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रैमजेट-संचालित आर्टिलरी शेल (Ramjet-powered artillery shell) | Ankit Avasthi Sir

Ramjet-powered artillery shell

Ramjet-powered artillery shell

संदर्भ:

भारतीय सेना 155 मिमी तोपों के लिए रैमजेट-संचालित तोपखाने के गोले (Ramjet-Powered Artillery Shells) का उपयोग करने वाली दुनिया की पहली सशस्त्र सेना बनने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रही है। जो रक्षा प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में एक क्रांतिकारी कदम है।

रैमजेट आर्टिलरी शेल्स क्या हैं?

  • यह एक उन्नत तोप का गोला है जिसमे रामजेट प्रोपल्शन मॉड्यूल लगा होता है। जिनका विकास IIT मद्रास के एयरोस्पेस इंजीनियरिंग विभाग ने आर्मी टेक्नोलॉजी बोर्ड (ATB) और म्यूनिशन्स इंडिया लिमिटेड (MIL) के सहयोग से किया है।  
  • रैमजेट इंजन एक ‘एयर-ब्रीदिंग’ (हवा से ऑक्सीजन लेने वाला) इंजन है। जब इसे आर्टिलरी शेल (गोले) में लगाया जाता है, तो यह गोले की गति और सीमा (Range) को अभूतपूर्व तरीके से बढ़ा देता है। 
  • भारतीय सेना इस तकनीक को 155mm तोपखाने के साथ एकीकृत कर रही है। जो 60 से 100 किमी से अधिक की दूरी तक सटीक निशाना लगाने में सक्षम हैं। 
  • जब गोले को तोप से दागा जाता है, तो यह लगभग मैक 2 (ध्वनि से दोगुनी गति) की गति प्राप्त कर लेता है। इस गति पर, सामने से आने वाली हवा इंजन में प्राकृतिक रूप से संकुचित (Compressed) हो जाती है, जहाँ ईंधन जलकर निरंतर थ्रस्ट पैदा करता है।

प्रमुख विशेषताएं:

  • ये गोले NavIC (भारतीय नेविगेशन प्रणाली) और ‘प्रिसिजन गाइडेंस किट’ (PGK) से लैस होते हैं, जो इन्हें 80 किमी से अधिक की दूरी पर भी सटीक बनाते हैं। 
  • पारंपरिक 155mm गोले की रेंज 30-45 किमी होती है, जबकि रामजेट तकनीक इसे 30-50% तक बढ़ा देती है।
  • ठोस रॉकेट-सहायता प्राप्त गोलों (2500 Ns/kg) की तुलना में इस गोले की विशिष्ट आवेग (Specific Impulse) 4000 Ns/kg से अधिक होती है, जो समान वजन में अधिक दूरी तय करने में सहायक है।
  • इन्हें भारतीय सेना के मौजूदा 155mm प्लेटफार्मों जैसे K9 वज्र-T, धनुष, ATAGS, और M777 अल्ट्रा-लाइट होवित्जर पर ‘रिट्रोफिट’ (जोड़ा) किया जा सकता है। 

महत्व:

  • डीप स्ट्राइक क्षमता: सेना अब दुश्मन के पीछे स्थित रसद केंद्रों (Logistics centres) और कमांड पोस्टों को बिना मिसाइल खर्च किए तबाह कर सकती है।
  • काउंटर-बैटरी फायर: लंबी रेंज होने के कारण भारतीय तोपखाने दुश्मन की तोपों की पहुंच से बाहर रहकर उन पर हमला कर सकते हैं।
  • हिमालयी सीमा पर लाभ: एलएसी (LAC) जैसे कठिन पहाड़ी इलाकों में, जहाँ मिसाइलों की तैनाती कठिन है, ये हल्के और लंबी दूरी के गोले गेम-चेंजर साबित होंगे।
  • लागत प्रभावशीलता: एक रैमजेट है शेल की लागत मिसाइल की तुलना में काफी कम होती है, जिससे यह मध्यम दूरी के लक्ष्यों के लिए एक किफायती विकल्प बनता है।
  • आत्मनिर्भर भारत: यह स्वदेशी विकास रक्षा आयात पर निर्भरता कम करता है। भारत इस तकनीक को ऑपरेशनली तैनात करने वाला विश्व का पहला देश है।

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