India Carbon Credit Trading Scheme
संदर्भ:
भारत सरकार ने देश के पहले व्यापक कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग प्रोग्राम (CCTS) को अंतिम रूप देने की तैयारी पूरी कर ली है। यह प्रोग्राम भारत के 2070 तक ‘नेट ज़ीरो’ (Net Zero) लक्ष्य को प्राप्त करने और 2030 तक GDP की उत्सर्जन तीव्रता को 45% तक कम करने की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम है।
कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग स्कीम (CCTS) क्या हैं?
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- परिचय: कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग प्रोग्राम (CCTS) एक बाजार-आधारित ढांचा है जिसके तहत सरकार उद्योगों के लिए कार्बन उत्सर्जन की सीमा (Cap/Baseline) निर्धारित करती है; लक्ष्य से कम उत्सर्जन करने वाली संस्थाएं ‘कार्बन क्रेडिट’ अर्जित करती हैं।
- उद्देश्य: इसका लक्ष्य उत्सर्जन तीव्रता (Emission Intensity) को 2030 तक 2005 के स्तर से 45% कम करना है।
- अधिनियम: भारत ने ऊर्जा संरक्षण (संशोधन) अधिनियम, 2022 के माध्यम से इस बाजार की वैधानिक नींव रखी।
- तंत्र (Mechanisms): यह दो स्तरों पर कार्य करता है:
- अनुपालन (Compliance): इसमें भारी उद्योगों (जैसे इस्पात, सीमेंट, उर्वरक) को अनिवार्य उत्सर्जन लक्ष्य दिए जाते हैं।
- ऑफसेट (Offset): यह गैर-अनिवार्य संस्थाओं को स्वैच्छिक उत्सर्जन कटौती के माध्यम से क्रेडिट अर्जित करने की अनुमति देता है।
- संस्थागत ढांचा: ऊर्जा दक्षता ब्यूरो (BEE) इसका प्रशासक है, जबकि केंद्रीय विद्युत नियामक आयोग (CERC) व्यापार का नियमन करेगा।
- प्रमाणन: लक्ष्य से कम उत्सर्जन करने वाली कंपनियों को कार्बन क्रेडिट प्रमाणपत्र (CCC) मिलते हैं, जहाँ 1 CCC = 1 टन CO2 समकक्ष (tCO2e)।
- क्षेत्रीय कवरेज: प्रथम चरण (FY 2025-26) में 9 प्रमुख क्षेत्रों को शामिल किया गया है, जिनमें सीमेंट, एल्युमीनियम, लोहा और इस्पात, क्लोर-अल्काली, कागज और लुगदी, उर्वरक, पेट्रोकेमिकल्स, पेट्रोलियम रिफाइनरी और कपड़ा शामिल हैं।
- उत्सर्जन तीव्रता लक्ष्य: यह ‘कैप-एंड-ट्रेड’ के बजाय ‘बेसलाइन-एंड-क्रेडिट’ मॉडल पर आधारित है। यहाँ उत्पादन की प्रति इकाई उत्सर्जन (Intensity) को कम करने पर जोर दिया गया है, ताकि आर्थिक विकास बाधित न हो।
- परिवर्तन: यह मौजूदा PAT (Perform, Achieve and Trade) योजना को प्रतिस्थापित करेगा, जो केवल ऊर्जा बचत पर केंद्रित है, जबकि CCTS सीधे ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को लक्षित करता है।
- समयसीमा: अनुपालन चरण FY 2025-26 से प्रभावी होने की उम्मीद है और व्यापार अक्टूबर 2026 तक शुरू होने का अनुमान है।
चुनौतियां एवं समाधान:
- मूल्य स्थिरता: यूरोपीय संघ (EU) के अनुभवों से सीख लेते हुए, भारत को ‘प्राइस कॉरिडोर’ (न्यूनतम और अधिकतम मूल्य सीमा) बनाए रखने की आवश्यकता है ताकि बाजार में भारी उतार-चढ़ाव न हो।
- डेटा सटीकता: उद्योगों द्वारा उत्सर्जन की रिपोर्टिंग और उसके तीसरे पक्ष द्वारा सत्यापन (MRV) की विश्वसनीयता सुनिश्चित करना एक बड़ी चुनौती है।
- वैश्विक तालमेल: यूरोपीय संघ के CBAM (Carbon Border Adjustment Mechanism) जैसे करों से भारतीय निर्यातकों को बचाने के लिए घरेलू कार्बन बाजार को अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप बनाना अनिवार्य है।

