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लोक सभा उपाध्यक्ष पद का चुनाव (Election of the Deputy Speaker of Lok Sabha) | UPSC Preparation

Election of the Deputy Speaker of Lok Sabha

सामान्य अध्ययन पेपर II: संसद, राज्य विधानमंडल 

(Election of the Deputy Speaker of Lok Sabha) चर्चा में क्यों? 

हाल ही में संसद के मानसून सत्र के शुरू होने से पहले विपक्षी नेताओं के द्वारा लोकसभा में छह साल से रिक्त उपाध्यक्ष पद के चुनाव की प्रक्रिया शुरू करने की मांग की गई है।

लोकसभा उपाध्यक्ष का परिचय

  • भारतीय संविधान के अनुच्छेद 93 के तहत लोकसभा में एक अध्यक्ष (Speaker) और एक उपाध्यक्ष (Deputy Speaker) का चुनाव अनिवार्य रूप से किया जाना चाहिए। 
  • यह प्रावधान सुनिश्चित करता है कि जब अध्यक्ष अनुपस्थित हों या किसी कारणवश कार्य न कर सकें, तो उपाध्यक्ष उनकी जिम्मेदारियाँ संभाल सकें। 
  • यह पद सहायक भूमिका निभाने के साथ साथ स्वतंत्र रूप से भी संवैधानिक अधिकार रखता है।
  • लोकसभा की कार्यवाही सुचारु रूप से संचालित हो सके, इसके लिए उपाध्यक्ष का पद आवश्यक है। 
  • जब अध्यक्ष अनुपस्थित होते हैं, तब उपाध्यक्ष सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता करते हैं। इससे यह सुनिश्चित होता है कि संसद की कार्यप्रणाली किसी भी व्यक्तिगत उपस्थिति पर निर्भर न होकर एक संस्थागत ढांचे के तहत संचालित हो।
  • लोकसभा उपाध्यक्ष का चुनाव सामान्यतः उस दल से किया जाता है जो सत्ता में नहीं है। 
  • वर्तमान समय में जब संसद की कार्यवाही अक्सर राजनीतिक तनावों और गतिरोध से प्रभावित होती है, तब लोकसभा उपाध्यक्ष का पद और भी अधिक प्रासंगिक हो जाता है। 

लोकसभा उपाध्यक्ष का चुनाव एवं पदत्याग

  • अधिसूचना: लोकसभा अध्यक्ष का चुनाव हो जाने के पश्चात उपाध्यक्ष के चुनाव की प्रक्रिया आरंभ होती है। इसकी तिथि लोकसभा अध्यक्ष द्वारा निर्धारित की जाती है। 
  • सदस्यगण अपनी-अपनी पार्टी या व्यक्तिगत स्तर पर उम्मीदवारों के नामांकन कर सकते हैं। 
  • इस पूरी प्रक्रिया को लोकसभा के नियमों (Rules of Procedure and Conduct of Business in Lok Sabha) के तहत संचालित किया जाता है।
  • बहुमत: लोकसभा उपाध्यक्ष का चुनाव लोकसभा के सदस्यों के बीच से ही किया जाता है। इसके लिए किसी विशेष बहुमत की आवश्यकता नहीं होती, बल्कि केवल साधारण बहुमत (Simple Majority) पर्याप्त होता है — यानी जितने सदस्य उपस्थित हैं और मतदान कर रहे हैं, उनमें से बहुमत का समर्थन आवश्यक है। 
      • संसदीय परंपरा के अनुसार, उपाध्यक्ष का पद विपक्षी दल को सौंपा जाना चाहिए। यह परंपरा कई सरकारों के दौरान निभाई गई है, लेकिन यह कानूनन अनिवार्य नहीं है।
  • शपथ: लोकसभा उपाध्यक्ष के लिए किसी अलग प्रकार की शपथ नहीं होती। तीसरी अनुसूची (Third Schedule) के तहत जो सामान्य सांसद शपथ लेते हैं, वही शपथ इस पद के लिए भी पर्याप्त मानी जाती है। 
  • कार्यकाल: उपाध्यक्ष का कार्यकाल लोकसभा के कार्यकाल तक होता है, लेकिन वे पुनः निर्वाचित भी हो सकते हैं। यदि लोकसभा भंग हो जाती है, तो उपाध्यक्ष पद भी स्वतः समाप्त हो जाता है।
  • पदत्याग: लोकसभा उपाध्यक्ष को सदन के कार्यकाल से पहले भी पद से निष्कासित किया जा सकता है यदि:
    • वे लोकसभा सदस्य नहीं रहते,
    • वे स्वयं अध्यक्ष को लिखित रूप में इस्तीफा दे दें,
    • या फिर लोकसभा की कुल सदस्य संख्या के बहुमत (पूर्ण बहुमत) से, 14 दिन पहले सूचना देकर, उनके विरुद्ध प्रस्ताव पारित हो जाए।

