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अमेरिकी कंपनी को भारत में परमाणु रिएक्टर बनाने की मंजूरी

सामान्य अध्ययन पेपर III: अंतर्राष्ट्रीय संधि और समझौते 

चर्चा में क्यों? 

भारत में परमाणु रिएक्टर: हाल ही में, अमेरिका ने होलटेक इंटरनेशनल कंपनी को भारत में परमाणु रिएक्टर डिजाइन और निर्माण करने की मंजूरी दी है। यह मंजूरी अमेरिकी विनियमन के तहत दी गई है, जिससे भारत-अमेरिका असैन्य परमाणु समझौते के तहत व्यावसायिक संभावनाओं के विस्तार का मार्ग प्रशस्त हुआ है।

भारत में परमाणु रिएक्टर की मंजूरी के मुख्य बिंदु:

  • होलटेक इंटरनेशनल को अमेरिकी ऊर्जा विभाग (DOE) से भारत में परमाणु रिएक्टर डिजाइन और निर्माण करने की मंजूरी मिली है।
  • कंपनी को 10CFR810 विनियमन के तहत भारत में तीन निजी भारतीय कंपनियों को अवर्गीकृत लघु मॉड्यूलर रिएक्टर (SMR) तकनीक हस्तांतरित करने की अनुमति मिली है।
  • यह तकनीक 10 वर्षों के लिए मान्य होगी, और हर 5 वर्षों पर इसका फिर से मूल्यांकन किया जाएगा।
  • यह मंजूरी होलटेक एशिया, टाटा कंसल्टिंग इंजीनियर्स, और लार्सन एंड टूब्रो जैसी कंपनियों को मिलने वाली प्रौद्योगिकी को लेकर है।
  • तकनीक और जानकारी का उपयोग केवल शांतिपूर्ण परमाणु गतिविधियों के लिए किया जाएगा, जो IAEA (International Atomic Energy Agency) के सुरक्षा उपायों के तहत नियंत्रित होंगे।
  • इसमें संवर्धन प्रौद्योगिकी या संवेदनशील परमाणु तकनीक तक पहुँच की अनुमति नहीं होगी।
  • साथ ही सैन्य या नौसैनिक प्रणोदन के लिए इस तकनीक का उपयोग प्रतिबंधित रहेगा।
  • अमेरिका की मंजूरी के बिना इस तकनीक का हस्तांतरण किसी अन्य देश या संस्था को नहीं किया जा सकेगा।
  • होलटेक को DOE (Department of Energy) को त्रैमासिक रिपोर्ट्स भेजनी होंगी।

यह समझौता भारत के लिए महत्वपूर्ण क्यों है?

