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आईएनएस तरंगिनी (INS Tarangini) | UPSC Preparation

INS Tarangini

INS Tarangini

संदर्भ:

हाल ही में भारतीय नौसेना का प्रमुख नौकायन प्रशिक्षण पोत आईएनएस तरंगिनी (INS Tarangini), श्रीलंका के त्रिंकोमाली बंदरगाह पर पहुंचा। यह यात्रा भारत की “मित्रता के सेतु” समुद्री आउटरीच पहल का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।

आईएनएस तरंगिनी के बारे में:

  • परिचय: आईएनएस तरंगिनी (INS Tarangini) भारतीय नौसेना का पहला नौकायन प्रशिक्षण पोत (Sail Training Ship – STS) है। इसका नाम हिंदी शब्द ‘तरंग’ से लिया गया है, जिसका अर्थ है “लहरों पर सवार होने वाली”।
  • निर्माण: इसे गोवा शिपयार्ड लिमिटेड (GSL) द्वारा डिजाइन और निर्मित किया गया है, जो भारत की आत्मनिर्भरता का प्रतीक है। और इसे 11 नवंबर 1997 को कमीशन किया गया था।

इसकी विशेषताए:

  • क्षमता: यह 20 दिनों तक लगातार समुद्र में रह सकता है और इसमें 30 प्रशिक्षु अधिकारियों (Cadets) को प्रशिक्षण देने की क्षमता है।
  • प्रकार: यह एक ‘थ्री-मस्टेड बार्क’ (Three-masted Barque) है।
  • पाल (Sails) की संरचना: इसमें कुल 20 पाल हैं, जिनका सतही क्षेत्रफल लगभग 10,000 वर्ग फुट है। 
  • प्रशिक्षण केंद्र: इसका प्राथमिक कार्य कैडेटों को समुद्री कौशल (Seamanship), टीम वर्क और प्राकृतिक तत्वों के साथ तालमेल बिठाने का प्रशिक्षण देना है।
  • विश्व परिक्रमा: 2003-04 में, इसने 15 महीनों में 18 देशों के 37 बंदरगाहों की यात्रा कर विश्व की परिक्रमा करने का कीर्तिमान रचा।

इसकी भूमिका:

  • बुनियादी समुद्री प्रशिक्षण: तरंगिनी का प्राथमिक उद्देश्य कैडेटों को आधुनिक उपकरणों से परे सीमैनशिप (Seamanship) के मूल सिद्धांत सिखाना है। पाल वाले जहाज पर प्रशिक्षण लेने से अधिकारियों में आधुनिक युद्धपोतों पर संकट के समय निर्णय लेने में सहायक होता है।
  • नौसैनिक कूटनीति: यह पोत भारत का ‘फ्लोटिंग एंबेसडर’ (Floating Ambassador) है। अपनी ‘लोकायन’ (Lokayan) यात्राओं के माध्यम से यह विदेशी बंदरगाहों पर भारतीय संस्कृति और मैत्री का संदेश पहुंचाता है। 
  • सागर (SAGAR) और ‘नेबरहुड फर्स्ट’ नीति: हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की उपस्थिति दर्ज कराने और पड़ोसी देशों (जैसे श्रीलंका) के साथ क्षमता निर्माण (Capacity Building) में इसकी अहम भूमिका है। विदेशी कैडेटों को अपने बोर्ड पर प्रशिक्षण देकर भारत एक ‘नेट सिक्योरिटी प्रोवाइडर’ की अपनी छवि को मजबूत करता है।
  • समुद्री विरासत का संरक्षण: डिजिटल युग में भी पारंपरिक नौकायन कला को जीवित रखना इसकी सांस्कृतिक भूमिका है। यह युवा अधिकारियों को भारत के गौरवशाली समुद्री इतिहास से जोड़ता है।
  • अंतर्राष्ट्रीय सहयोग: यह दुनिया भर में होने वाली ‘टॉल शिप्स रेस’ और बेड़ा समीक्षाओं (IFR) में भाग लेकर अंतरराष्ट्रीय नौसैनिक बिरादरी के बीच भारत की तकनीकी और पेशेवर दक्षता का प्रदर्शन करता है।

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