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मध्य प्रदेश में गुइलेन-बैरे सिंड्रोम का प्रकोप (Outbreak of Guillain-Barre syndrome in Madhya Pradesh) | Apni Pathshala

Outbreak of Guillain-Barre syndrome in Madhya Pradesh

Outbreak of Guillain-Barre syndrome in Madhya Pradesh

संदर्भ:

हाल ही में मध्य प्रदेश नीमच जिले में गुइलेन-बैरे सिंड्रोम (Guillain-Barré Syndrome – GBS) के प्रकोप से दो बच्चों (क्रमशः 6 और 15 वर्ष) की मृत्यु हो चुकी है। 20 जनवरी 2026 तक प्राप्त आंकड़ों के अनुसार, अब तक कुल 18 मामले (9 पुष्ट और 9 संदिग्ध) दर्ज किए गए हैं।

गुइलेन-बैरे सिंड्रोम (GBS) क्या है?

  • यह एक दुर्लभ ऑटोइम्यून न्यूरोलॉजिकल विकार (Autoimmune Neurological Disorder) है। 
  • इसमें शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली (Immune System) गलती से अपनी ही परिधीय तंत्रिकाओं (Peripheral Nerves) पर हमला कर देती है।
  • इससे तंत्रिकाओं के ‘माइलिन म्यान’ (Myelin Sheath) को नुकसान पहुँचाता है, जिससे मस्तिष्क और मांसपेशियों के बीच संचार बाधित हो जाता है। 
  • यह किसी भी उम्र में हो सकता है, लेकिन यह सबसे अधिक 30 से 50 वर्ष की आयु के लोगों को प्रभावित करता है।
  • इसके परिणामस्वरूप मांसपेशियों में कमजोरी, सुन्नपन और गंभीर मामलों में पूर्ण पक्षाघात (Paralysis) हो सकता है। 
  • अधिकांश लोग (लगभग 70%) पूरी तरह से ठीक हो जाते हैं, हालांकि रिकवरी में महीनों या सालों लग सकते हैं।

इसके कारण:

  • GBS स्वयं संक्रामक नहीं है, लेकिन यह अक्सर किसी संक्रमण के बाद ‘इम्यून रिस्पांस’ के रूप में विकसित होता है। 
  • कैम्पिलोबैक्टर जेजुनी (Campylobacter jejuni) नामक बैक्टीरिया, जो दूषित भोजन या अधपके मुर्गे से फैलता है, इसका सबसे आम कारण है।
  • अन्य कारक जैसे वायरल संक्रमण (जैसे इन्फ्लूएंजा, साइटोमेगालोवायरस) के माध्यम से भी इसका प्रसार होता है।

इसके लक्षण:

GBS के लक्षण अक्सर पैरों से शुरू होकर ऊपर की ओर बढ़ते हैं (Ascending Paralysis): 

  • प्रारंभिक लक्षण: हाथों-पैरों में झुनझुनी, कमजोरी और चलने में कठिनाई।
  • गंभीर लक्षण: चेहरे की मांसपेशियों में कमजोरी, निगलने या बोलने में कठिनाई।
  • आपातकालीन स्थिति: यदि श्वसन मांसपेशियां प्रभावित होती हैं, तो रोगी को सांस लेने के लिए वेंटिलेटर की आवश्यकता पड़ती है। 

उपचार की विधियाँ:

GBS का कोई विशिष्ट पूर्ण इलाज नहीं है, लेकिन दो मुख्य उपचार रिकवरी को तेज करते हैं: 

  • इंट्रावेनस इम्युनोग्लोबुलिन (IVIG): इसमें डोनर के रक्त से स्वस्थ एंटीबॉडीज दी जाती हैं जो हानिकारक एंटीबॉडीज को ब्लॉक करती हैं।
  • प्लाज्माफेरेसिस (Plasma Exchange): इस प्रक्रिया में रक्त से हानिकारक एंटीबॉडीज युक्त प्लाज्मा को हटाकर नया प्लाज्मा डाला जाता है।

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