  • तकनीकी उन्नति और वैश्विक प्रतिस्पर्धा में वृद्धि: यह समझौता भारत के लिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे भारत को नए और उन्नत परमाणु रिएक्टर तकनीक, विशेष रूप से छोटे मॉड्यूलर रिएक्टर (SMRs) के क्षेत्र में बड़ी प्रगति प्राप्त हो सकती है। वर्तमान में भारत का परमाणु कार्यक्रम मुख्य रूप से Pressurised Heavy Water Reactors (PHWRs) पर निर्भर है, जो वैश्विक मानकों से थोड़ा पिछड़ा हुआ है। 
  • निजी क्षेत्र की भागीदारी और घरेलू उत्पादन में वृद्धि: यह डील भारत में निजी क्षेत्र की महत्वपूर्ण भूमिका को बढ़ावा देती है, खासकर होलटेक, लार्सन एंड टुब्रो (L&T), और टाटा कंसल्टिंग इंजीनियर्स (TCE) जैसी प्रमुख कंपनियों के साथ सहयोग। इन कंपनियों के माध्यम से भारत में SMR घटकों का निर्माण किया जाएगा, जिससे देश की घरेलू निर्माण क्षमता मजबूत होगी। इससे आत्मनिर्भरता और स्थानीय उत्पादन की दिशा में एक मजबूत कदम उठाया जा सकेगा।
  • ऊर्जा सुरक्षा और स्वायत्तता में वृद्धि: यह समझौता भारत को अपने ऊर्जा सुरक्षा लक्ष्यों को प्राप्त करने में मदद करेगा। भारत में परमाणु ऊर्जा की आवश्यकता बढ़ रही है, और SMRs का निर्माण ऊर्जा उत्पादन के वैकल्पिक स्रोत के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। छोटे और अधिक कुशल रिएक्टरों की तकनीक से भारत को ऊर्जा आपूर्ति की स्थिरता मिल सकती है, और यह स्वच्छ ऊर्जा की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम होगा।
  • भारत-अमेरिका परमाणु सहयोग का विस्तार: यह डील भारत और अमेरिका के बीच परमाणु सहयोग को एक नई दिशा देती है, जो 2007 के 123 परमाणु समझौते के तहत हुआ था। अब यह समझौता पूरी तरह से लागू होने के कगार पर है। इसके परिणामस्वरूप, भारत को उन्नत रिएक्टर डिजाइन और उपकरणों के लिए अमेरिकी कंपनियों के साथ सहयोग करने का अवसर मिलेगा, जिससे दोनों देशों के बीच रणनीतिक साझेदारी मजबूत होगी।

भारत-अमेरिका परमाणु समझौता:

  • भारत-अमेरिका परमाणु समझौता, जिसे 2008 में हस्ताक्षरित किया गया था, भारत और अमेरिका के बीच परमाणु सहयोग को बढ़ावा देने वाला एक ऐतिहासिक कदम था। 
  • इस समझौते के तहत, अमेरिका ने भारत को नागरिक परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम के लिए परमाणु ईंधन और प्रौद्योगिकी आपूर्ति करने की अनुमति दी है।
  • भारत को इस समझौते के तहत अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) द्वारा अपने नागरिक परमाणु कार्यक्रम पर निरीक्षण की अनुमति देने की प्रतिबद्धता दी गई है।
  • इसे अधिकतर 123 समझौता भी कहा जाता हैं।
  • इस समझौते के तहत भारत ने अमेरिका से ड्यूल-यूज परमाणु प्रौद्योगिकी और समृद्धि उपकरण खरीदने का अधिकार प्राप्त किया है, जिसमें यूरेनियम संवर्धन और प्लूटोनियम पुनःप्रसंस्करण के लिए सामग्री और उपकरण शामिल थे।

लघु मॉड्यूलर रिएक्टर (SMRs) क्या होते हैं?

