Insurance Law Bill 2025
संदर्भ:
भारत सरकार 1 से 19 दिसंबर 2025 की शीतकालीन सत्र में बीमा कानून (संशोधन) विधेयक, 2025 पेश करने जा रही है। इस विधेयक में बीमा अधिनियम, 1938, एलआईसी अधिनियम, 1956 और आईआरडीएआई अधिनियम, 1999 में संशोधन शामिल होंगे। इस सुधार का उद्देश्य ‘सबके लिए बीमा 2047’ लक्ष्य को प्राप्त करना है।
बीमा कानून (संशोधन) विधेयक, 2025 के मुख्य प्रावधान:
- 100% प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) की अनुमति: विधेयक का सबसे बड़ा प्रावधान बीमा क्षेत्र में FDI सीमा को 74% से बढ़ाकर 100% करने का है, जिसे 1 फरवरी 2025 को केंद्रीय बजट में घोषित किया गया था। इसके परिणामस्वरूप अधिक पूंजी, उन्नत अंडरराइटिंग तकनीक, डिजिटल समाधान और व्यापक उत्पाद विविधता आएगी।
- समग्र (Composite) लाइसेंस का प्रावधान: विधेयक लाइफ, जनरल और हेल्थ बीमा के लिए अलग-अलग लाइसेंस की पुरानी व्यवस्था समाप्त कर Composite Licence प्रणाली लागू करता है। इसके तहत एक बीमाकर्ता एक ही लाइसेंस के अंतर्गत सभी प्रकार के बीमा उत्पाद बेच सकेगा।
- न्यूनतम पूंजी आवश्यकता में कमी: बीमा कंपनियों के लिए वर्तमान ₹100 करोड़ की न्यूनतम पूंजी सीमा को संशोधित कर नया ढांचा प्रस्तावित किया गया है। इसी प्रकार पुनर्बीमा कंपनियों के लिए पूंजी आवश्यकताएँ ₹200 करोड़ से ₹500 करोड़ से कम की नई व्यवस्था में लाई जा रही हैं।
- LIC बोर्ड को अधिक स्वायत्तता: विधेयक LIC Act, 1956 में संशोधन कर LIC बोर्ड को अधिक परिचालन स्वायत्तता प्रदान करता है। इसका उद्देश्य LIC जैसे Systemically Important Insurer की शासन-व्यवस्था को मजबूत करना और निर्णय प्रक्रिया को अधिक तेज, लचीला एवं उत्तरदायी बनाना है।
- बीमा ब्रोकरों के लिए स्थायी लाइसेंस: बीमा मध्यस्थों (Intermediaries) के लिए लाइसेंस नवीनीकरण की हर 3 वर्ष वाली प्रक्रिया समाप्त कर, विधेयक एक-बार के लिए स्थायी लाइसेंस (Perpetual Licence) देने का प्रस्ताव करता है। यह प्रावधान वैश्विक मानकों के अनुरूप है।
- बहु-बीमा कंपनियों की अनुमति: वर्तमान में एक एजेंट एक जीवन और एक सामान्य बीमाकर्ता के साथ ही कार्य कर सकता है। विधेयक इस प्रतिबंध को हटाकर एजेंटों को अनेक कंपनियों के साथ कार्य करने की अनुमति देता है।
- कैप्टिव बीमा कंपनियाँ: विधेयक बड़े निगमों को Captive Insurance Companies स्थापित करने की अनुमति देता है। Captive insurers अपने ही समूह की कंपनियों के जोखिमों को कवर करते हैं, जिससे जोखिम प्रबंधन की लागत घटती है।
- नेट ओन्ड फंड की शर्तों में छूट: पुनर्बीमाकर्ताओं के लिए Net Owned Fund की न्यूनतम शर्त को ₹5,000 करोड़ से घटाकर ₹500 करोड़ करने का प्रस्ताव है। इससे नई और मध्यम आकार की विदेशी पुनर्बीमा कंपनियाँ भारत में प्रवेश कर सकेंगी।
- बीमा मध्यस्थों के पंजीकरण में सरलता: बीमा मध्यस्थों के लिए एक-बार पंजीकरण, वार्षिक शुल्क प्रणाली और सरल अनुपालन ढांचा प्रस्तावित है। इससे नए ब्रोकरों और एजेंसियों के लिए बाजार में प्रवेश सरल होगा, और उपभोक्ता तक बीमा सेवाओं की पहुंच बढ़ेगी।

