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खींचना महोत्सव परंपरा और बाल अधिकारों के बीच संघर्ष (Drag Festival Conflict Between Tradition and Child Rights) | UPSC Preparation

Drag Festival Conflict Between Tradition and Child Rights

Drag Festival Conflict Between Tradition and Child Rights

संदर्भ:

हाल ही में जारी एक रिपोर्ट के अनुसार खींचना महोत्सव, जिसे पारंपरिक रूप से राजस्थान के जनजाति समुदायों में मनाया जाता है, वर्तमान में राजस्थान के दक्षिणी जनजातीय क्षेत्रों में बाल अधिकारों के हनन और शिक्षा में बाधा का प्रमुख कारण बन रहा है।

खींचना महोत्सव क्या है?

  • खींचना महोत्सव (Kheechna Festival) मुख्य रूप से राजस्थान के दक्षिणी जनजातीय जिलों (जैसे कोटड़ा, उदयपुर) के भील और गरासिया समुदायों द्वारा मनाया जाने वाला एक उत्सव है।
  • पारंपरिक रूप से, यह होली के अवसर पर मनाया जाता है, जो कि सात दिवसीय होता है।
  • इसे ‘भगोरिया’ के नाम से भी जाना जाता है। इसमें किशोर और युवा अपनी पसंद का साथी चुनने के लिए स्वतंत्र होते हैं। 
  • हालिया समय में तकनीकी हस्तक्षेप के कारण यह वार्षिक उत्सव से बदलकर एक ‘वर्ष भर चलने वाली परिघटना’ बन गया है। 

बाल अधिकार एवं सामाजिक चिंताएं:

  • शिक्षा में बाधा (Right to Education – Article 21A): कोटड़ा जैसे क्षेत्रों में, कई लड़कियाँ साथी चुनने के बाद पढ़ाई छोड़ देती हैं। आंकड़ों के अनुसार, ऐसी अधिकांश लड़कियाँ 14 से 16 वर्ष की आयु की होती हैं।
  • स्वास्थ्य जोखिम (Anemia and Adolescent Pregnancy): कम उम्र में अनौपचारिक मिलन के कारण लड़कियां बहुत कम आयु में माँ बन जाती हैं। उचित चिकित्सा परामर्श के अभाव में मातृ मृत्यु दर में वृद्धि की संभावना बनी रहती है। 
  • तकनीकी प्रभाव (Role of Technology): मोबाइल फोन ने इस पारंपरिक प्रक्रिया को ‘डिजिटलाइज’ कर दिया है। सोशल मीडिया और रील संस्कृति के प्रभाव में किशोर बिना परिणामों को समझे ऐसे कदम उठाते हैं, जिसे Down To Earth की रिपोर्ट में “पसंद की कीमत” (Cost of Choice) कहा गया है। 

कानूनी और संवैधानिक पेच:

  • बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम (PCMA), 2006: यह अधिनियम औपचारिक विवाह पर लागू होता है। चूंकि ‘खींचना’ में कोई औपचारिक रस्म या पंजीकरण नहीं होता, इसलिए ये संबंध कानूनी रूप से ‘विवाह’ की श्रेणी में नहीं आते, जिससे प्रशासन को हस्तक्षेप करने का कानूनी आधार नहीं मिलता।
  • संवैधानिक विरोधाभास: यह मुद्दा अनुच्छेद 29 (अल्पसंख्यकों की संस्कृति का संरक्षण) और अनुच्छेद 21, 24 (जीवन का अधिकार और बच्चों का शोषण से संरक्षण) के बीच संतुलन की मांग करता है। 

प्रशासनिक एवं सरकारी पहल:

  • जागरूकता अभियान: स्कूलों और समुदायों में स्वास्थ्य और कानूनी अधिकारों के बारे में जानकारी देना।
  • डिजिटल साक्षरता: समुदायों को मोबाइल फोन के सुरक्षित उपयोग के लिए प्रेरित करना।
  • फ्लैगशिप योजनाएं: राजस्थान की ‘मुख्यमंत्री राजश्री योजना’ और ‘लाडो प्रोत्साहन योजना’ के माध्यम से लड़कियों की शिक्षा सुनिश्चित करने के प्रयास किए जा रहे हैं।

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