Pandharpur Wari
संदर्भ:
हर साल जून–जुलाई के महीने में महाराष्ट्र में हजारों श्रद्धालु पंढरपुर वारी नामक एक आध्यात्मिक यात्रा पर निकलते हैं। यह ऐतिहासिक और भावनात्मक रूप से समृद्ध यात्रा भक्तों की विठोबा (भगवान विट्ठल) के प्रति अटूट श्रद्धा को दर्शाती है, जिसमें लोग पालखियों के साथ भजन-कीर्तन करते हुए पैदल चलते हैं और पंढरपुर में विठोबा मंदिर पहुंचते हैं।
क्या है पंढरपुर वारी (Pandharpur Wari)?
- यह हर साल होने वाली एक भव्य पदयात्रा (वारी या यात्रा) है, जो महाराष्ट्र के विभिन्न भागों से पंढरपुर (जिला सोलापुर) तक जाती है — जो भगवान विट्ठल (भगवान विष्णु का एक रूप) का प्रमुख तीर्थ है।
- यात्रा का मुख्य उद्देश्य है आषाढ़ी एकादशी के दिन पंढरपुर पहुंचकर विट्ठल-रुक्मिणी दर्शन करना।
मुख्य विशेषताएं:
- पालखी परंपरा: संत ज्ञानेश्वर महाराज (आलंदी) और संत तुकाराम महाराज (देहु) की पादुका (चरणपादुका) को पालखी में रखकर पंढरपुर ले जाया जाता है।
- वारी में भाग लेने वाले भक्तों को वारीकरी कहते हैं, जिसका अर्थ है “वारी करने वाला”।
- लाखों वारीकरी भक्त 15–20 दिन की यात्रा में 250+ किलोमीटर की दूरी पैदल तय करते हैं।
इतिहास व परंपरा:
- यह परंपरा 700 से 800 वर्ष पुरानी मानी जाती है, जो भक्ति आंदोलन से गहराई से जुड़ी हुई है।
- संत नामदेव, एकनाथ, तुकाराम, ज्ञानेश्वर आदि संतों ने इस परंपरा को मजबूत किया।
- वारी केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता, अनुशासन, सेवा और आध्यात्मिकता का प्रतीक है।
सांस्कृतिक महत्व:
- वारी में भजनों, अभंगों, लेझीम, मृदंग, ताली और हरिनाम संकीर्तन का संग चलता है।
- यह आयोजन न केवल भक्ति का रूप है, बल्कि पर्यावरण जागरूकता, स्वास्थ्य, अनुशासन और एकता का संदेश भी देता है।