Moonshot project
संदर्भ:
हाल ही में भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc), बेंगलुरु ने ब्रेन को-प्रोसेसर्स के विकास पर केंद्रित ‘मूनशॉट’ (Moonshot) प्रोजेक्ट लॉन्च किया है। जो न्यूरोलॉजिकल विकारों, विशेष रूप से स्ट्रोक (Stroke) के बाद मस्तिष्क के कार्यों को पुनर्जीवित करने में मदद करेंगे।
मूनशॉट परियोजना के बारे में:
यह एक उन्नत ब्रेन-कंप्यूटर इंटरफेस (BCI) परियोजना है, जिसका उद्देश्य ‘ब्रेन को-प्रोसेसर’ (Brain Co-processor) विकसित करना है। यह प्रोसेसर मानव मस्तिष्क के क्षतिग्रस्त हिस्सों की सहायता करने या उनके कार्यों को सप्लीमेंट करने के लिए डिज़ाइन किया गया एक हार्डवेयर-सॉफ्टवेयर हाइब्रिड सिस्टम है।
उद्देश्य (Objectives):
- पुनर्वास (Rehabilitation): स्ट्रोक (Stroke) के कारण लकवाग्रस्त या मांसपेशियों पर नियंत्रण खो चुके रोगियों की क्षमता को वापस लाना।
- न्यूरोलॉजिकल उपचार: भविष्य में मिर्गी (Epilepsy) और पार्किंसंस जैसे रोगों के लिए प्रभावी समाधान खोजना।
- स्वदेशी तकनीक: चिकित्सा क्षेत्र में आयातित तकनीकों पर निर्भरता कम करना और भारत-विशिष्ट डेटा तैयार करना।
संस्थान (Institution):
यह परियोजना भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc), बेंगलुरु द्वारा संचालित की जा रही है। इसे इन्फोसिस के सह-संस्थापक क्रिस गोपालकृष्णन के ‘प्रतीक्षा ट्रस्ट’ (Pratiksha Trust) द्वारा वित्तीय सहायता प्राप्त है। इसमें IISc के ‘सेंटर फॉर ब्रेन रिसर्च’ (CBR) और विभिन्न इंजीनियरिंग विभागों के विशेषज्ञ शामिल हैं।
चरण (Phases):
- चरण-1 (Non-invasive): इसमें ऐसे बाहरी पहनने योग्य (Wearable) उपकरण बनाए जा रहे हैं जो बिना सर्जरी के मस्तिष्क के संकेतों को पढ़ सकें।
- चरण-2 (Minimally Invasive): इसमें छोटे चिप्स या इलेक्ट्रोड्स को मस्तिष्क में प्रत्यारोपित किया जाएगा, जो अधिक सटीक संकेत और तेज़ रिस्पॉन्स प्रदान करेंगे।
कार्यप्रणाली (Working Mechanism):
यह एक ‘क्लोज्ड-लूप सिस्टम’ पर कार्य करता है। सबसे पहले, उपकरण मस्तिष्क के न्यूरल सिग्नल्स को ‘डिकोड’ करता है। फिर न्यूरोमॉर्फिक हार्डवेयर (जो इंसानी दिमाग की तरह बिजली की खपत और गणना करता है) इन संकेतों को प्रोसेस करता है। अंततः, यह सिस्टम अंगों को गति देने के लिए आवश्यक उत्तेजना (Stimulation) वापस मस्तिष्क या मांसपेशियों को भेजता है।
विशेषताएँ (Key Features):
- AI-संचालित: यह उन्नत डीप लर्निंग एल्गोरिदम का उपयोग करता है जो रोगी की ज़रूरतों के अनुसार खुद को ढाल लेता है।
- डिजिटल पब्लिक गुड्स: प्रोजेक्ट के निष्कर्ष, सॉफ्टवेयर और डेटासेट को ‘ओपन-सोर्स’ रखा जाएगा ताकि अन्य शोधकर्ता भी लाभ उठा सकें।
- लागत प्रभावी: इसे भारतीय परिस्थितियों और बजट के अनुकूल बनाया जा रहा है ताकि आम आदमी तक इसकी पहुंच हो सके।

