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कप्पाटागुड्डा वन्यजीव अभयारण्य (Kappatagudda Wildlife Sanctuary) | UPSC

Kappatagudda Wildlife Sanctuary

Kappatagudda Wildlife Sanctuary

संदर्भ:

कर्नाटक उच्च न्यायालय ने हाल ही में राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि वह कप्पाटागुड्डा वन्यजीव अभयारण्य से मनमाने ढंग से बाहर किए गए 55 वर्ग किमी के आरक्षित वन क्षेत्र को इसमें पुनः शामिल करे और इसकी सीमाओं को इसके मूल स्वीकृत आकार (लगभग 300 वर्ग किमी) तक बहाल करे।

  • अनियमितता पर रोक: मुख्य न्यायाधीश विभु बाखरू और न्यायमूर्ति सी.एम. पूनाचा की खंडपीठ ने पाया कि कर्नाटक राज्य वन्यजीव बोर्ड (KSWB) ने जनवरी 2019 में पूरे 300 वर्ग किमी क्षेत्र को अभयारण्य घोषित करने का संकल्प लिया था, लेकिन मई 2019 की आधिकारिक अधिसूचना में इसे घटाकर केवल 244.15 वर्ग किमी कर दिया गया था।
  • खनन व स्टोन-क्रशिंग याचिकाओं को खारिज करना: कोर्ट ने उन स्टोन-क्रशिंग इकाइयों की याचिकाओं को खारिज कर दिया, जो अभयारण्य के ‘पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र’ (ESZ) के भीतर काम कर रही थीं।
  • पारिस्थितिकी को प्राथमिकता: न्यायालय ने स्पष्ट किया कि वन्यजीवों और वनस्पतियों का संरक्षण व्यावसायिक हितों से ऊपर है और क्षेत्रफल में कटौती “प्रथम दृष्टया मनमानी” (ex-facie arbitrary) थी।

कप्पाटागुड्डा वन्यजीव अभयारण्य के बारे में:

  • स्थान: यह वन्यजीव अभयारण्य कर्नाटक के गदग (Gadag) जिले में स्थित है।
  • उपनाम: अपनी समृद्ध जैव विविधता के कारण इसे “उत्तरी कर्नाटक के पश्चिमी घाट” के रूप में जाना जाता है।
  • भौगोलिक स्थिति: यह शुष्क क्षेत्र में स्थित है, जिसे ‘उत्तरी कर्नाटक के पश्चिमी घाट’ के रूप में जाना जाता है।
  • औषधीय भंडार: इसे “औषधीय पौधों का स्वर्ग” कहा जाता है; यहाँ 400+ प्रजातियों की जड़ी-बूटियाँ मौजूद हैं।
  • स्वर्ण भंडार: इस क्षेत्र की पहाड़ियों में सोने और मैग्नीशियम के प्रचुर निक्षेप हैं, जो संरक्षण और खनन के बीच संघर्ष का कारण हैं।
  • कानूनी स्थिति: वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की धारा 26A के तहत इसे अधिसूचित किया गया है।
  • जल विज्ञान (Hydrology): यह तुंगभद्रा नदी के जलक्षेत्र (Catchment area) का हिस्सा है और स्थानीय वर्षा चक्र को नियंत्रित करता है।
  • जैव-विविधता: यह चिंकारा (Indian Gazelle) और दुर्लभ भारतीय भेड़िये का प्रमुख आवास है।
  • संवेद्य प्रजातियां (Endangered Species): यहाँ “येलो-थ्रोटेड बुलबुल” जैसी संकटग्रस्त पक्षी प्रजातियां पाई जाती हैं।
  • भू-आकृति विज्ञान: यह क्षेत्र धारवाड़ क्रेटन (Dharwar Craton) का हिस्सा है, जो भूगर्भीय रूप से अत्यंत प्राचीन है।
  • संरक्षण रिजर्व बनाम अभयारण्य: 2017 में यह ‘कंजर्वेशन रिजर्व’ था, जिसे जैव-महत्व के कारण ‘वन्यजीव अभयारण्य’ में अपग्रेड किया गया।
  • जनजातीय/स्थानीय समुदाय: नंदीवेरी मठ और स्थानीय किसानों ने खनन विरोधी आंदोलन में केंद्रीय भूमिका निभाई।

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