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Munich Security Conference

विषय-सूची

  1. परिचय
  2. इतिहास
  3. Munich Security Conference 2024
  4. भारत की भागीदारी
  5. निष्कर्ष
  6. FAQ’s

परिचय

म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन (एमएससी) दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा मंचों में से एक है। यह हर साल फरवरी में जर्मनी के म्यूनिख शहर में आयोजित किया जाता है। म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन (MSC) अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा नीतियों पर विचार-विमर्श का एक बड़ा वैश्विक मंच है। यह एक ऐसा ज़रिया है जहाँ दुनिया की गंभीर सुरक्षा समस्याओं के हल के लिए कूटनीतिक पहल की जाती हैं।

उद्देश्य:

  • सुरक्षा समुदाय के बीच निरंतर, अनौपचारिक बातचीत से भरोसा बनाना और विवादों का शांतिपूर्ण समाधान ढूँढना।
  • अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा नीतियों पर बहस के लिए प्रमुख वैश्विक मंच बनना।
  • समस्याओं के हल और विचारों के आदान-प्रदान के लिए “विचारों का बाज़ार” तैयार करना।
  • अधिकारियों के बीच अनौपचारिक बैठकों के लिए सुरक्षित जगह देना, यानी “बातचीत से शांति” स्थापित करना।
  • मुख्य सम्मेलन के अलावा, खास मुद्दों और क्षेत्रों पर महत्वपूर्ण कार्यक्रम आयोजित करना और एक वार्षिक रिपोर्ट “म्यूनिख सुरक्षा रिपोर्ट” प्रकाशित करना।

प्रतिभागी:

  • प्रतिवर्ष फरवरी में होने वाले मुख्य सम्मेलन में 450 से अधिक अहम हस्तियां और विचारक भाग लेते हैं। इनमें राष्ट्राध्यक्ष, मंत्री, प्रमुख अंतरराष्ट्रीय संगठनों के पदाधिकारी, उद्योग, मीडिया, शिक्षा जगत और समाज के प्रतिनिधि शामिल होते हैं।
  • सुरक्षा नीतियों पर आम जनता को भी शामिल करने के लिए बहसों का सीधा प्रसारण और रिपोर्ट्स, साक्षात्कार और सोशल मीडिया के ज़रिए उनके नतीजे साझा किए जाते हैं।

विशेषताएं:

  • भले ही म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन की जड़ें यूरोप और अटलांटिक समुदाय में हैं, लेकिन इसकी गतिविधियां वैश्विक होती हैं। दुनिया भर के हितधारकों को शामिल करने की कोशिश की जाती है।
  • दुनिया की सबसे अहम सुरक्षा चुनौतियों पर बहस चलाते हैं। सिर्फ मौजूदा मुद्दों पर ही नहीं, बल्कि भविष्य की संभावित समस्याओं पर भी ध्यान देते हैं।
  • सुरक्षा का समग्र दृष्टिकोण अपनाते हैं। सिर्फ पारंपरिक राष्ट्रीय या सैन्य सुरक्षा ही नहीं, बल्कि आर्थिक, पर्यावरणीय और मानवीय सुरक्षा पर भी विचार करते हैं।

म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन का इतिहास

म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन (MSC) अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा नीति के मुद्दों पर विचार-विमर्श के लिए दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण मंच है। यह 1963 से हर साल फरवरी में जर्मनी के म्यूनिख शहर में आयोजित किया जाता है।

शुरुआत

MSC की शुरुआत 1963 में हुई थी, जब शीत युद्ध अपने चरम पर था। उस समय, पश्चिमी जर्मनी के रक्षा मंत्री फ्रांज-जोसेफ स्ट्रॉस ने सोवियत संघ के बढ़ते खतरे के खिलाफ जवाब देने के लिए एक अंतरराष्ट्रीय मंच बनाने का फैसला किया।

विकास

पहले कुछ वर्षों में, MSC मुख्य रूप से पश्चिमी देशों के रक्षा अधिकारियों और विशेषज्ञों के लिए एक बैठक स्थल था। 1970 के दशक में, यह सम्मेलन पूर्वी यूरोपीय देशों के प्रतिनिधियों के लिए भी खुला हो गया। 1990 के दशक में शीत युद्ध के बाद, MSC में भाग लेने वाले देशों की संख्या में तेजी से वृद्धि हुई।

