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मुनरो सिद्धांत (Monroe Doctrine) | Apni Pathshala

Monroe Doctrine

Monroe Doctrine

संदर्भ:

हाल ही में अमेरिकी विशेष बलों ने वेनेजुएला की राजधानी कराकस में सैन्य अभियान चलाकर वहां के राष्ट्रपति को उनके आवास से गिरफ्तार कर लिया। यह पूरी दुनिया में अपनी तरह की पहली घटना है, जिसे अमेरिका ने 1823 के ऐतिहासिक ‘मुनरो सिद्धांत’ के अनुसार सही ठहराया।

मुनरो सिद्धांत (Monroe Doctrine) क्या हैं?

मुनरो सिद्धांत (Monroe Doctrine) अमेरिकी विदेश नीति के इतिहास में सबसे प्रभावशाली सिद्धांतों में से एक है। 2 दिसंबर, 1823 को तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जेम्स मुनरो ने कांग्रेस (अमेरिकी संसद) को दिए अपने वार्षिक संदेश में इस सिद्धांत की घोषणा की थी। मूल रूप से, यह सिद्धांत यूरोपीय शक्तियों द्वारा अमेरिकी महाद्वीपों (उत्तर और दक्षिण अमेरिका) में भविष्य के उपनिवेशीकरण या राजनीतिक हस्तक्षेप को रोकने के लिए बनाया गया था।

सिद्धांत के मुख्य स्तंभ:

  • गैर-उपनिवेशीकरण (Non-Colonization): राष्ट्रपति मुनरो ने स्पष्ट किया कि अमेरिकी महाद्वीप अब यूरोपीय शक्तियों द्वारा भविष्य में किसी भी नए उपनिवेश की स्थापना के लिए उपलब्ध नहीं हैं।
  • हस्तक्षेप न करना (Non-Intervention): अमेरिका ने घोषणा की कि वह यूरोपीय देशों के आंतरिक मामलों या उनके मौजूदा उपनिवेशों के मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेगा।
  • यूरोपीय हस्तक्षेप का विरोध (Hands Off): यदि कोई यूरोपीय शक्ति पश्चिमी गोलार्ध (Western Hemisphere) के किसी भी स्वतंत्र देश के मामलों में हस्तक्षेप करती है या उसे नियंत्रित करने की कोशिश करती है, तो अमेरिका इसे अपनी सुरक्षा और शांति के प्रति एक “शत्रुतापूर्ण कृत्य” (Hostile Act) मानेगा।

समय के साथ बदलता स्वरूप:

  • रूजवेल्ट कोरोलरी (1904): 20वीं सदी की शुरुआत में राष्ट्रपति थियोडोर रूजवेल्ट ने इसमें एक संशोधन जोड़ा, जिसे ‘रूजवेल्ट कोरोलरी’ कहा जाता है। इसके तहत अमेरिका ने कहा कि यदि लैटिन अमेरिकी देशों में “क्रोनिक रॉन्ग-डूइंग” (अव्यवस्था) होती है, तो अमेरिका वहां ‘अंतरराष्ट्रीय पुलिस शक्ति’ के रूप में हस्तक्षेप कर सकता है।
  • ट्रंप प्रशासन (2026): हाल ही में, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के कार्यकाल में, मुनरो सिद्धांत को पुनर्जीवित किया गया है। 2026 की शुरुआत में वेनेजुएला में की गई सैन्य कार्रवाई के दौरान ट्रंप ने इसका हवाला देते हुए कहा कि पश्चिमी गोलार्ध में चीन और रूस जैसे बाहरी देशों का प्रभाव बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। इसे विशेषज्ञों ने ‘डॉन-रो डॉक्ट्रिन’ (Don-roe Doctrine) का नाम दिया है।

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