लोकसभा उपाध्यक्ष की शक्तियाँ और कार्य

  • कार्यवाही की निरंतरता: लोकसभा उपाध्यक्ष का मुख्य कार्य यह सुनिश्चित करना होता है कि सदन की कार्यवाही बिना किसी रुकावट के चलती रहे, चाहे अध्यक्ष उपस्थित हों या नहीं। अध्यक्ष की अनुपस्थिति में उपाध्यक्ष सदन की अध्यक्षता करते हैं और संसद के सभी कार्य संविधान और नियमों के अनुरूप चलें, यह देखते हैं।
  • अध्यक्ष का स्थान ग्रहण: जब अध्यक्ष का पद रिक्त हो जाए या वह किसी कारणवश अपने कर्तव्यों का पालन करने में असमर्थ हों, तब उपाध्यक्ष अध्यक्ष के समस्त कार्यभार को संभालते हैं। इस स्थिति में वह न केवल सदन की बैठक की अध्यक्षता करते हैं, बल्कि राष्ट्रपति द्वारा बुलाई गई दोनों सदनों की संयुक्त बैठक में भी अध्यक्षता का दायित्व निभाते हैं। 
    • मतदान संबंधी अधिकार: जब उपाध्यक्ष, अध्यक्ष के रूप में कार्य करते है, तब सामान्य स्थिति में उन्हें मतदान का अधिकार नहीं होता। लेकिन अगर सदन में मतों की संख्या बराबर हो जाती है, तो उस स्थिति में उपाध्यक्ष निर्णायक मत (casting vote) दे सकते है। 
  • स्वतंत्र पद: यह पद अध्यक्ष के अधीनस्थ नहीं होता, बल्कि स्वतंत्र रूप से कार्य करता है और सीधे सदन के प्रति उत्तरदायी होता है। जब अध्यक्ष स्वयं सदन की अध्यक्षता कर रहे होते हैं, तो वे बहस में भाग ले सकते हैं, बोल सकते हैं, प्रश्न पूछ सकते हैं, और किसी भी प्रस्ताव पर मतदान भी कर सकते हैं।
  • संसदीय समितियों में भूमिका: उपाध्यक्ष को जब किसी संसदीय समिति का सदस्य नियुक्त किया जाता है, तो वह स्वतः ही उस समिति का अध्यक्ष बन जाता है। उदाहरण के लिए, उपाध्यक्ष को सामान्यतः नियम समिति (Rules Committee) में सम्मिलित किया जाता है, जो संसद के कार्य संचालन से संबंधित महत्वपूर्ण नियमों को नियंत्रित करती है।
  • राजनीतिक तटस्थता: एक बार उपाध्यक्ष पद पर निर्वाचित होने के बाद उनसे अपेक्षा की जाती है कि वे किसी राजनीतिक पार्टी के प्रति झुकाव न रखें और सदन की कार्यवाही को पूरी निष्पक्षता और तटस्थता के साथ संचालित करें। 

लोकसभा उपाध्यक्ष पद का इतिहास

  • प्रारंभ
  • लोकसभा उपाध्यक्ष पद की शुरुआत ब्रिटिश शासन के दौरान भारत सरकार अधिनियम, 1919 के तहत हुई।
  • इस अधिनियम में सेंट्रल लेजिस्लेटिव असेंबली (Central Legislative Assembly) की स्थापना की गई और उसके संचालन के लिए अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष (तब “प्रेसिडेंट” और “डिप्टी प्रेसिडेंट”) के पदों की संरचना की गई।
      • सच्चिदानंद सिन्हा को वर्ष 1921 में प्रथम डिप्टी प्रेसिडेंट नियुक्त किया गया। वे इस पद पर आसीन होने वाले पहले भारतीय बने।
  • पुनर्गठन:
      • 15 अगस्त 1947 को भारत की स्वतंत्रता के बाद, लोकतांत्रिक संस्थाओं का पुनर्गठन प्रारंभ हुआ।
      • भारतीय संविधान के लागू होने के साथ ही वर्ष 1952 में पहली लोकसभा का गठन हुआ। 
      • इस लोकसभा में एम. अनंतसयनम् अयंगार को स्वतंत्र भारत के पहले निर्वाचित उपाध्यक्ष के रूप में चुना गया।
      • वर्ष 1956 में लोकसभा अध्यक्ष जी. वी. मावलंकर के आकस्मिक निधन के बाद, अयंगार को कार्यवाहक अध्यक्ष के रूप में कार्यभार सौंपा गया। 
  • भागीदारी:
      • विभिन्न सरकारों के कार्यकाल में लोकसभा उपाध्यक्ष का चुनाव किया गया —
        • यूपीए-1 (2004–09) और यूपीए-2 (2009–14)
        • वाजपेयी सरकार (1999–2004)
        • पीवी नरसिंहराव सरकार (1991–96)
      • इन सभी कालों में उपाध्यक्ष विपक्ष से चुने गए, जिससे यह परंपरा और अधिक मजबूत हुई। 
  • वर्तमान स्थिति:
    • हाल के वर्षों में, विशेष रूप से 2019 के बाद, यह परंपरा कुछ हद तक थमती दिखी है। लोकसभा उपाध्यक्ष का पद पिछले 6 वर्षों से रिक्त है।

 

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