आज

आज, MSC में दुनिया भर के 100 से अधिक देशों के राजनेता, राजनयिक, सैन्य अधिकारी और विशेषज्ञ भाग लेते हैं। यह सम्मेलन अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा नीति के सभी प्रमुख मुद्दों पर विचार-विमर्श के लिए एक महत्वपूर्ण मंच है।

महत्वपूर्ण घटनाएं

  • MSC के इतिहास में कई महत्वपूर्ण घटनाएं हुई हैं।
  • 1975 में, सोवियत संघ के नेता लियोनिद ब्रेझनेव ने सम्मेलन में भाषण दिया, जो शीत युद्ध के दौरान किसी सोवियत नेता का पहला पश्चिमी देश में भाषण था।
  • 1990 में, जर्मन चांसलर हेल्मुट कोहल ने सम्मेलन में घोषणा की कि जर्मनी एकजुट हो जाएगा।
  • 2007 में, अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू. बुश ने सम्मेलन में ईरान पर आक्रमण करने की धमकी दी।

आलोचना

MSC को कई बार आलोचना का सामना भी करना पड़ा है। कुछ लोगों का कहना है कि यह सम्मेलन पश्चिमी देशों के हितों को बढ़ावा देता है। अन्य लोगों का कहना है कि यह सम्मेलन बहुत बड़ा और औपचारिक है, और इसमें वास्तविक नीति परिवर्तन नहीं होता है।

Munich Security Conference 2024

म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन (एमएससी) 2024, 16 से 18 फरवरी, 2024 तक म्यूनिख के होटल बेयरिशर हॉफ में आयोजित हुआ। यह म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन का 60वाँ संस्करण था।

Munich Security Conference 2024 का सारांश

दुनिया भर में तनाव बढ़ने और अर्थव्यवस्था की अनिश्चितता के कारण, कई सरकारें अब वैश्विक सहयोग के पूरे फायदों पर ध्यान नहीं दे रही हैं। इसके बजाय, उन्हें यह चिंता सता रही है कि दूसरे देशों के मुकाबले उन्हें कम फायदा हो रहा है। इस तरह केवल अपने फायदे को देखने की सोच से हार-हार की स्थिति पैदा हो सकती है, जिससे सहयोग खत्म हो सकता है और वह व्यवस्था भी बिगड़ सकती है, जिसने अपनी कमियों के बावजूद सभी के लिए फायदे बढ़ाने में मदद की है।

अमेरिका, यूरोप (ट्रांसअटलांटिक पार्टनर्स) और उनके साझेदार देशों (लाइक-माइंडेड स्टेट्स) के सामने एक मुश्किल चुनौती है। उन्हें दो अलग-अलग रास्तों पर एक साथ चलना है:

  • एक तरफ, उन्हें सतर्क रहना होगा क्योंकि दुनिया भर में राजनीतिक और आर्थिक प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है। इस माहौल में “अपना फायदा सोचो” वाला नजरिया रखना लाज़मी है।
  • दूसरी तरफ, उन्हें मिलजुलकर काम करना भी ज़रूरी है, जिससे सबका फायदा हो। ऐसा सहयोग न बना पाने पर पूरी दुनिया के विकास और बड़ी समस्याओं के समाधान में मुश्किलें आएंगी।

शीत युद्ध के अंत के बाद :

  • शीत युद्ध के अंत के बाद बना नया विश्व व्यवस्था शुरुआत में तो सफल रहा।
  • बड़े देशों के बीच युद्ध का खतरा कम हुआ।
  • आपसी सहयोग बढ़ा।
  • लोकतंत्र और मानवाधिकारों का प्रसार हुआ।
  • वैश्विक गरीबी कम हुई।
  • खुले और नियम-आधारित विश्व व्यवस्था से वैश्विक समृद्धि बढ़ी।

लेकिन अब हालात बदल रहे हैं :

  • निराशा बढ़ रही है, शीत युद्ध के अंत के बाद का आशावाद खत्म हो गया है।
  • राजनीतिक प्रतिस्पर्धा और आर्थिक सुस्ती बढ़ने से कई देश अंसंतुष्ट हैं।
  • उन्हें लगता है कि अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था से मिलने वाले फायदे असमान रूप से बँटे हैं।
  • विकासशील देशों को लगता है कि यह व्यवस्था सभी के लिए लाभ नहीं ला पाई है।
  • चीन जैसे देशों को लगता है कि अमेरिका उनकी तरक्की रोक रहा है।
  • पुराने शक्तिशाली देश भी असंतुष्ट हैं, क्योंकि उन्हें लगता है उनका प्रभाव कम हो रहा है।
  • सबको लगता है कि अगले दस सालों में चीन और अन्य दक्षिणी देश शक्तिशाली होंगे, जबकि उनके देश पीछे रह जाएंगे।
  • हर कोई सिर्फ अपने फायदे के बारे में सोचने लगा है, जिससे समृद्धि कम हो रही है और तनाव बढ़ रहा है।
  • यह बुरा दौर कई क्षेत्रों में पहले ही शुरू हो चुका है।

