Dandi march
संदर्भ:
12 मार्च 2026 को दांडी मार्च (नमक सत्याग्रह) की 96वीं वर्षगांठ मनाई गई। यह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक है, जिसने ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिला दी थी।
परिचय:
- दांडी मार्च, जिसे ‘नमक सत्याग्रह’ के रूप में भी जाना जाता है, महात्मा गांधी के नेतृत्व में एक अहिंसक सविनय अवज्ञा आंदोलन था। इसकी शुरुआत 12 मार्च 1930 को हुई और यह 6 अप्रैल 1930 तक चला।
पृष्ठभूमि:
- नमक कानून (Salt Act 1882): अंग्रेजों ने नमक के उत्पादन और बिक्री पर एकाधिकार कर लिया था। नमक जैसी बुनियादी जरूरत पर कर लगाना भारतीयों, विशेषकर गरीबों के लिए अत्यंत दमनकारी था।
- पूर्ण स्वराज की घोषणा: दिसंबर 1929 के लाहौर अधिवेशन में कांग्रेस ने ‘पूर्ण स्वराज’ का संकल्प लिया था। गांधीजी को सविनय अवज्ञा शुरू करने के लिए अधिकृत किया गया।
- गांधीजी की 11 माँगें: आंदोलन से पहले गांधीजी ने वायसराय लॉर्ड इरविन को 11 माँगें (जैसे नमक कर की समाप्ति, भू-राजस्व में 50% कटौती, राजनीतिक कैदियों की रिहाई) भेजी थीं, जिन्हें अस्वीकार कर दिया गया।
यात्रा का विवरण:
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- प्रारंभ: 12 मार्च 1930, साबरमती आश्रम (अहमदाबाद)।
- गंतव्य: दांडी (नवसारी जिला, गुजरात तट)।
- दूरी और समय: 241 मील (लगभग 385-390 किमी), 24 दिनों की पैदल यात्रा।
- प्रतिभागी: शुरुआत में 78 अनुशासित स्वयंसेवक (साबरमती आश्रम के निवासी), बाद में हजारों लोग शामिल हुए।
- कानून का उल्लंघन: 6 अप्रैल 1930 को सुबह 8:30 बजे दांडी तट पर गांधीजी ने मुट्ठी भर नमक उठाकर प्रतीकात्मक रूप से नमक कानून तोड़ा। उन्होंने घोषणा की, “इसके साथ, मैं ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिला रहा हूँ”।
- विस्तार:
- तमिलनाडु: सी. राजगोपालाचारी ने तिरुचिरापल्ली से वेदारण्यम तक नमक यात्रा निकाली।
- मालाबार (केरल): के. केलप्पन ने कालीकट से पय्यानूर तक मार्च किया।
- उत्तर-पश्चिम सीमा प्रांत: खान अब्दुल गफ्फार खान (सीमांत गांधी) ने ‘खुदाई खिदमतगार’ (लाल कुर्ती) आंदोलन का नेतृत्व किया।
- धरसाना सत्याग्रह: गांधीजी की गिरफ्तारी के बाद सरोजिनी नायडू ने धरसाना नमक कारखाने पर अहिंसक धावा बोला।
- दमन: ब्रिटिश सरकार ने भारी दमन किया, लगभग 60,000 से अधिक लोगों को गिरफ्तार किया गया, जिनमें गांधीजी, जवाहरलाल नेहरू और अन्य प्रमुख नेता शामिल थे।
महत्त्व और प्रभाव:
- जन भागीदारी: पहली बार महिलाओं (जैसे सरोजिनी नायडू, कमलादेवी चट्टोपाध्याय), किसानों और शहरी मध्यम वर्ग ने बड़े पैमाने पर हिस्सा लिया।
- वैश्विक ध्यान: अमेरिकी पत्रकार वेब मिलर की रिपोर्टिंग ने ब्रिटिश क्रूरता को दुनिया के सामने उजागर किया।
- आर्थिक बहिष्कार: विदेशी कपड़ों का आयात आधा हो गया और सरकारी राजस्व में भारी गिरावट आई।
- राजनीतिक परिणाम: इस दबाव के कारण 1931 में ‘गांधी-इरविन समझौता’ हुआ और गांधीजी ने दूसरे गोलमेज सम्मेलन में भाग लिया।
