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भारत के नागरिक-केंद्रित स्वास्थ्य प्रणाली पर लैंसेट आयोग की रिपोर्ट (Lancet Commission report on India citizen-centric healthcare system) | UPSC

Lancet Commission report on India citizen-centric healthcare system

Lancet Commission report on India citizen-centric healthcare system

संदर्भ:

हाल ही में नई दिल्ली में ‘द लैंसेट आयोग (The Lancet Commission)’ ने भारत की स्वास्थ्य प्रणाली की पुनर्कल्पना पर अपनी ऐतिहासिक रिपोर्ट जारी की। यह रिपोर्ट ‘विकसित भारत 2047’ के लक्ष्य के अनुरूप भारत में सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज (Universal Health Coverage – UHC) प्राप्त करने के लिए एक व्यापक रोडमैप प्रस्तुत करती है। 

रिपोर्ट के प्रमुख स्तंभ और सिफारिशें:

  • समानता और पहुंच: रिपोर्ट के अनुसार भारत में स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच भौगोलिक और सामाजिक रूप से अत्यधिक असमान है। ग्रामीण क्षेत्रों में विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी और शहरी स्लम क्षेत्रों में स्वच्छता के अभाव को आयोग ने प्रमुख बाधा माना है।
  • प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल का सुदृढ़ीकरण: आयोग ने सिफारिश की है कि भारत को अपने कुल स्वास्थ्य बजट का कुछ भाग ‘प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल’ (PHC) पर खर्च करना चाहिए। प्राथमिक केंद्र केवल टीकाकरण केंद्र न होकर मधुमेह और उच्च रक्तचाप जैसी जीवनशैली की बीमारियों के प्रबंधन केंद्र बनने चाहिए।
  • वित्तीय सुरक्षा और OOPE में कमी: भारतीय नागरिक आज भी अपने स्वास्थ्य खर्च का लगभग 45-50% हिस्सा अपनी जेब (Out-of-Pocket Expenditure) से देते हैं। रिपोर्ट का सुझाव है कि दवाओं और नैदानिक परीक्षणों (Diagnostics) को पूरी तरह से मुफ्त और कैशलेस बनाया जाना चाहिए। 
  • निजी क्षेत्र का विनियमन: भारत में 70% स्वास्थ्य सेवाएं निजी क्षेत्र प्रदान करता है। आयोग ने एक ‘स्वतंत्र नियामक प्राधिकरण’ की स्थापना का सुझाव दिया है जो निजी अस्पतालों में इलाज की लागत और गुणवत्ता की निगरानी कर सके, ताकि मरीजों का शोषण रोका जा सके।
  • डिजिटल स्वास्थ्य क्रांति: आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन (ABDM) की सराहना करते हुए, रिपोर्ट ने डेटा सुरक्षा और निजता पर चिंता जताई है। नागरिकों को अपने स्वास्थ्य डेटा का पूर्ण स्वामी बनाने और टेलीमेडिसिन को दूरस्थ क्षेत्रों में अनिवार्य करने की बात कही गई है। 
  • मानव संसाधन का विस्तार: रिपोर्ट के अनुसार, भारत को केवल एमबीबीएस डॉक्टरों पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। ‘मिड-लेवल हेल्थ प्रोवाइडर्स’ (नर्स प्रैक्टिशनर्स) और आयुष डॉक्टरों को आधुनिक चिकित्सा के साथ एकीकृत कर ग्रामीण स्वास्थ्य की कमी को पूरा किया जा सकता है।
  • शासन और विकेंद्रीकरण: स्वास्थ्य को राज्य सूची का विषय मानते हुए, आयोग ने जिला स्तर पर ‘स्वास्थ्य परिषदों’ के गठन की वकालत की है। इन परिषदों में स्थानीय नागरिकों, निर्वाचित प्रतिनिधियों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों की भागीदारी होनी चाहिए।
  • जलवायु परिवर्तन और वन हेल्थ: 2026 की इस रिपोर्ट में जलवायु परिवर्तन को स्वास्थ्य के लिए सबसे बड़ा खतरा बताया गया है। जूनोटिक रोगों (पशुओं से फैलने वाले रोग) को रोकने के लिए पर्यावरण, पशु स्वास्थ्य और मानव स्वास्थ्य को एक साथ जोड़कर देखने की आवश्यकता है।
  • सामुदायिक भागीदारी: रिपोर्ट का एक अनूठा पहलू ‘नागरिक ऑडिट’ है। जैसे मनरेगा में सोशल ऑडिट होता है, वैसे ही सरकारी अस्पतालों और बीमा योजनाओं की समीक्षा आम नागरिकों और मरीजों के फीडबैक के आधार पर की जानी चाहिए।
  • वित्तपोषण: आयोग ने केंद्र और राज्य सरकारों से संयुक्त रूप से सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यय को 2030 तक जीडीपी के 3% तक ले जाने का आग्रह किया है।

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