कुछ लोग मानते हैं कि दूसरों को मिलने वाला हर फायदा उनका खुद का नुकसान है। खासकर तानाशाही शासन अपने प्रभाव क्षेत्र बनाने के लिए ऐसा सोचते हैं। उदाहरण के लिए, पूर्वी यूरोप में रूस की राजनीतिक ताकत बढ़ाने की इच्छा के कारण युद्ध हो गया है और भविष्य में सहयोग से सुरक्षा बनाने का सपना टूट गया है।

ये सब मिलकर एक “हार-हार” वाली स्थिति बनाते हैं

  • यूक्रेन को अपने अस्तित्व के लिए ही लड़ना पड़ रहा है, उसे सबसे भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है।
  • रूस के लोगों को भी भारी कीमत चुकानी पड़ रही है, क्योंकि उन्हें युद्ध के खर्च और आर्थिक पाबंदियों का सामना करना पड़ रहा है।
  • यूरोपियन देशों को भी शांति का फायदा नहीं मिल रहा है। उन्हें अपने बचाव पर और यूक्रेन की मदद के लिए ज्यादा खर्च करना पड़ रहा है।

हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भी हालात बिगड़ सकते हैं

  • हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भी हालात बिगड़ सकते हैं जहाँ अलग-अलग देशों के भविष्य के विचार आपस में टकरा रहे हैं और एक-दूसरे को नुकसान पहुंचाने की प्रवृत्ति बढ़ रही है।
  • चीन अपने समुद्री इलाकों में लगातार सेना बढ़ा रहा है, जिससे डर है कि वो पूरे पूर्वी एशिया को अपने नियंत्रण में लेना चाहता है।
  • नतीजतन, इस क्षेत्र के कई देश अमेरिका से सुरक्षा के लिए नजदीक आ रहे हैं और चीन पर आर्थिक निर्भरता कम करने की कोशिश कर रहे हैं।
  • लेकिन चीन के साथ सहयोग पूरी तरह से खत्म करना दोनों पक्षों के लिए नुकसानदेह है।
  • साथ ही, अगर इस क्षेत्र में बड़ी ताकतों के बीच दुश्मनी बढ़ी, तो सभी को नुकसान होगा।

मध्य पूर्व में बढ़ती हिंसा से सबको नुकसान हो रहा है

  • हमास के आतंकवादी हमलों ने इजरायल में भारी नुकसान पहुँचाया है और वहां की सुरक्षा पर सवाल खड़ा कर दिया है।
  • इजरायल के जवाबी हमलों ने गाजा में भारी तबाही मचाई है, जिससे कई लोग मारे गए हैं, बुनियादी ढांचा नष्ट हो गया है और मानवीय संकट पैदा हो गया है।
  • इस युद्ध से क्षेत्रीय सहयोग की कोशिशों को भी झटका लग सकता है, जिससे शायद अब तक “सिर्फ अपने बारे में सोचने” की मानसिकता बदलने की जो कोशिशें हो रही थीं वो भी खत्म हो जाएंगी।
  • बुरी स्थिति में, ये युद्ध और फैल सकता है, खासकर अगर ईरान के साथी देश उसमें शामिल हो जाएं।

सहारा रेगिस्तान के दक्षिण में स्थित सहेल क्षेत्र में सैनिक तख्तापलट

  • अफ्रीका के सहारा रेगिस्तान के दक्षिण में स्थित सहेल क्षेत्र में सैनिक तख्तापलट ने स्थिति को और बिगाड़ दिया है।
  • बुर्किना फासो, माली और नाइजर में सैनिक शासन आने से यूरोप और अमेरिका ने वहां विकास, लोकतंत्र, सुशासन, आतंकवाद से लड़ाई और पलायन को रोकने में सहयोगी खो दिए हैं।
  • वहीं, सहेल के लोग शांति और लोकतंत्र की उम्मीद खोते जा रहे हैं।
  • 2021 के तख्तापलट के बाद सूडान में भी चल रहे सत्ता संघर्ष के कारण भयानक मानवीय संकट खड़ा हो गया है।

