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Ladakh Protest

पूर्ण राज्य और संविधान की छठी अनुसूची लागू करने की मांग को लेकर केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख़ के जाने-माने पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक के अनशन को दो सप्ताह पूरे होने वाले हैं।

पृष्ठभूमि –

  • 5 अगस्त, 2019 को केंद्र सरकार ने एक ऐतिहासिक फैसला लेकर जम्मू-कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देने वाले अनुच्छेद 370 को रद्द कर दिया था। इसके बाद जम्मू कश्मीर और लद्दाख दो केंद्र शासित प्रदेश बने थे। जम्मू कश्मीर में विधायिका दी गई, लेकिन लद्दाख में विधायिका नहीं बनाई गई। तब लेह-लद्दाख के नेताओं सहित वहां की धार्मिक संस्थाओं ने केंद्र सरकार के इस फैसले का खुले दिल से स्वागत किया था, क्योंकि कई वर्षों से लद्दाख ये मांग कर रहा था।
  • यहां के लोगों ने लद्दाख को विधायिका के साथ केंद्र शासित प्रदेश बनाने की मांग 1949 में रखी था। 33 साल पहले 1989 में अलग राज्य की मांग को लेकर यहां आंदोलन भी हुआ था। इसी वजह से लद्दाख को स्वायत्त हिल डेवलपमेंट काउंसिल मिली थी। 70 साल बाद लद्दाख के केंद्र शासित बनने की मांग पूरी हुई, लेकिन लद्दाख को विधायिका नहीं मिली केवल हिल काउंसिल को इसमें रखा गया, लेकिन अब ये भी शक्तिहीन है।
  • यहां के लोगों का कहना है कि संवैधानिक सुरक्षा न मिलने से यहां के ज़मीन, रोज़गार, पर्यावरण की सुरक्षा और सांस्कृतिक पहचान सब पर असुरक्षा की भावना घर कर गई है।
  • यही वजह है कि 2019 में तत्कालीन राज्य जम्मू और कश्मीर में संवैधानिक बदलाव के बाद से क्षेत्र के प्रतिनिधि लगातार केंद्रशासित प्रदेश लद्दाख को बार-बार छठी अनुसूची में शामिल करने की मांग उठाते आ रहे हैं।

लद्दाख  के लोगों की माँग क्या हैं?

लद्दाख राज्य की मांग और पूर्ण विधानमंडल

लद्दाख में, विशेषकर लेह जिले के लोग, विधानसभा के साथ पूर्ण राज्य का दर्जा मांग रहे हैं।

छठी अनुसूची के तहत संवैधानिक सुरक्षा उपाय

  • जनजातीय पहचान: लद्दाख की आबादी में मुख्य रूप से विशिष्ट सांस्कृतिक और भाषाई पहचान वाली बौद्ध जनजातियाँ शामिल हैं।
  • भूमि और संसाधन: लद्दाख का नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र और संसाधन शोषण के प्रति संवेदनशील हैं। भूमि अधिकार और प्राकृतिक संसाधनों पर नियंत्रण पर छठी अनुसूची के प्रावधान बाहरी हस्तक्षेप के खिलाफ संभावित सुरक्षा प्रदान करते हैं।
  • राजनीतिक प्रतिनिधित्व: सीमित विधायी शक्तियों के साथ केंद्रशासित प्रदेश के रूप में लद्दाख की वर्तमान स्थिति अपर्याप्त प्रतिनिधित्व और स्थानीय निर्णय लेने पर नियंत्रण की कमी के बारे में चिंता पैदा करती है।
  • निर्वाचित परिषदों की छठी अनुसूची की गारंटी इसका समाधान कर सकती है।

लेह और कारगिल के लिए अलग लोकसभा सीटें

  • सामाजिक-राजनीतिक संस्थाओं के कार्यकर्ता और नेता लोकसभा सीटों की संख्या एक से बढ़ाकर दो करने की मांग कर रहे हैं।
  • संसदऔर पूर्ण निर्वाचित विधायिका में लद्दाखियों का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिए कारगिल और लेह के लिए एक-एक ।
  • वर्तमान में, लद्दाख में केवल एक लोकसभा सीट है, जिसमें लेह और कारगिल दोनों जिले शामिल हैं। इसकी स्थापना 2019 में लद्दाख के एक अलग केंद्र शासित प्रदेश बनने के बाद की गई थी।

