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निजी सदस्य विधेयक (Private Member Bill) | UPSC

Private Member Bill

Private Member Bill

संदर्भ:

हाल ही में राज्यसभा में निजी सदस्यों द्वारा कई महत्वपूर्ण निजी सदस्य विधेयक पेश किए गए, जो संसदीय लोकतंत्र में व्यक्तिगत सांसदों की विधायी भूमिका को रेखांकित करते हैं।

निजी सदस्य विधेयक क्या हैं?

संसद का वह सदस्य जो मंत्री नहीं है, ‘निजी सदस्य’ कहलाता है। चाहे वह सदस्य सत्ताधारी दल का हो या विपक्ष का, यदि वह मंत्रिपरिषद (Council of Ministers) में शामिल नहीं है, तो उसके द्वारा पेश किया गया कोई भी विधेयक ‘निजी सदस्य विधेयक’ माना जाता है। 

संवैधानिक आधार:

  • अनुच्छेद 107: भारतीय संविधान का अनुच्छेद 107 सामान्य रूप से विधेयकों को पेश करने और पारित करने की शक्ति प्रदान करता है, जिसमें निजी सदस्यों के अधिकार भी निहित हैं।
  • संसदीय नियम: लोकसभा के नियम 62 से 68 और राज्यसभा के नियम 53 से 63 निजी सदस्य विधेयकों के प्रस्तुतीकरण, नोटिस और चर्चा की प्रक्रिया को विनियमित करते हैं। 

योग्यता (Eligibility):

  • संसद का कोई भी सदस्य (लोकसभा या राज्यसभा) जो मंत्री नहीं है, इसे पेश कर सकता है।
  • एक सत्र के दौरान एक सदस्य अधिकतम तीन नोटिस दे सकता है।

प्रक्रिया (Procedure):

  • नोटिस अवधि: इसे पेश करने के लिए एक महीने (1 Month) का अग्रिम नोटिस देना अनिवार्य है।
  • निर्धारित समय: इन विधेयकों पर चर्चा केवल शुक्रवार को होती है।
  • चयन प्रक्रिया: चूंकि कई सदस्य विधेयक पेश करते हैं, इसलिए चर्चा के लिए विधेयकों का चयन बैलट सिस्टम (Lottery System) के माध्यम से किया जाता है।
  • ड्राफ्टिंग: सरकारी विधेयकों के विपरीत, निजी सदस्य विधेयक का मसौदा (Draft) तैयार करने की पूरी जिम्मेदारी स्वयं उस सांसद की होती है।
  • समिति की भूमिका: ‘गैर-सरकारी सदस्यों के विधेयकों और संकल्पों संबंधी समिति’ इन विधेयकों की जांच और वर्गीकरण करती है। 

उपलब्धि (Achievements):

  • आजादी से अब तक केवल 14 निजी सदस्य विधेयक ही कानून (अधिनियम) बन पाए हैं।
  • अंतिम बार 1970 में ‘सर्वोच्च न्यायालय (आपराधिक अपीलीय क्षेत्राधिकार का विस्तार) विधेयक, 1968’ कानून बना था。
  • अन्य प्रमुख सफल विधेयकों में ‘संसदीय कार्यवाही प्रकाशन संरक्षण विधेयक, 1956’ और ‘भारतीय दंड संहिता संशोधन विधेयक, 1967’ शामिल हैं। 

महत्व (Significance):

  • विधायी अंतराल को भरना: यह उन मुद्दों को उजागर करता है जिन्हें सरकार ने अपने एजेंडे में शामिल नहीं किया है।
  • लोकतांत्रिक भागीदारी: यह विपक्ष और बैकबेंचर्स को कानून बनाने की प्रक्रिया में समान अवसर प्रदान करता है।
  • सामाजिक सुधार: कई महत्वपूर्ण कानून (जैसे ट्रांसजेंडर अधिकार) की शुरुआत निजी सदस्य विधेयकों के माध्यम से हुई बहस से हुई है।
  • सरकार को सचेत करना: ये विधेयक सार्वजनिक महत्व के संवेदनशील मुद्दों पर सरकार का ध्यान आकर्षित करने का एक सशक्त माध्यम हैं।

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