  • लघु या छोटे मॉड्यूलर रिएक्टर (SMRs) आधुनिक परमाणु रिएक्टर होते हैं जिन्हें सुरक्षा और दक्षता को बढ़ाने के लिए डिज़ाइन किया गया है। 
  • इनकी उत्पादन क्षमता आमतौर पर 30 MWe से कम से लेकर 300 MWe तक होती है। इनका मुख्य उद्देश्य छोटे, सुरक्षित और लागत-कुशल परमाणु ऊर्जा का उत्पादन करना है, जो विभिन्न स्थानों पर स्थापित किया जा सके।
  • वैश्विक स्तर पर, SMRs के लिए 80 से अधिक डिज़ाइनों का विकास और लाइसेंसिंग विभिन्न चरणों में है, और इनमें से कुछ पहले से ही परिचालन में हैं। 
  • प्रमुख विशेषता
    • SMRs की सबसे प्रमुख विशेषता है उनका आकार और मॉड्यूलर डिज़ाइन। ये पारंपरिक परमाणु रिएक्टरों से आकर में छोटे होते हैं, जिससे इन्हें विभिन्न स्थानों पर स्थापित करने में आसानी होती है।
    • इनका मॉड्यूलर डिज़ाइन इस प्रकार से किया जाता है कि इन्हें फैक्ट्री में पहले से ही असेंबल किया जा सकता है, जिससे इनका परिवहन और स्थापना आसान हो जाती है। 
    • इसके अलावा, ये रिएक्टर परमाणु विघटन (nuclear fission) का उपयोग करते हैं, जो ऊर्जा उत्पादन के लिए ऊष्मा उत्पन्न करते हैं।
  • इसके प्रकार
    • भूमि आधारित पानी से ठंडे SMRs: इनमें समग्र दबाव वाले पानी रिएक्टर जैसे डिज़ाइन शामिल हैं। ये रिएक्टर पारंपरिक और स्थापित प्रौद्योगिकियों का उपयोग करते हैं, और इनका निर्माण और संचालन अपेक्षाकृत सरल और सुरक्षित होता है। इन रिएक्टरों की क्षमता आमतौर पर 300 MWe तक होती है, जो बड़े पैमाने पर ऊर्जा उत्पादन के लिए उपयुक्त होते हैं।
    • समुद्री आधारित पानी से ठंडे SMRs: समुद्री वातावरण में उपयोग के लिए डिज़ाइन किए गए SMRs, जैसे तैरते हुए रिएक्टर जो बैराज़ या जहाजों पर स्थापित किए जाते हैं, समुद्र में ऊर्जा उत्पादन के लिए एक नए दृष्टिकोण को पेश करते हैं। ये रिएक्टर लचीले और परिवहन योग्य होते हैं, जो समुद्र के किनारे या दूरस्थ क्षेत्रों में ऊर्जा आपूर्ति का समाधान प्रदान करते हैं।
    • उच्च तापमान गैस से ठंडे SMRs (HTGRs): ये रिएक्टर 750 डिग्री सेल्सियस से अधिक तापमान उत्पन्न कर सकते हैं, जो उन्हें बिजली उत्पादन और विभिन्न औद्योगिक उपयोगों के लिए अत्यधिक प्रभावी बनाता है। उच्च तापमान गैस ठंडा तकनीक के कारण, यह रिएक्टर उच्च तापमान पर काम करते हुए भी सुरक्षित रहते हैं और लंबी अवधि तक ऊर्जा उत्पन्न करने में सक्षम होते हैं।
    • लिक्विड मेटल-ठंडे SMRs (LMFRs): ये रिएक्टर तेज नाभिकीय न्यूट्रॉन तकनीक का उपयोग करते हैं, जिसमें शीतलक के रूप में सोडियम और लेड जैसे लिक्विड मेटल का प्रयोग होता है। इन रिएक्टरों में उच्च तापमान पर संचालन की क्षमता होती है, और ये विशेष रूप से दीर्घकालिक ऊर्जा उत्पादन के लिए उपयुक्त होते हैं। 
    • गलनशील नमक रिएक्टर SMRs (MSRs): गलनशील नमक रिएक्टर में शीतलक के रूप में फ्लोराइड या क्लोराइड नमक का उपयोग किया जाता हैं, जो उन्हें लंबे समय तक ईंधन चक्र को बनाए रखने में मदद करता है। ये रिएक्टर भी उच्च तापमान पर कार्य कर सकते हैं और ऊर्जा उत्पादन के लिए अत्यधिक दक्ष होते हैं। इनके इस्तेमाल से परमाणु ऊर्जा की उपयोगिता बढ़ाई जा सकती है और ऊर्जा लागत में कमी आ सकती है।