दुनिया भर में बढ़ते राजनीतिक तनाव से वैश्वीकरण पर भी असर पड़ रहा है

  • पहले सब मिलकर फायदा बढ़ाने की सोचते थे, अब देश एक-दूसरे पर दबाव बनाने से बचने के लिए आर्थिक सुरक्षा पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं।
  • इस वजह से व्यापार, पूंजी आदि का आदान-प्रदान अब राजनीतिक तनाव के हिसाब से ही हो रहा है।
  • अपने आर्थिक रिश्तों को कम खतरनाक बनाने से शायद झगड़े का खतरा कम हो सकता है, लेकिन इससे दुनिया की अर्थव्यवस्था भी टूट-फूट कर अलग-अलग हो सकती है, जिससे खासकर गरीब देशों को नुकसान होगा।

जलवायु परिवर्तन जैसी वैश्विक समस्या

  • जलवायु परिवर्तन जैसी वैश्विक समस्या से लड़ने के लिए सभी देशों को मिलकर काम करना बहुत जरूरी है। ऐसा करने से सबका फायदा हो सकता है।
  • पर अभी दुनिया में राजनीतिक तनाव इतना बढ़ गया है कि इस पर भी असर पड़ने का खतरा है।
  • हालांकि पर्यावरण की रक्षा, अर्थव्यवस्था का विकास और वैश्विक संबंध, तीनों एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं, पर जलवायु परिवर्तन से लड़ने के लिए जरूरी तकनीकें और नेट-जीरो उत्सर्जन का लक्ष्य पाने में कई समस्याएं आ सकती हैं।
  • इन समस्याओं की वजह चीन और अमेरिका के बीच तनाव, हरे व्यापार और सब्सिडी के नियमों पर यूरोपीय देशों के बीच मतभेद, और गरीब और अमीर देशों के बीच मतभेद हो सकते हैं, खासकर जलवायु परिवर्तन से लड़ने के लिए धन देने को लेकर।

तकनीकी तरक्की

  • पहले तकनीकी तरक्की से पूरी दुनिया को फायदा होता था, पर अब बड़े देश इसका इस्तेमाल सिर्फ खुद को आगे बढ़ाने के लिए कर रहे हैं।
  • उदाहरण के लिए, चीन, अमेरिका और दूसरे देश महत्वपूर्ण टेक्नोलॉजी जैसे सेमीकंडक्टर और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) पर अपना वर्चस्व कायम करना चाहते हैं।
  • इसके लिए वो ये भी तैयार हैं कि टेक्नोलॉजी का क्षेत्र अलग-अलग टुकड़ों में बंट जाएगा और सबको नुकसान उठाना पड़ेगा।
  • दुनिया भर में AI और डेटा सुरक्षा के लिए जरूरी नियम भी नहीं बन पाएंगे, क्योंकि हर देश अपनी सुरक्षा को सबसे ज्यादा अहमियत दे रहा है।

म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन में भारत की भागीदारी

भारत 2000 से इस सम्मेलन में नियमित रूप से भाग ले रहा है।

भागीदारी का महत्व

एमएससी में भागीदारी भारत के लिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह भारत को:

  • विश्व नेताओं और नीति निर्माताओंके साथ महत्वपूर्ण सुरक्षा मुद्दों पर विचार-विमर्श करने का अवसर प्रदान करता है।
  • भारत की सुरक्षा नीति और हितोंको बढ़ावा देने का मंच प्रदान करता है।
  • अंतरराष्ट्रीय समुदाय में भारत की बढ़ती भूमिकाको दर्शाता है।

भारत की भागीदारी के मुख्य बिंदु

  • 2024 में, भारत के विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने सम्मेलन में भाग लिया। उन्होंने ‘ग्रोइंग द पाई: सीजिंग शेयर्ड अपॉर्चुनिटीज’ (Growing the Pie: Seizing Shared Opportunities) विषय पर एक पैनल चर्चा में भाग लिया।
  • 2023 में, भारत के विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने सम्मेलन में भाग लिया। उन्होंने “अस्थिरता और अनिश्चितता के युग में रणनीतिक स्वायत्तता” विषय पर एक पैनल चर्चा में भाग लिया।
  • 2022 में, भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने सम्मेलन में भाग लिया। उन्होंने “भारत-प्रशांत क्षेत्र में सुरक्षा चुनौतियों” विषय पर एक पैनल चर्चा में भाग लिया।
  • 2021 में, भारत के विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने सम्मेलन में भाग लिया। उन्होंने “COVID-19 के बाद की दुनिया में सुरक्षा” विषय पर एक पैनल चर्चा में भाग लिया।

