NGT nod for Great Nicobar Island mega-project
संदर्भ:
राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) ने 16 फरवरी 2026 को “रणनीतिक महत्व” का हवाला देते हुए ग्रेट निकोबार द्वीप (GNI) मेगा-प्रोजेक्ट को अंतिम मंजूरी प्रदान कर दी है।
- NGT की उच्चाधिकार प्राप्त समिति (HPC) 2023 ने मूंगा चट्टानों, लेदरबैक कछुओं के घोंसले और स्थानीय पारिस्थितिकी पर रिपोर्ट सौंपी, जिसके बाद NGT ने परियोजना को हरी झंडी दी।
- NGT ने निर्देश दिया है कि पर्यावरण मंत्रालय (MoEFCC) कोरल पुनर्जनन (Coral Regeneration) और तटीय कटाव को रोकने के लिए “सख्त अनुपालन” सुनिश्चित करे।
ग्रेट निकोबार मेगा प्रोजेक्ट:
- परिचय: यह परियोजना नीति आयोग द्वारा परिकल्पित है। यह भारत की अब तक की सबसे महत्वाकांक्षी और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण ‘ग्रीनफील्ड’ बुनियादी ढांचा परियोजना है।
- क्रियान्वयन: इसका क्रियान्वयन ‘अंडमान और निकोबार द्वीप समूह एकीकृत विकास निगम’ (ANIIDCO) द्वारा किया जा रहा है।
- लागत: ₹92,000 करोड़ की अनुमानित लागत।
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- भूमि क्षेत्र: यह परियोजना लगभग 166 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैली हुई है , जो ग्रेट निकोबार द्वीप समूह के कुल भूभाग का लगभग 10 प्रतिशत है। इस परियोजना में गलाथिया खाड़ी , पेम्माया खाड़ी और नंजप्पा खाड़ी की भूमि शामिल है।
- घटक:
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- अंतरराष्ट्रीय कंटेनर ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल (ICTT): गैलेथिया खाड़ी में विकसित होने वाला यह बंदरगाह दुनिया के व्यस्ततम समुद्री मार्ग ‘मलक्का जलडमरूमध्य’ के मुहाने पर स्थित होगा।
- ग्रीनफील्ड अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा: यह सैन्य और नागरिक (दोहरे उपयोग) उद्देश्यों के लिए विकसित किया जाएगा।
- टाउनशिप और बुनियादी ढांचा: द्वीप पर एक आधुनिक शहर का निर्माण किया जाएगा।
- गैस और सौर आधारित बिजली संयंत्र: 450 MVA की क्षमता वाला बिजली घर जो ऊर्जा जरूरतों को पूरा करेगा।
रणनीतिक महत्व:
- समुद्री सुरक्षा और निगरानी: ग्रेट निकोबार की स्थिति भारत को मलक्का जलडमरूमध्य पर एक प्रभावी ‘निरीक्षक’ के रूप में स्थापित करती है। यहाँ से भारत हिंद महासागर में जहाजों, विमानों और ड्रोन की तैनाती कर समुद्री मार्गों की सुरक्षा और दुश्मन की गतिविधियों पर नजर रख सकता है।
- चीन की ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’: चीन हिंद महासागर में अपनी उपस्थिति बढ़ा रहा है। ग्रेट निकोबार में एक मजबूत सैन्य और व्यापारिक अड्डा भारत के लिए ‘काउंटर-स्ट्रैटेजी’ के रूप में कार्य करेगा, जिससे क्षेत्रीय संतुलन बना रहेगा।
- आर्थिक केंद्र के रूप में विकास: वर्तमान में भारत का लगभग 75% ट्रांसशिपमेंट कार्गो विदेशी बंदरगाहों (जैसे कोलंबो या सिंगापुर) के माध्यम से आता है। इस टर्मिनल के बनने से भारत एक वैश्विक लॉजिस्टिक्स हब बनेगा, जिससे विदेशी मुद्रा की बचत होगी और रोजगार सृजन होगा।
पारिस्थितिक चुनौतियां:
- जैव विविधता का नुकसान: इस परियोजना के लिए लगभग 130 वर्ग किलोमीटर वर्षावन का उपयोग किया जाएगा, जिससे करीब 8.5 लाख से 10 लाख पेड़ों की कटाई हो सकती है।
- लेदरबैक कछुए: गैलेथिया खाड़ी दुनिया के सबसे बड़े कछुओं का मुख्य घोंसला बनाने का स्थान है। निर्माण से उनके अस्तित्व पर खतरा मंडरा सकता है।
- कोरल रिफ: यहाँ की मूंगा चट्टानें अत्यंत संवेदनशील हैं। सरकार ने इन्हें ‘ट्रांसलोकेट’ (दूसरे स्थान पर स्थानांतरित) करने की योजना बनाई है, जिसकी सफलता पर वैज्ञानिकों को संदेह है।
- शोंपेन (Shompen) और निकोबारी: यह द्वीप दो महत्वपूर्ण जनजातियों का घर है। शोंपेन एक PVTG (विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह) हैं जो शिकार और संग्रहण पर निर्भर हैं। उनकी जीवनशैली और आवास के प्रभावित होने की गंभीर चिंता जताई गई है।
- जनसांख्यिकीय बदलाव: वर्तमान में द्वीप की आबादी बहुत कम है। टाउनशिप बनने से बाहर से आने वाले लोगों की भारी संख्या स्थानीय पारिस्थितिकी और संस्कृति पर दबाव बढ़ा सकती है।
- भूकंपीय संवेदनशीलता: ग्रेट निकोबार सीस्मिक जोन-V (अत्यधिक उच्च जोखिम) में आता है। 2004 की सुनामी में यह क्षेत्र बुरी तरह प्रभावित हुआ था।
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