर सकती है जब वह विधायी अधिकार क्षेत्र से बाहर हो या संविधान का उल्लंघन करे।

Contempt of Court क्या है?

  • Contempt of Court का अर्थ है किसी न्यायालय की अवमानना, जिसमें ऐसे कृत्य शामिल होते हैं जो:
    • न्यायालय की प्राधिकृति, न्याय या प्रतिष्ठा को कमजोर या अपमानित करते हैं।
    • इससे न्याय का प्रशासन बाधित होता है या जन विश्वास को ठेस पहुँचती है।

Contempt of Courts Act, 1971 के अंतर्गत दो प्रकार:

  1. सिविल अवमानना: जानबूझकर किसी न्यायालय के आदेश, निर्णय या प्रतिज्ञा का उल्लंघन करना।
  2. दंडात्मक/आपराधिक अवमानना: ऐसा कोई भी कृत्य (बोला गया, लिखा गया या अन्य रूप में) जो:
    • न्यायालय की प्रतिष्ठा को बदनाम करे या उसकी प्रामाणिकता को कम करे।
    • न्यायिक कार्यवाही को पूर्वाग्रही बनाए या उसमें बाधा डाले।
    • न्याय प्रशासन में रुकावट उत्पन्न करे।

क्या अवमानना नहीं है?

  • न्यायिक कार्यवाहियों की निष्पक्ष और तथ्यात्मक रिपोर्टिंग।
  • निर्णय के निष्पादन के बाद न्यायिक फैसले की वाजिब और तार्किक आलोचना।

सजा का प्रावधान:

  • अधिकतम 6 माह की सादी कैद या ₹2,000 तक जुर्माना, या दोनों।
  • यदि माफी याचिका सच्चे हृदय से दी गई हो और न्यायालय उसे स्वीकार कर ले, तो सजा में छूट या माफी दी जा सकती है।

 

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