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दुर्लभ फॉरेस्ट ऑउलेट (Rare Forest Owlet) | Ankit Avasthi Sir

Rare Forest Owlet

Rare Forest Owlet

संदर्भ:

हाल ही में कूनो नेशनल पार्क (Kuno National Park) में पहली बार अत्यंत दुर्लभ और संकटग्रस्त ‘फॉरेस्ट ऑउलेट’ (Forest Owlet) को देखा गया। इससे पहले मध्य प्रदेश में यह केवल खंडवा, बुरहानपुर और बैतूल जैसे पूर्वी जिलों तक ही सीमित माना जाता था।

फॉरेस्ट ऑउलेट के बारे में:

  • वैज्ञानिक नाम: Athene blewitti (पहले Heteroglaux blewitti)
  • खोज का इतिहास: 1872 में एफ.आर. ब्ल्यूइट द्वारा खोजा गया; 1884 के बाद इसे विलुप्त मान लिया गया था।
    • 113 वर्षों के बाद, 1997 में अमेरिकी पक्षीविज्ञानी पामेला रासमुसेन ने महाराष्ट्र के नंदुरबार में इसे फिर से खोजा।
  • दिवाचर (Diurnal): अधिकांश उल्लुओं के विपरीत, यह दिन में सक्रिय रहता है। यह सुबह 6 से 10 बजे के बीच सबसे अधिक सक्रिय होता है।
  • पहचान: यह देखने में ‘स्पॉटेड ऑउलेट’ जैसा लगता है, लेकिन इसके सिर (crown) पर धब्बे नहीं होते और इसके गले पर एक पूर्ण भूरा बैंड (collar) होता है।
  • लंबाई: यह लगभग 23 सेमी लंबा, छोटे और सुदृढ़ शरीर वाला पक्षी है।  इसके पंख और पूंछ पर सफेद पट्टियां (banding) प्रमुखता से दिखाई देती हैं।
  • आहार: यह मुख्य रूप से छिपकली, छोटे कृंतक (rodents) और कीड़े-मकोड़ों का शिकार करता है।
  • प्राकृतिक आवास: यह मध्य भारत के शुष्क पर्णपाती (dry deciduous) और सागौन (teak) के वनों में पाया जाता है।
    • वर्तमान में यह मुख्य रूप से महाराष्ट्र (मेलघाट, तानसा), गुजरात (डांग) और मध्य प्रदेश (खंडवा, कूनो) के खंडित वनों में पाया जाता है।
  • IUCN स्थिति: संकटग्रस्त (Endangered)।
  • कानूनी सुरक्षा: वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की अनुसूची-I (Schedule-I)।
  • CITES: परिशिष्ट-I (Appendix-I)

कूनो नेशनल पार्क (Kuno National Park)

  • स्थान: मध्य प्रदेश के श्योपुर और मुरैना जिलों में, विंध्य पहाड़ियों (Vindhyan Hills) के उत्तरी भाग में स्थित।
  • स्थापना: 1981 में वन्यजीव अभयारण्य के रूप में स्थापित; 2018 में इसे राष्ट्रीय उद्यान का दर्जा दिया गया।
  • नदी प्रणाली: इसका नाम कूनो नदी के नाम पर रखा गया है, जो पार्क के मध्य से बहती है और चंबल नदी की एक मुख्य सहायक नदी है।
  • वनस्पति: यहाँ मुख्य रूप से उष्णकटिबंधीय शुष्क पर्णपाती वन (Dry Deciduous Forests) पाए जाते हैं, जिनमें ‘करधई’ (Kardhai), ‘खैर’ और ‘सलई’ के वृक्ष प्रमुख हैं।
  • प्रोजेक्ट चीता: यह दुनिया की पहली अंतर्महाद्वीपीय विशाल मांसाहारी स्थानांतरण परियोजना का केंद्र है। फरवरी 2026 तक, बोत्सवाना से आए 9 नए चीतों के साथ यहाँ कुल संख्या 48 (28 भारत में जन्मे शावकों सहित) हो गई है।

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