Constitutional clash in the Supreme Court over Section 17A of the Prevention of Corruption Act

संदर्भ:
सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में भ्रष्टाचार निवारण (PC) अधिनियम की धारा 17A की संवैधानिकता पर एक विभाजित फैसला (Split Verdict) सुनाया है, जो लोकसेवकों के खिलाफ जांच शुरू करने से पहले पूर्व-अनुमति अनिवार्य करती है।
धारा 17A क्या है?
- यह प्रावधान जुलाई 2018 में PC Act में संशोधन के ज़रिए जोड़ा गया था। इसके तहत किसी भी लोकसेवक के खिलाफ उसके आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन से जुड़े मामलों (जैसे सिफारिशें या निर्णय) की जांच शुरू करने से पहले सक्षम प्राधिकारी से पूर्व अनुमति लेना अनिवार्य है।
- इसका उद्देश्य लोकसेवकों को ‘पॉलिसी पैरालिसिस’ या ‘प्ले इट सेफ सिंड्रोम’ से बचाना है, ताकि वे बिना डरे फैसले ले सकें।
धारा 17A पर सुप्रीम कोर्ट का अलग-अलग मत:
-
- जस्टिस बी.वी. नागरत्ना का मत
- फ़ैसला: यह असंवैधानिक है। धारा 17A भ्रष्टाचार के खिलाफ कानून के मूल उद्देश्य को विफल करती है, जांच को रोकती है, और भ्रष्टों को बचाती है।
- समानता का उल्लंघन (Article 14): यह केवल कुछ उच्च-स्तरीय लोकसेवकों को सुरक्षा देकर भेदभाव करती है, जो अवैध और मनमाना वर्गीकरण है।
- निष्कर्ष: इसे रद्द किया जाना चाहिए क्योंकि यह जांच की प्रक्रिया में बाधा डालती है और भ्रष्टाचारियों को संरक्षण देती है।
- जस्टिस बी.वी. नागरत्ना का मत
- जस्टिस के.वी. विश्वनाथन का मत:
-
- फैसला: यह संवैधानिक है। धारा 17A ईमानदार अधिकारियों को बेवजह की जांच और प्रतिष्ठा के नुकसान से बचाती है, जो सामाजिक मीडिया के दौर में अपूरणीय क्षति पहुंचा सकता है।
- ‘बेहतर इलाज’ का तर्क: इसे रद्द करना समस्या से बुरा हो सकता है, क्योंकि इससे लोकसेवकों में निर्णय लेने की क्षमता और बाधित हो सकती है।
- संशोधन का सुझाव: उन्होंने सुझाव दिया कि अनुमति की प्रक्रिया को सरकार के बजाय लोकपाल/लोकायुक्त पर निर्भर किया जाए, ताकि निष्पक्षता बनी रहे।
आगे की राह
चूंकि दोनों न्यायाधीशों की राय अलग है, यह मामला अब भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) के पास भेजा गया है, जो इस मुद्दे को सुलझाने के लिए एक बड़ी बेंच (Larger Bench) का गठन करेंगे।