होलटेक इंटरनेशनल के उन्नत लघु मॉड्यूलर रिएक्टर (SMR-300) की मुख्य विशेषता 

  • उन्नत प्रेशराइज्ड लाइट-वाटर रिएक्टर (PLWR): SMR-300 एक प्रेशराइज्ड लाइट-वाटर रिएक्टर है, जो कम समृद्ध यूरेनियम ईंधन का उपयोग करके परमाणु विघटन द्वारा बिजली उत्पन्न करता है। यह रिएक्टर कम से कम 300 मेगावाट (MWe) इलेक्ट्रिक पावर प्रदान करता है, जिससे यह ऊर्जा उत्पादन के लिए एक प्रभावी और विश्वसनीय समाधान है।
  • संकुचित और भूमि उपयोग में दक्ष: SMR-300 का डिज़ाइन परंपरागत परमाणु रिएक्टरों की तुलना में बहुत संकुचित है, जिससे इसे सीमित भूमि क्षेत्र में स्थापित किया जा सकता है। यह विशेषता इसे भारत जैसे देशों में मौजूदा कोयला संयंत्रों वाले स्थानों पर स्थापित करने के लिए उपयुक्त बनाती है, जहां पहले से मौजूद इंफ्रास्ट्रक्चर का उपयोग किया जा सकता है।
  • स्वच्छ ऊर्जा विकल्प: यह रिएक्टर पारंपरिक जीवाश्म ईंधन जैसे कोयला और गैस का एक प्रतिस्पर्धी और पर्यावरण-मित्र विकल्प है, खासकर जब बढ़ती ऊर्जा मांगों को पूरा करने के लिए स्वच्छ और स्थिर ऊर्जा स्रोतों की आवश्यकता होती है। यह भारत के स्वच्छ ऊर्जा लक्ष्यों विशेष रूप से AI और डेटा सेंटर जैसे उभरते क्षेत्रों के लिए ऊर्जा आपूर्ति को प्राप्त करने में मदद कर सकता है।
  • तकनीकी और आर्थिक लाभ: SMR-300 कम लागत वाली, सुरक्षित और पर्यावरणीय दृष्टि से बेहतर तकनीक है। यह बढ़ती ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के साथ-साथ सुरक्षित ऊर्जा उत्पादन को सुनिश्चित करने में सक्षम है।

भारत के परमाणु भविष्य में लघु मॉड्यूलर रिएक्टर (SMRs) का महत्व

  • शक्ति उत्पादन क्षमता: लघु मॉड्यूलर रिएक्टर (SMRs) को विभिन्न ऊर्जा आवश्यकताओं के अनुसार बढ़ाया या घटाया जा सकता है। यह लचीलापन भारत के तेजी से बढ़ते ऊर्जा संकट को हल करने में मदद कर सकता है। SMRs को मौजूदा थर्मल पावर स्टेशनों के साथ जोड़कर या पुराने थर्मल पावर स्टेशनों का पुनर्निर्माण करके शून्य-उत्सर्जन ईंधन के रूप में उपयोग किया जा सकता है। 
  • कम ईंधन की आवश्यकता: SMRs पारंपरिक रिएक्टरों के मुकाबले लंबे समय तक बिना ईंधन भरे काम कर सकते हैं। जहां पारंपरिक पावर प्लांट को 1 से 2 वर्षों में ईंधन भरने की आवश्यकता होती है, वहीं SMR-आधारित संयंत्र 3 से 7 वर्षों तक ईंधन का पुनःभराई कर सकते हैं। यह विशेषता भारत के ऊर्जा सुरक्षा और संयंत्र संचालन में अहम योगदान दे सकती है, क्योंकि यह ईंधन आपूर्ति की निर्भरता को कम करता है।
  • स्वचालित सुरक्षा सुविधाएं: SMRs में पैसिव सेफ्टी फीचर्स होते हैं, जो भौतिकी पर आधारित होते हैं और बिना बिजली या मानव हस्तक्षेप के रिएक्टर को बंद करने और शीतलन करने में सक्षम होते हैं। भारत में जहां बड़े रिएक्टरों की सुरक्षा चिंता का विषय रही है, वहां SMRs इस चिंता को सुलझाने में मदद कर सकते हैं।
  • आर्थिक और पर्यावरणीय फायदे: SMRs को स्थापित करने की लागत पारंपरिक बड़े रिएक्टरों की तुलना में कम हो सकती है। इसके अलावा, इनके संचालन और रखरखाव में भी कम खर्च आता है, जो ऊर्जा उत्पादन को अधिक आर्थिक रूप से सक्षम बनाता है। भारत में जहां ऊर्जा की बढ़ती मांग के साथ-साथ पर्यावरणीय समस्याएं भी एक चुनौती हैं, SMRs इन दोनों समस्याओं का समाधान प्रदान कर सकते हैं।

