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दूषित पेयजल का संकट (Crisis of contaminated drinking water) | Apni Pathshala

Crisis of contaminated drinking water

Crisis of contaminated drinking water

संदर्भ:

हाल ही में मध्य प्रदेश के इंदौर स्थित भागीरथपुरा क्षेत्र में दूषित पेयजल की आपूर्ति से गंभीर स्वास्थ्य संकट पैदा हो चुका है। भारत के “सबसे स्वच्छ शहर” का लगातार आठ बार खिताब जीतने वाले इंदौर में घटी यह घटना शहरी शासन और बुनियादी ढांचे के प्रबंधन पर गहरे सवाल उठाती है। 

भारत में दूषित पेयजल संकट:

  • विश्व आर्थिक मंच के अनुसार, भारत का लगभग 70% सतही जल पीने के योग्य नहीं है, और 90% सीवेज बिना उपचारित किए जल निकायों में छोड़ा जाता है, जिससे पानी प्रदूषित होता है।
  • नीति आयोग की CWMI रिपोर्ट के अनुसार, भारत गंभीर जल संकट से जूझ रहा है, जहाँ जल-जनित बीमारियाँ (जैसे हैजा, टाइफाइड) आर्थिक नुकसान का कारण बन रही हैं।
  • खुले में शौच और दोषपूर्ण सीवरेज लाइनों के कारण बैक्टीरिया (जैसे E. coli) और वायरस का पेयजल में मिलना पेयजल दूषित होने का मुख्य कारण माना जाता है। 
  • रासायनिक संदूषण इसके मुख्य कारकों में से एक माना जाता है। जैसे आर्सेनिक: मुख्य रूप से पश्चिम बंगाल और गंगा के मैदानी इलाकों में, फ्लोराइड: राजस्थान और मध्य भारत में, यूरेनियम और नाइट्रेट: कृषि में उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग में।
  • अनियोजित शहरीकरण के कारण पेयजल और सीवेज लाइनें एक-दूसरे के करीब हैं, जिससे ‘क्रॉस-कंटामिनेशन’ होता है।
  • जल स्तर गिरने से प्राकृतिक रूप से मौजूद भारी धातुओं की सांद्रता बढ़ जाती है। साथ ही शहरी स्थानीय निकायों (ULBs) के पास जल परीक्षण के लिए पर्याप्त धन और तकनीकी क्षमता का अभाव है।
  • जल प्रदूषण और पर्यावरणीय गिरावट से देश को सालाना ₹7.5 ट्रिलियन का नुकसान होता है, और भविष्य में GDP में 6% की कमी आ सकती है।

कानूनी ढांचा: 

  • अनुच्छेद 21: न्यायपालिका ने माना है कि स्वच्छ पानी का अधिकार ‘जीवन के अधिकार’ का हिस्सा है।
  • अनुच्छेद 47: राज्य का कर्तव्य है कि वह नागरिकों के पोषण स्तर और सार्वजनिक स्वास्थ्य में सुधार करे।
  • जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1974: जल प्रदूषण को रोकने के लिए कानूनी ढांचा प्रदान करता है।

सरकारी पहलें:

  • जल जीवन मिशन (JJM): 2024 तक सभी ग्रामीण घरों में ‘कार्यात्मक घरेलू नल कनेक्शन’ (FHTC) प्रदान करने का लक्ष्य।
  • AMRUT मिशन: शहरी क्षेत्रों में जल आपूर्ति और सीवरेज नेटवर्क का सुदृढ़ीकरण।
  • स्वच्छ भारत मिशन: स्वच्छता सुनिश्चित कर जल स्रोतों को जैविक संदूषण से बचाना।
  • नदियों का पुनरुद्धार: 351 प्रदूषित नदियों की पहचान कर उन्हें पुनर्जीवित करने के प्रयास।
  • अमृत 2.0: सभी शहरों को ‘जल सुरक्षित’ बनाने के लिए सार्वभौमिक जल आपूर्ति का लक्ष्य।

आगे की राह:

  • नियमित जल ऑडिट: प्रत्येक जिले में पेयजल की गुणवत्ता का अनिवार्य और डिजिटल ऑडिट होना चाहिए।
  • प्रौद्योगिकी का उपयोग: आर्सेनिक और फ्लोराइड हटाने के लिए ‘लो-कॉस्ट फिल्ट्रेशन’ तकनीकों को बढ़ावा देना।
  • विकेंद्रीकृत जल प्रबंधन: समुदायों को जल स्रोतों की सुरक्षा और प्रबंधन में शामिल करना (जैसे ‘पानी समितियां’)।
  • प्रदूषक भुगतान सिद्धांत (Polluter Pays Principle): जल स्रोतों को प्रदूषित करने वाले उद्योगों पर भारी जुर्माना और सख्त निगरानी।

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