स्थानीय लोगों के लिए नौकरी में आरक्षण

  • ऐतिहासिक नुकसान: लद्दाख के लोगों का तर्क है कि उन्हें ऐतिहासिक रूप से भेदभाव और शिक्षा और रोजगार तक पहुंच की कमी का सामना करना पड़ा है, जिससे आरक्षण समानता की दिशा में एक आवश्यक कदम बन गया है।
  • लद्दाखी पहचान और संस्कृति की सुरक्षा: निवासियों की नौकरियों तक पहुंच सुनिश्चित करना लद्दाखी संस्कृति और जीवन शैली के संरक्षण के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। बाहरी लोगों की आमद को स्थानीय पहचान के लिए ख़तरे के रूप में देखा जाता है।
  • आर्थिक विकास: आरक्षण का उद्देश्य लद्दाख केलोगों के लिए रोजगार के अधिक अवसर पैदा करना, स्थानीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देना और बाहरी संसाधनों पर निर्भरता कम करना है।

क्या है छठी अनुसूची?

  • छठी अनुसूची, जो संविधान के अनुच्छेद 244 के अंतर्गत आती है।
  • भारतीय संविधान की छठी अनुसूची में असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम राज्यों में जनजातीय क्षेत्रों के प्रशासन से संबंधित प्रावधान शामिल हैं।
  • निर्वाचित, स्वायत्त प्रशासनिक डिवीज़न के गठन का प्रावधान करती है जिन्हें स्वायत्त जिला परिषद (एडीसी) के रूप में जाना जाता है।
  • इन परिषदों के कुछ कार्य राज्यों-जैसे होते हैं क्योंकि उनके पास टैक्स लगाने, वनों का प्रबंधन करने और राजस्व को नियंत्रित करने का अधिकार है।
  • अनिवार्य रूप से, वे किसी राज्य के भीतर कुछ हद तक विधायी, न्यायिक और प्रशासनिक स्वायत्तता का प्रयोग करते हैं।
  • केंद्र और राज्य विधानमंडल द्वारा पारित कानून इन क्षेत्रों पर खुद से लागू नहीं होते हैं, बल्कि उन्हें राज्यपाल द्वारा अधिसूचित किया जाना होता है।

अनुच्छेद 244:

स्वायत्त ज़िला परिषदों (Autonomous District Councils- ADCs), जिनके पास राज्य के भीतर कुछ विधायी, न्यायिक और प्रशासनिक स्वायत्तता होती है, को संविधान के अनुच्छेद 244 की छठी अनुसूची के अनुसार बनाया जा सकता है।

  • छठी अनुसूची में पूर्वोत्तर के चार राज्यों असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिज़ोरम के जनजातीय क्षेत्रों के प्रशासन से संबंधित विशेष प्रावधान हैं।
    • स्वायत्त ज़िले: इन चार राज्यों में जनजातीय क्षेत्रों को स्वायत्त ज़िलों के रूप में गठित किया गया है। राज्यपाल के पास स्वायत्त ज़िलों के गठन और पुनर्गठन से संबंधित अधिकार है।
  • संसद या राज्य विधानमंडल के अधिनियम स्वायत्त ज़िलों पर लागू नहीं होते हैं अथवा विशिष्ट संशोधनों और अपवादों के साथ लागू होते हैं।
  • इस संबंध में निर्देशन की शक्ति या तो राष्ट्रपति या फिर राज्यपाल के पास होती है।

ज़िला परिषद:

  • प्रत्येक स्वायत्त ज़िले में एक ज़िला परिषद होती है और इसमें सदस्यों की संख्या 30 होती हैं, जिनमें से चार राज्यपाल द्वारा मनोनीत किये जाते हैं और शेष 26 वयस्क मताधिकार के आधार पर चुने जाते हैं।
  • निर्वाचित सदस्य पाँच वर्ष की अवधि के लिये पद धारण करते हैं (यदि परिषद पहले भंग नहीं हो जाती है) और मनोनीत सदस्य राज्यपाल के प्रसादपर्यंत पद पर बने रहते हैं।
  • प्रत्येक स्वायत्त क्षेत्र में एक अलग क्षेत्रीय परिषद भी होती है।

परिषद की शक्तियाँ: ज़िला और क्षेत्रीय परिषदें अपने अधिकार क्षेत्रों का प्रशासन देखती हैं।