भारत में लघु मॉड्यूलर रिएक्टर (SMRs) निर्माण से संबंधित चुनौतियाँ

  • कानूनी बाधाएँ: भारत का नागरिक परमाणु क्षति विधेयक (2010) और परमाणु ऊर्जा अधिनियम (1962) विदेशी निवेशकों के लिए बाधक बने हुए हैं। इन कानूनों के तहत, विदेशी कंपनियों के लिए भारत में परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में निवेश करना कठिन हो जाता है, क्योंकि इसमें जोखिम और जिम्मेदारी की कानूनी धाराएँ शामिल हैं। इसके अलावा, परमाणु ऊर्जा उत्पादन केवल सरकारी संस्थाओं के लिए निर्धारित है, जिससे निजी कंपनियों की भागीदारी सीमित हो जाती है।
  • नियामक चुनौतियाँ: SMR तकनीक को लागू करने में विभिन्न तकनीकी और नियामक चुनौतियाँ हैं। हर SMR डिज़ाइन के लिए अलग-अलग नियम और मानक होते हैं, जिससे उनके बड़े पैमाने पर कार्यान्वयन में कठिनाई होती है। वर्तमान में भारत का परमाणु तकनीकी ढांचा मुख्य रूप से भारी जल रिएक्टरों और प्राकृतिक यूरेनियम पर आधारित है, जो वैश्विक रूप से प्रचलित लाइट वॉटर रिएक्टरों (LWRs) से मेल नहीं खाता है। इसके लिए नई तकनीकी विशेषज्ञता और क्षमता विकसित करना आवश्यक है।
  • कचरा प्रबंधन: SMRs रेडियोधर्मी कचरे का उत्पादन करते हैं, जिसका सुरक्षित निस्तारण और भंडारण आवश्यक है। इसके लिए उपयुक्त सुविधाओं की आवश्यकता है। भारत में इस कचरे को समुचित तरीके से निपटाने के लिए आवश्यक बुनियादी ढांचा अभी पूरी तरह से विकसित नहीं है, जिससे सामाजिक और राजनीतिक प्रतिरोध उत्पन्न हो सकता है।
  • बाह्य लागत: SMRs के निर्माण, संचालन और निस्तारण में उच्च बाह्य लागत की आवश्यकता होती हैं। यह लागत न केवल तकनीकी और सुरक्षा उपायों से जुड़ी होती है, बल्कि कचरे के सुरक्षित निस्तारण, पर्यावरणीय प्रभावों को कम करने, और उचित रख-रखाव के लिए भी होती है। यह लागत SMR परियोजनाओं को आर्थिक दृष्टि से अधिक चुनौतीपूर्ण बनाती हैं।

UPSC पिछले वर्षों के प्रश्न (PYQs) 

प्रश्न (2011): परमाणु रिएक्टर में भारी पानी का कार्य क्या है?

(a) न्यूट्रॉन की गति को धीमा करना 

(b) न्यूट्रॉन की गति को बढ़ाना 

(c) रिएक्टर को ठंडा करना 

(d) परमाणु प्रतिक्रिया को रोकना 

उत्तर: (a)

प्रश्न (2018): बढ़ती ऊर्जा जरूरतों के साथ क्या भारत को अपने परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम का विस्तार जारी रखना चाहिए? परमाणु ऊर्जा से जुड़े तथ्यों और आशंकाओं पर चर्चा करें। 

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