संदर्भ:
सरहुल उत्सव : झारखंड और छोटानागपुर क्षेत्र के आदिवासी समुदाय 1 अप्रैल 2025 को सरहुल उत्सव मनाएंगे, जो नववर्ष और वसंत ऋतु के आगमन का प्रतीक है।
सरहुल उत्सव के बारे में:
- सरहुल झारखंड राज्य का नववर्ष उत्सव है, जिसे स्थानीय सरना धर्म के तहत आदिवासी समुदायों द्वारा मनाया जाता है।
- इसे हिंदू पंचांग के चैत्र महीने में, अमावस्या के तीन दिन बाद मनाया जाता है।
- यह वसंत ऋतु के आगमन का उत्सव भी है।
- सरहुल में प्रकृति पूजा: “सरहुल” का अर्थ है साल वृक्ष की पूजा, जो प्रकृति आराधना पर आधारित एक प्रमुख आदिवासी पर्व है।
साल वृक्ष का महत्व:
- साल वृक्ष (Shorea robusta) आदिवासी संस्कृति में पवित्र स्थान रखता है।
- इसे “सरना मां” (गाँव की रक्षक देवी) का निवास स्थान माना जाता है।
- यह आजीविका का स्रोत होने के साथ-साथ सूर्य और पृथ्वी के बीच की एकता का प्रतीक भी है, जो जीवन के लिए आवश्यक है।
ऐतिहासिक संदर्भ:
- सरहुल का प्रारंभिक रूप शिकार से जुड़ा था, लेकिन समय के साथ यह कृषि केंद्रित पर्व बन गया, जो आदिवासी जीवनशैली में हुए बदलाव को दर्शाता है।
- 19वीं और 20वीं शताब्दी में, जब आदिवासी समुदायों कोविस्थापन का सामना करना पड़ा, तो यह पर्व असम सहित नेपाल और भूटान जैसे देशों तक फैल गया।
सरहुल उत्सव की विशेषताएँ:
- तीन दिवसीय उत्सव, जो सरना स्थलों (पवित्र उपवनों) में मनाया जाता है।
- गाँव की देवी “सरना माँ” को साल के फूल अर्पित किए जाते हैं।
- जदुर, गेना और पोर जदुर जैसे पारंपरिक नृत्य प्रस्तुत किए जाते हैं।
- समुदायिक भोज (Community Feast) और हंडिया (चावल की बीयर) का सेवन अंतिम दिन किया जाता है।
- अनुष्ठान पूरा होने के बाद ही खेती-बाड़ी और हल चलाने का कार्य आरंभ होता है।
आधुनिक समय में सरहुल उत्सव :
- मुंडा, संथाल और उरांव सहित विभिन्न जनजातियाँ इसे अपनी अनूठी परंपराओं के साथ मनाती हैं।
- यह पर्व आदिवासी संस्कृति और एकता का प्रतीक बना हुआ है।
- पारंपरिक आस्थाओं के साथ–साथ आधुनिक सामाजिक आंदोलनों को भी यह उत्सव दर्शाता है।