निष्कर्ष :

दुनिया भर में बढ़ते तनाव की वजह से खुली और नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था कमज़ोर हो रही है। यह व्यवस्था पहले सबको फायदा पहुँचाने का वादा करती थी, पर अब ऐसा नहीं हो रहा है।

इस मुश्किल समय में अमेरिका, यूरोप और उनके समान विचारधारा वाले देशों को दो चीजें संतुलित करनी होंगी:

  • एक तरफ उन्हें अपनी सुरक्षा का ध्यान रखना है और ताकत दिखानी है।
  • दूसरी तरफ उन्हें सिर्फ अपने जैसे देशों के साथ मिलकर ही फायदा नहीं उठाना चाहिए, बल्कि यह कोशिश करनी चाहिए कि दुनिया के दूसरे देशों को भी फायदा हो।

लेकिन यह बहुत मुश्किल है, क्योंकि अगर वो सिर्फ अपने जैसे देशों से ही मिलकर काम करेंगे तो दूसरे देश भी ऐसा ही करेंगे और दुनिया भर में सहयोग कम हो जाएगा। खासकर इस साल चुनाव होने वाले हैं, तो शायद लोकतंत्रों के बीच मिलकर काम करने के फायदे भी कम आंके जाएंगे। इससे खतरा है कि दुनिया भर में और ज्यादा देश “हार-हार” वाली स्थिति में आ जाएंगे, जहां कोई जीतेगा नहीं, सबको थोड़ा-बहुत नुकसान होगा।

FAQ’s

1. म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन क्या है?
उत्तर – यह एक वार्षिक सम्मेलन है जो दुनिया भर के नेताओं, राजनयिकों, और विशेषज्ञों को अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा नीति के मुद्दों पर विचार-विमर्श करने के लिए एक मंच प्रदान करता है।

2. यह सम्मेलन कब और कहाँ आयोजित किया जाता है?
उत्तर – यह सम्मेलन हर साल फरवरी में जर्मनी के म्यूनिख शहर में आयोजित किया जाता है।

3. इस सम्मेलन में कौन भाग लेता है?
उत्तर – इस सम्मेलन में दुनिया भर के 100 से अधिक देशों के नेता, राजनयिक, सैन्य अधिकारी और विशेषज्ञ भाग लेते हैं।

4. इस सम्मेलन का उद्देश्य क्या है?
उत्तर – इस सम्मेलन का उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा नीति के मुद्दों पर विचार-विमर्श को बढ़ावा देना और शांतिपूर्ण समाधानों को खोजने में मदद करना है।

5. इस सम्मेलन में क्या-क्या मुद्दों पर चर्चा होती है?
उत्तर – इस सम्मेलन में आतंकवाद, जलवायु परिवर्तन, साइबर सुरक्षा, और परमाणु हथियारों जैसे कई मुद्दों पर चर्चा होती है।

6. क्या भारत इस सम्मेलन में भाग लेता है?
हाँ, भारत 2000 से इस सम्मेलन में नियमित रूप से भाग ले रहा है।

7. इस सम्मेलन में भारत का प्रतिनिधित्व कौन करता है?
उत्तर – आमतौर पर, भारत के विदेश मंत्री या रक्षा मंत्री इस सम्मेलन में भारत का प्रतिनिधित्व करते हैं।

8. इस सम्मेलन में भारत के लिए क्या महत्व है?
उत्तर – यह सम्मेलन भारत को अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा में एक महत्वपूर्ण खिलाड़ी के रूप में स्थापित करने में मदद करता है।

9. इस सम्मेलन में भारत ने अब तक क्या उपलब्धियां हासिल की हैं?
उत्तर – भारत ने इस सम्मेलन में कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर अपनी आवाज उठाई है और अंतरराष्ट्रीय समुदाय के साथ महत्वपूर्ण सहयोग स्थापित किया है।

10. क्या आप इस सम्मेलन के बारे में अधिक जानकारी प्राप्त कर सकते हैं?
उत्तर – हाँ, आप म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन की आधिकारिक वेबसाइट https://securityconference.org/ पर जाकर अधिक जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।

Disclaimer: The article may contain information pertaining to prior academic years; for further information, visit the exam’s official or concerned website.

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