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झारखंड में गिद्धों के संरक्षण का प्रयास (Efforts to conserve vultures in Jharkhand) | Apni Pathshala

Efforts to conserve vultures in Jharkhand

Efforts to conserve vultures in Jharkhand

संदर्भ:

हाल ही में बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी (BNHS) और झारखंड वन विभाग के बीच गिद्धों की लुप्तप्राय प्रजातियों के संरक्षण के लिए एक महत्वपूर्ण समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर हुए हैं।

BNHS और झारखंड सरकार के बीच समझौता:

  • समय: दोनों के बीच 5 साल का एक समझौता हुआ है। 
  • मुख्य फोकस: इसमें झारखंड के हजारीबाग जिले पर मुख्य फोकस किया जाएगा, यह जिला गिद्धों के प्रजनन और संरक्षण के लिए एक आदर्श क्षेत्र माना गया है।
  • Vulture Safe Zone (VSZ): हजारीबाग के आसपास 100 किलोमीटर के दायरे को ‘गिद्ध सुरक्षित क्षेत्र’ के रूप में विकसित करना।
  • निगरानी और टैगिंग: गिद्धों की आबादी पर नज़र रखने के लिए सैटेलाइट टेलीमेट्री और जीपीएस टैगिंग का उपयोग।
  • जन जागरूकता: स्थानीय समुदायों और पशुपालकों को हानिकारक दवाओं (जैसे डाइक्लोफेनाक) के उपयोग के प्रति सचेत करना। 

भारतीय गिद्ध (Indian Vulture – Gyps indicus):

  • वैज्ञानिक नाम: Gyps indicus (इसे लंबी चोंच वाला गिद्ध भी कहा जाता है)।
  • विशेषता: यह मध्यम आकार का शिकारी पक्षी है, जिसका सिर गंजा होता है और चोंच काफी लंबी व मजबूत होती है। यह मुख्य रूप से पहाड़ियों की चट्टानों पर प्रजनन करता है।
  • झारखंड में गिद्धों की स्थिति: झारखंड में मुख्य रूप से गिद्धों की तीन प्रजातियां पाई जाती हैं: ओरिएंटल व्हाइट-बैक्ड वल्चर, लॉन्ग-बिल्ड वल्चर, स्लेंडर-बिल्ड वल्चर। ये तीनों प्रजातियां IUCN Red List में गंभीर रूप से लुप्तप्राय श्रेणी में सूचीबद्ध हैं।

गिद्धों का पारिस्थितिक महत्व:

  • गिद्धों को ‘प्रकृति का सफाईकर्मी’ कहा जाता है। वे मृत पशुओं के शवों को खाकर पर्यावरण से एंथ्रैक्स, रेबीज और प्लेग जैसी बीमारियों को फैलने से रोकते हैं। गिद्धों की अनुपस्थिति में आवारा कुत्तों की आबादी बढ़ती है, जिससे जूनोटिक रोगों का खतरा बढ़ जाता है। 

संकट के मुख्य कारण:

  • डाइक्लोफेनाक (Diclofenac): यह पशुओं को दिया जाने वाला एक दर्द निवारक (NSAID) है। जब गिद्ध ऐसे मृत पशु का मांस खाते हैं, तो उनकी किडनी फेल हो जाती है। हालांकि भारत सरकार ने 2006 में इस पर प्रतिबंध लगा दिया था, लेकिन इसका अवैध उपयोग अभी भी एक चुनौती है।
  • आवास का विनाश: शहरीकरण और पेड़ों की कटाई से गिद्धों के घोंसले बनाने की जगह कम हो रही है।
  • भोजन की कमी: मृत पशुओं के निपटान के आधुनिक तरीकों ने गिद्धों के लिए भोजन की उपलब्धता कम कर दी है। 

संरक्षण हेतु सरकारी पहल:

  • कार्य योजना: भारत सरकार का ‘गिद्ध संरक्षण कार्य योजना 2020-25’ निम्नलिखित बिंदुओं पर जोर देता है: विषाक्त दवाओं का विनियमन, देश भर में 8 अतिरिक्त संरक्षण प्रजनन केंद्र (Vulture Conservation Breeding Centres) स्थापित करना, गिद्धों के लिए सुरक्षित क्षेत्रों (VSZ) का विस्तार।
  • प्रजनन केंद्र: पिंजौर (हरियाणा), भोपाल, गुवाहाटी और हैदराबाद में ‘जटायु संरक्षण एवं प्रजनन केंद्र’ (JCBC) कार्यरत हैं।
  • गिद्ध सुरक्षित क्षेत्र (Vulture Safe Zones): ऐसे क्षेत्र जहाँ 100 किमी के दायरे में डिक्लोफेनाक का उपयोग शून्य सुनिश्चित किया जाता है।

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