Krishnan Crater on Mars
संदर्भ:
अंतरराष्ट्रीय खगोलीय संघ (International Astronomical Union—IAU) ने हाल ही में मंगल ग्रह पर स्थित एक प्राचीन क्रेटर को भारतीय भूवैज्ञानिक एम.एस. कृष्णन के नाम पर आधिकारिक रूप से मान्यता दी है। यह निर्णय भारत के भूविज्ञान, ग्रह विज्ञान, और अंतरिक्ष अन्वेषण में बढ़ते योगदान को भी रेखांकित करता है।
मंगल पर भारतीय नामों की स्वीकृति:
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कृष्णन क्रेटर का औपचारिक नामकरण: IAU द्वारा अनुमोदन के बाद मंगल का यह विशाल क्रेटर अब आधिकारिक रूप से “Krishnan Crater” कहा जाएगा। इसकी वैज्ञानिक प्रस्तावना केरल के शोधकर्ताओं—असिफ इक़बाल कक्कस्सेरी (गवर्नमेंट कॉलेज, कासरगोड) और राजेश वी.जे. (IIST तिरुवनंतपुरम)—ने प्रस्तुत की थी। क्रेटर के भीतर स्थित एक समतल क्षेत्र को “Krishnan Palus” नाम दिया गया है।
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केरल-उद्गम स्थलनाम:IAU ने उसी क्षेत्र में स्थित छोटे क्रेटरों तथा एक वलिस (Martian Valley) के लिए भी केरल की भौगोलिक पहचान को अपनाया। ‘Periyar Vallis’ नाम केरल की पेरियार नदी प्रणाली से लिया गया है।
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नामकरण: IAU ग्रह विज्ञान में नामकरण की सर्वोच्च वैश्विक संस्था है। इसके अंतर्गत मंगल पर Craters वैज्ञानिकों, लेखकों या छोटे नगरों के आधार पर, Vallis प्राचीन नदी-तंत्र जैसी संरचनाओं के लिए, Palus, Planitia, Mons आदि लैटिन शब्दों के आधार पर नामित किए जाते हैं।
मंगल ग्रह पर स्थित क्रेटर:
मंगल ग्रह पर स्थित यह क्रेटर एक प्राचीन प्रभाव क्रेटर है, जिसकी अनुमानित आयु लगभग 3.5 अरब वर्ष मानी जाती है। यह काल मंगल के भूवैज्ञानिक इतिहास में हेसपेरियन–नॉक्टियन युग के आसपास आता है, जब ग्रह की सतह पर बड़े पैमाने पर उल्कापिंडीय टक्करों, ज्वालामुखीय गतिविधियों और प्रारंभिक जल-प्रवाह प्रणालियों का प्रभाव था।
क्रेटर की विशेषताएँ:
- यह क्रेटर मंगल के प्राचीन काल में हुए एक बड़े उल्कापिंडीय प्रभाव के कारण बना माना जाता है, जब ग्रह पर वायुमंडल अपेक्षाकृत घना था और सतह पर स्थायी जल-प्रणालियाँ मौजूद थीं।
- इसकी आयु लगभग 3.5 अरब वर्ष होने का अर्थ है कि यह मंगल के प्रारंभिक भूगर्भीय परिवर्तनों का एक महत्त्वपूर्ण अभिलेख (geological record) है।
- ऐसे क्रेटरों की संरचना और तलछट (sediments) वैज्ञानिकों को मंगल की प्राचीन जल-उपस्थिति, सतही खनिजों के विकास, और ग्रह के वायुमंडलीय इतिहास** को समझने में मदद करती है।
- क्रेटर के भीतर समतल क्षेत्र (interior plains), पुराने नदी-जैसे चैनल और तलछटी जमा (deposits) यह संकेत देते हैं कि इस क्षेत्र में कभी जल-प्रवाह या भू-रासायनिक परिवर्तन सक्रिय रहे होंगे।
एम.एस. कृष्णन का परिचय:
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1898 में तंजावुर में जन्मे डॉ. एम.एस. कृष्णन भारत के उन भूवैज्ञानिकों में शामिल हैं, जिन्होंने स्वतंत्रता पूर्व और स्वतंत्रता उपरांत काल में भारतीय भूविज्ञान को आधुनिक वैज्ञानिक ढांचे से जोड़ा।
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वे भारत के प्रथम राष्ट्रीय निदेशक (Director-General) रहे, जिन्होंने उस समय के Geological Survey of India (GSI) की नीति-निर्माण और क्षेत्रीय सर्वेक्षण क्षमता को आधुनिक रूप दिया।
- उनके प्रमुख योगदानों में आग्नेय एवं कायांतरित शैलों का अध्ययन, भारतीय उपमहाद्वीप की संरचनात्मक भू-रचना, खनिज संसाधनों का पुनर्पहचान, और भारत का प्रारंभिक भूवैज्ञानिक मानचित्रण शामिल हैं।
- उनकी पुस्तकें, शोध-लेख और अध्ययन आज भी भारतीय विश्वविद्यालयों, अनुसंधान परिषदों और भू-अन्वेषण संस्थानों में मूलभूत संदर्भ के रूप में उपयोग होती हैं।

