International Exhibition of Piprahwa Ruins

संदर्भ:
आज 3 जनवरी 2026 को नई दिल्ली में सांस्कृतिक आयोजन “Lotus Light: Relics of the Awakened One” के तहत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा पिपरहवा अवशेषों (Piprahwa Relics) की अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शनी का उद्घाटन किया जाएगा। जिसका संचालन संस्कृति मंत्रालय और ‘इंटरनेशनल बुद्धिस्ट कन्फेडरेशन’ (IBC) द्वारा किया जा रहा है।
पिपरहवा अवशेष के बारे मे:
- पिपरहवा, उत्तर प्रदेश के सिद्धार्थनगर जिले में स्थित एक महत्वपूर्ण बौद्ध पुरातात्विक स्थल है, जो कपिलवस्तु (बुद्ध का पैतृक घर) से संबंधित है।
- 1970 के दशक में के.एम. श्रीवास्तव (ASI) के नेतृत्व में हुई खुदाई में यहाँ से ऐसी मिट्टी की मुहरें (Seals) प्राप्त हुईं, जिन पर ‘ओम् कपिलवस्तु भिक्षु संघ’ और ‘देवपुत्र विहार’ अंकित था। इससे स्पष्ट हुआ कि पिपरहवा ही वह स्थान है जहाँ भगवान बुद्ध ने अपने जीवन के शुरुआती 29 वर्ष बिताए थे।
- बुद्ध के महापरिनिर्वाण के बाद उनके अवशेषों को 8 भागों में विभाजित किया गया था। पिपरहवा से प्राप्त अवशेष शाक्य वंश के हिस्से के हैं।
- 1898 में विलियम पेप्पे को यहाँ से साबुन के पत्थर (Soapstone) के पात्र मिले। एक पात्र पर अशोक-पूर्व ब्राह्मी लिपि में उत्कीर्ण था कि ये अवशेष शाक्य मुनि बुद्ध के हैं, जो भारत में प्राप्त सबसे प्राचीन शिलालेखों में से एक माना जाता है।
- इन अवशेषों को शाक्यों द्वारा एक विशाल स्तूप में स्थापित किया गया था, जिसे बाद के राजाओं (विशेषकर कुषाणों) द्वारा विस्तारित किया गया।
- पिपरहवा का स्तूप ईंटों से निर्मित है। खुदाई में यहाँ चार मठ (Monasteries) और एक विशाल आंगन के अवशेष मिले हैं।
- यहाँ से तांबे के सिक्के, पंच-मार्क्ड सिक्के, कीमती पत्थर (जैसे कि कार्नेलियन और नीलम) और सोने के आभूषण प्राप्त हुए हैं, जो मौर्य और कुषाण काल की समृद्ध संस्कृति को दर्शाते हैं।
- इन अवशेषों को ‘AA’ श्रेणी की पुरातात्विक संपत्ति माना जाता है, जिन्हें कड़े सुरक्षा प्रोटोकॉल के तहत रखा जाता है। वर्तमान में इनका मुख्य हिस्सा राष्ट्रीय संग्रहालय, नई दिल्ली में संरक्षित है।
महत्व:
- बौद्ध सर्किट: स्वदेश दर्शन योजना के तहत पिपरहवा को बौद्ध सर्किट के एक प्रमुख केंद्र के रूप में विकसित किया जा रहा है, जिससे पर्यटन और स्थानीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा मिल रहा है।
- सॉफ्ट पावर: बुद्ध के अवशेषों का प्रदर्शन भारत और दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों (थाईलैंड, वियतनाम, कंबोडिया) के बीच संबंधों को मजबूत करने का एक माध्यम है।
- बौद्ध धर्म का केंद्र: ये अवशेष भगवान बुद्ध से जुड़े होने के कारण बौद्ध धर्मावलंबियों के लिए अत्यधिक पूजनीय हैं। कपिलवस्तु की प्राचीनता और बुद्ध के जीवन से जुड़े साक्ष्य प्रस्तुत करते हैं।
