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वैश्विक विकास वित्त का पुनर्निर्धारण (Rephasing global development finance) | Apni Pathshala

Rephasing global development finance

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Rephasing global development finance – 

संदर्भ:

भारत का वैश्विक दक्षिण (Global South) के साथ विकास सहयोग पिछले कुछ वर्षों में लगातार मजबूत होता गया है। यह सहयोग केवल आर्थिक सहायता तक सीमित नहीं, बल्कि क्षमता निर्माण, तकनीकी साझेदारी, अवसंरचना विकास और मानवीय सहायता जैसे विविध क्षेत्रों में फैला हुआ है। भारत की यह भूमिका उभरते हुए दक्षिण-दक्षिण सहयोग के एक विश्वसनीय और उत्तरदायी भागीदार के रूप में उसे स्थापित करती है।

वैश्विक दक्षिण के साथ भारत का विकास सहयोग:

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि:

  • 1955 बांडुंग सम्मेलन: भारत ने औपनिवेशिक मुक्ति और समानता की वकालत करते हुए अग्रणी भूमिका निभाई।
  • 1961 में गुटनिरपेक्ष आंदोलन (NAM) की स्थापना: भारत ने शीत युद्ध की ध्रुवीयता से अलग रहते हुए वैश्विक सहयोग का मार्ग चुना।
  • 1964 में G-77 की स्थापना: दक्षिण-दक्षिण सहयोग को बढ़ावा देने के लिए भारत ने विकासशील देशों के समूह के गठन में योगदान दिया।

आधुनिक भागीदारी और पहल:

  • G20 में अफ्रीकी संघ की सदस्यता का प्रस्ताव: भारत ने अफ्रीकी संघ को G20 में शामिल करने का प्रस्ताव रखा, जिसे 2023 दिल्ली समिट में स्वीकृति मिली — यह वैश्विक दक्षिण की आवाज को वैश्विक मंच पर सशक्त बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम था।
  • विकास सहयोग में वित्तीय वृद्धि:
    • 2010-11 में लगभग $3 अरब से बढ़कर
    • 2023-24 में $7 अरब तक भारत का सहयोग दोगुना हुआ।

वैश्विक दक्षिण के साथ भारत के सहयोग के प्रमुख माध्यम

  1. क्षमता निर्माण (Capacity Building):
  • भागीदार देशों में मानव संसाधनों के प्रशिक्षण, शिक्षा और कौशल विकास पर केंद्रित।
  • ITEC (Indian Technical and Economic Cooperation) जैसी योजनाओं के माध्यम से हजारों छात्रों और पेशेवरों को प्रशिक्षण।
  1. प्रौद्योगिकी हस्तांतरण (Technology Transfer): भारत अपनी नवाचार क्षमता, विशेषज्ञता, और कम लागत वाली तकनीकी समाधानों को वैश्विक दक्षिण के साथ साझा करता है। इसमें ई-गवर्नेंस, सौर ऊर्जा, टीकाकरण, अंतरिक्ष और कृषि तकनीक जैसे क्षेत्र शामिल हैं।
  2. बाजार तक पहुंच: विकासशील देशों को भारतीय बाजारों में ड्यूटी-फ्री और प्राथमिकता प्राप्त निर्यात पहुंच प्रदान की जाती है।
  • LDCs (Least Developed Countries) के लिए विशेष व्यापार प्रोत्साहन।
  1. अनुदान सहायता (Grants): बुनियादी ढांचे और सामाजिक क्षेत्र की परियोजनाओं के लिए बिना चुकौती वाली वित्तीय सहायता। इसमें स्कूल, अस्पताल, संसद भवन, जल आपूर्ति परियोजनाएं आदि शामिल होती हैं।
  2. रियायती वित्तपोषण: Indian Development and Economic Assistance Scheme के तहत कम ब्याज पर ऋण की पेशकश।
  • इन ऋणों का उपयोग सड़क, ऊर्जा, कृषि, और स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों में विकास परियोजनाओं के लिए किया जाता है।

वैश्विक दक्षिण के साथ भारत के सहयोग: प्रमुख चुनौतियाँ

  1. वैश्विक दक्षिण की प्रमुख समस्याएँ:
  • खाद्य असुरक्षा, कमज़ोर स्वास्थ्य अवसंरचना, ऋण संकट, संघर्ष एवं अस्थिरता जैसी समस्याएँ लगातार बनी हुई हैं।
  • वैश्विक नीतिनिर्धारण में निष्पक्ष प्रतिनिधित्व की कमी विकासशील देशों की आवाज़ को कमजोर करती है।
  1. बढ़ता वैश्विक ऋण संकट और भारत की पुनर्समीक्षा:
  • वैश्विक ऋण और तरलता संकट के चलते भारत अब Lines of Credit (LoCs) की भूमिका और प्रभावशीलता की पुनर्समीक्षा कर रहा है।
  • LoCs में जोखिम और लागत दोनों बढ़े हैं, जिससे भारत को सतर्क और रणनीतिक दृष्टिकोण अपनाना पड़ रहा है।
  1. पारंपरिक सहायता प्रदाताओं की चुनौतियाँ:
  • औपचारिक विकास सहायता (ODA) देने वाले देशों को बजट कटौती और घटते संसाधनों का सामना करना पड़ रहा है।
  • वैश्विक सहायता राशि में तेज गिरावट की आशंका —
    2023 में $214 अरब से घटकर 2024 में केवल $97 अरब तक।
  1. सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) पर प्रभाव:
  • SDGs को प्राप्त करने के लिए हर वर्ष $4 ट्रिलियन से अधिक की आवश्यकता है।
  • महंगा और अनिश्चित ऋण विकासशील देशों के लिए वित्तीय संसाधनों तक पहुंच को कठिन बना रहा है।
  • यह स्थिति 2030 तक SDGs को पूरा करने की दिशा में गंभीर बाधा बन सकती है।

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