  • वे भूमि, जंगल, नहर का पानी, झूम खेती, ग्राम प्रशासन, संपत्ति की विरासत, विवाह और तलाक, सामाजिक रीति-रिवाज़ों आदि जैसे कुछ विशिष्ट मामलों पर कानून बना सकती हैं। लेकिन ऐसे सभी कानूनों हेतु राज्यपाल की सहमति की आवश्यकता होती है।
  • वे जनजातियों के बीच मुकदमों और मामलों की सुनवाई के लिये ग्राम सभाओं या न्यायालयों का गठन कर सकती हैं। वे उनकी अपील सुनती हैं। इन मुकदमों एवं मामलों पर उच्च न्यायालय का अधिकार क्षेत्र राज्यपाल द्वारा निर्दिष्ट किया जाता है।
  • ज़िला परिषद ज़िले में प्राथमिक विद्यालयों, औषधालयों, बाज़ारों, घाटों, मत्स्य पालन, सड़कों आदि की स्थापना, निर्माण या प्रबंधन कर सकती है।
  • उन्हें भू-राजस्व का आकलन करने और एकत्र करने एवं कुछ निर्दिष्ट कर लगाने का अधिकार है।

लद्दाख में आदिवासी आबादी 97 प्रतिशत से अधिक :

केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख मुख्य रूप से देश का एक आदिवासी क्षेत्र है। आधिकारिक आंकड़े बताते हैं कि, अनुसूचित जनजाति की आबादी लेह में 66.8 प्रतिशत, नुब्रा में 73.35 प्रतिशत, खलस्ती में 97.05 प्रतिशत, कारगिल में 83.49 प्रतिशत, सांकू में 89.96 प्रतिशत और लद्दाख क्षेत्र के ज़ांस्कर क्षेत्रों में 99.16 प्रतिशत का प्रतिनिधित्व करती है। इसमें क्षेत्र के सुन्नी मुस्लिमों सहित कई समुदाय शामिल नहीं हैं, जो अनुसूचित जनजाति का दर्जा पाने का दावा कर रहे हैं। इसे ध्यान में रखते हुए, लद्दाख क्षेत्र में कुल आदिवासी आबादी 97 प्रतिशत से अधिक है।

ये हैं लद्दाख की प्रमुख अनुसूचित जनजातियाँ :

  • बाल्टी
  • बेडा
  • बॉट, बोटो
  • ब्रोकपा, ड्रोकपा, डार्ड, शिन
  • चांगपा
  • गर्रा
  • सोम
  • पुरीगपा

क्या लद्दाख छठी अनुसूची में शामिल हो सकता है?

  • सितंबर 2019 में राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग ने छठी अनुसूची के तहत लद्दाख को शामिल करने की सिफारिश की।
  • आयोग ने ये सिफारिश इस नए केंद्र शासित प्रदेश में 97 फीसदी से अधिक आबादी के जनजाति या आदिवासी होने को लेकर की थी।
  • यहां देश के अन्य हिस्सों के लोगों के जमीन खरीदने या अधिग्रहण करने पर भी प्रतिबंध लगाया गया है क्योंकि इस प्रदेश की खास सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण की जरूरत महसूस की गई।
  • पूर्वोत्तर के बाहर के किसी भी क्षेत्र को छठी अनुसूची में शामिल नहीं किया गया है। वास्तव में, यहां तक कि मणिपुर में जहां कुछ स्थानों पर मुख्य रूप से जनजातीय आबादी है वहां कि स्वायत्त परिषदों को भी छठी अनुसूची में शामिल नहीं किया गया है। पूरी तरह से आदिवासी आबादी वाले नगालैंड और अरुणाचल प्रदेश भी छठी अनुसूची में  नहीं हैं।
  • “गृह मंत्रालय के एक अधिकारी के मुताबिक “इस तरह से देखा जाए तो लद्दाख को छठी अनुसूची में शामिल करना मुश्किल होगा। संविधान बहुत साफ तौर पर छठी अनुसूची को पूर्वोत्तर के लिए रखा गया है। भारत के अन्य हिस्सों में आदिवासी क्षेत्रों के लिए पांचवीं अनुसूची है।” हालांकि यह सरकार का विशेषाधिकार है यदि वह ऐसा फैसला लेती है, तो इस उद्देश्य के लिए संविधान में संशोधन करने के लिए एक विधेयक ला सकती है।

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