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पार्वती-अरगा पक्षी अभयारण्य को इको-सेंसिटिव ज़ोन घोषित किया गया (Parvati-Arga Bird Sanctuary declared as eco-sensitive zone) | UPSC Preparation

Parvati-Arga Bird Sanctuary declared as eco-sensitive zone

Parvati-Arga Bird Sanctuary declared as eco-sensitive zone

संदर्भ:

हाल ही में भारत सरकार ने उत्तर प्रदेश के पार्वती-अरगा पक्षी अभयारण्य (Parvati-Arga Bird Sanctuary) को इको-सेंसिटिव ज़ोन (ESZ) घोषित किया है। जिसका उद्देश्य इसकी जैव विविधता को मजबूत करना और इसे इको-टूरिज्म स्थल के रूप में विकसित करना है।

पार्वती-अरगा पक्षी अभयारण्य के बारे में:

  • स्थान: यह अभयारण्य उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले की तरबगंज तहसील में मनकापुर-नवाबगंज मार्ग पर स्थित है।
  • क्षेत्रफल: यह लगभग 1,084 हेक्टेयर (10.84 वर्ग किमी) क्षेत्र में फैला हुआ है।
  • झील का प्रकार: यह गंगा के मैदान की ‘तराई’ क्षेत्र में स्थित दो गोखुर झीलों (Oxbow Lakes)—पार्वती और अरगा—का संगम है। ये झीलें प्राचीन काल में सरयू नदी के मार्ग परिवर्तन के कारण बनीं।
  • महत्व: यह क्षेत्र ऊपरी गंगा के मैदान के ‘नम पर्णपाती वन’ (Moist Deciduous Forest) ईकोरिजियन का हिस्सा है। 
  • स्थापना: इसे उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा 1990 में वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के तहत पक्षी विहार के रूप में अधिसूचित किया गया था।
  • रामसर स्थल (Ramsar Site): 2019 में इसे अंतरराष्ट्रीय महत्व की आर्द्रभूमि (रामसर साइट) घोषित किया गया।
  • विशेष आयोजन: 2 फरवरी, 2025 को विश्व आर्द्रभूमि दिवस (World Wetlands Day) का मुख्य राष्ट्रीय समारोह यहीं आयोजित किया गया।
  • प्रवासी पक्षी: सर्दियों के दौरान यहाँ तिब्बत, चीन, यूरोप और साइबेरिया से लगभग 1,00,000 से अधिक पक्षी पहुँचते हैं। मुख्य प्रजातियों में ग्रेलेग गूज़, नॉर्दर्न पिनटेल, कॉमन टील और मैलार्ड शामिल हैं।
  • संकटग्रस्त प्रजातियां: यहाँ गंभीर रूप से लुप्तप्राय (Critically Endangered) सफेद पूंछ वाला गिद्ध और भारतीय गिद्ध पाए जाते हैं। इसके अतिरिक्त, उत्तर प्रदेश का राजकीय पक्षी सारस क्रेन भी यहाँ बहुतायत में मिलता है।
  • प्रमुख खतरे: जलकुंभी (Invasive Water Hyacinth) का प्रसार, मानवीय हस्तक्षेप, और आस-पास सड़कों/रेलवे का विकास यहाँ के पारिस्थितिकी तंत्र के लिए मुख्य चुनौती हैं।

इको-सेंसिटिव ज़ोन (ESZ) क्या है?

इको-सेंसिटिव ज़ोन (ESZ) या पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र, संरक्षित क्षेत्रों (राष्ट्रीय उद्यानों और वन्यजीव अभयारण्यों) के चारों ओर घोषित ‘बफर ज़ोन’ होते हैं।

    • अधिनियम: इन्हें पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के तहत पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) द्वारा अधिसूचित किया जाता है।
    • उद्देश्य: इनका मुख्य उद्देश्य संरक्षित क्षेत्रों के लिए एक ‘शॉक एब्जॉर्बर’ (Shock Absorber) के रूप में कार्य करना है ताकि उच्च सुरक्षा वाले क्षेत्रों और मानव गतिविधियों वाले क्षेत्रों के बीच संक्रमण क्षेत्र बनाया जा सके।
    • दूरी: सामान्यतः ESZ की सीमा संरक्षित क्षेत्र की बाहरी सीमा से 10 किलोमीटर तक हो सकती है। हालांकि, यदि पारिस्थितिक रूप से आवश्यक हो, तो इसे 10 किमी से अधिक भी बढ़ाया जा सकता है।
    • सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय (2022-23): सुप्रीम कोर्ट ने अनिवार्य किया कि प्रत्येक संरक्षित क्षेत्र के चारों ओर कम से कम 1 किमी का ESZ होना चाहिए (हालांकि भौगोलिक बाधाओं वाले क्षेत्रों में इसमें छूट संभव है)।
  • गतिविधियां: ESZ के भीतर गतिविधियों को तीन श्रेणियों में बाँटा गया है:
    • प्रतिबंधित (Prohibited): वाणिज्यिक खनन, भारी उद्योग, बड़े जलविद्युत प्रोजेक्ट और प्रदूषणकारी गतिविधियाँ।
    • विनियमित (Regulated): पेड़ों की कटाई, होटलों/रिसॉर्ट्स का निर्माण, और भूमि उपयोग में बदलाव (इनके लिए अनुमति आवश्यक है)।
    • अनुमति प्राप्त (Permitted/Promoted): वर्षा जल संचयन, जैविक खेती, कुटीर उद्योग और हरित तकनीक का उपयोग।

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