Centenary year celebration of Kalyan magazine

संदर्भ:
हाल ही में गृह मंत्री अमित शाह ने गीता प्रेस द्वारा प्रकाशित ‘कल्याण’ पत्रिका के शताब्दी वर्ष समारोह के अवसर पर इसे भारत की सांस्कृतिक चेतना का एक अजेय और मजबूत आधार स्तंभ बताया है।
कल्याण पत्रिका के बारे में:
- ‘कल्याण’ पत्रिका एक धार्मिक पत्रिका है, जो आधुनिक भारत में ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ और ‘नैतिक चेतना’ का एक सशक्त माध्यम बनी हुई है।
- इस पत्रिका का प्रकाशन गीता प्रेस, गोरखपुर द्वारा किया जाता है।
- ‘कल्याण’ का प्रकाशन जनवरी 1927 में प्रारंभ हुआ।
- इसके प्रथम और स्थायी संपादक हनुमान प्रसाद पोद्दार (भाई जी) थे, जिन्होंने इसे ‘आध्यात्मिक आंदोलन’ के रूप में विकसित किया।
- इस पत्रिका का उद्देश्य औपनिवेशिक काल में भारतीय समाज को पश्चिमीकरण के प्रभाव से बचाना था।
- कल्याण ने अब तक सनातन समर्पित 100 विशेषांक प्रकाशित किए हैं।
पत्रिका की विशिष्टता:
- व्यावसायिकता का अभाव: पत्रिका में आज भी कोई बाहरी विज्ञापन नहीं छपता। यह पूर्णतः पाठकों के सहयोग और न्यूनतम मूल्य पर आधारित है।
- प्रमाणिकता: इसके लेखों में शास्त्रों का संदर्भ और विद्वानों (जैसे- स्वामी अखंडानंद सरस्वती, डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन) के विचार इसे एक शोध-परक दस्तावेज बनाते हैं।
सांस्कृतिक एवं सामाजिक प्रभाव:
- सांस्कृतिक लोकतंत्रीकरण: मध्यकाल तक जो ज्ञान केवल संस्कृत के ज्ञाताओं तक सीमित था, ‘कल्याण’ ने उसे सरल हिंदी में रूपांतरित कर ‘ज्ञान के अधिकार’ का विस्तार किया।
- मूल्य-आधारित समाज का निर्माण: पत्रिका के विशेषांक (जैसे- नारी अंक, आदर्श बालक अंक, शिक्षा अंक) सामाजिक सुधार और चारित्रिक उत्थान पर केंद्रित रहे।
- अहिंसक प्रसार: 2021 में गीता प्रेस को गांधी शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। इसने यह सिद्ध किया कि ‘कल्याण’ ने बिना किसी विवाद या कट्टरता के, अहिंसक तरीके से भारतीय संस्कृति का संवर्धन किया है।
- स्वदेशी और भाषाई गौरव: ‘कल्याण’ ने हिंदी और मातृभाषा के प्रति गौरव को पुनर्जीवित किया। औपनिवेशिक काल के दौरान, जब अंग्रेजी शिक्षा हावी थी, ‘कल्याण’ ने अपनी जड़ों से जुड़े रहने का संदेश दिया।
- आधुनिक प्रासंगिकता: वर्तमान डिजिटल युग और सूचनाओं के विस्फोट के बीच, ‘कल्याण’ एक ‘सांस्कृतिक फिल्टर’ के रूप में कार्य करती है।
गीता प्रेस:
- गीता प्रेस विश्व का सबसे बड़ा हिंदू धार्मिक प्रकाशन संस्थान है, जिसकी स्थापना 29 अप्रैल 1923 को जयदयाल गोयंदका, घनश्याम दास जालान और हनुमान प्रसाद पोद्दार ने की थी।
- इसका प्राथमिक उद्देश्य सनातन धर्म के सिद्धांतों को अत्यंत कम मूल्य पर जन-जन तक पहुँचाना है।
- गीता प्रेस ने श्रीमद्भगवद्गीता, रामायण, पुराणों और उपनिषदों का सरल हिंदी और अन्य क्षेत्रीय भाषाओं में अनुवाद कर उन्हें आम जनता के लिए सुलभ बनाया।
- आज यह 15 से अधिक भाषाओं में करोड़ों पुस्तकें प्रकाशित कर भारत की ‘सॉफ्ट पावर’ को वैश्विक स्तर पर मजबूती दे रहा है।
