SAMHiTA परियोजना: उद्देश्य, विशेषताएं एवं महत्व
संदर्भ:
हाल ही में भारत और श्रीलंका ने अपने साझा बौद्ध और सभ्यतागत संबंधों को मजबूत करते हुए कोलंबो के ऐतिहासिक गंगारामया मंदिर (Gangaramaya Temple) में सम्हिता परियोजना (SAMHiTA Project) के तहत प्राचीन पांडुलिपियों के डिजिटलीकरण का कार्य आधिकारिक रूप से शुरू किया।
सम्हिता परियोजना के बारे में:
- परिचय: मूल संकल्पना: SAMHiTA, भारत और व्यापक दक्षिण एशिया के उन प्राचीन हस्तलिखित ग्रंथों (Manuscripts) का एक रिलेशनल डेटाबेस (Relational Database) और डिजिटल संग्रह (Digital Archive) बनाने की अनूठी पहल है, जो वर्तमान में भारत की भौगोलिक सीमाओं से बाहर विदेशों के विभिन्न पुस्तकालयों और संग्रहालयों में बिखरे पड़े हैं।
- पूरा नाम: सम्हिता का पूर्ण रूप ‘साउथ एशियन मैनुस्क्रिप्ट हिस्टेरीज एंड टेक्स्चुअल आर्काइव’ (South Asian Manuscript Histories and Textual Archive) है।
- संस्कृत भाषा में इसका अर्थ ‘संग्रह’ या ‘संकलन’ होता है।
- कार्यान्वयनकर्ता संस्था: यह परियोजना नई दिल्ली स्थित इंडिया इंटरनेशनल सेंटर (India International Centre – IIC) के अंतर्राष्ट्रीय अनुसंधान प्रभाग द्वारा संचालित की जा रही है।
- सहयोगी मंत्रालय: इसे भारत सरकार के विदेश मंत्रालय (Ministry of External Affairs – MEA) का पूर्ण समर्थन और वित्तीय सहायता प्राप्त है।
- अंतर्राष्ट्रीय भागीदारी: इसके तहत वैश्विक स्तर पर ब्रिटिश लाइब्रेरी (U.K.), बोडलियन ऑक्सफोर्ड, बिब्लियोथेक नेशनेल डी फ्रांस (BnF Paris), टोक्यो विश्वविद्यालय और पेन्सिलवेनिया विश्वविद्यालय जैसे प्रतिष्ठित वैश्विक संस्थानों के साथ अकादमिक सहयोग किया गया है।
- परियोजना के मुख्य उद्देश्य (SAMHiTA Project Objectives):
- सूचना का एकीकरण: विभिन्न देशों और संस्थानों में बिखरी हुई दक्षिण एशियाई पांडुलिपियों की विस्तृत जानकारी को एक साझा डिजिटल प्लेटफॉर्म (Online Platform) पर समेकित करना।
- सांस्कृतिक कूटनीति: पड़ोसी देशों (जैसे श्रीलंका, नेपाल, भूटान, कंबोडिया) के साथ ऐतिहासिक और सभ्यतागत कूटनीतिक संबंधों को पुनर्जीवित करना।
- अकादमिक सुलभता: दुनिया भर के शोधकर्ताओं, इतिहासकारों और विद्वानों के लिए इन दुर्लभ प्राचीन ग्रंथों को एक ओपन-एक्सेस डिजिटल रिपॉजिटरी (Open-access Digital Repository) के माध्यम से सुलभ बनाना।
- प्रमुख विशेषताएं (SAMHiTA Project Features):
- सामग्री की विविधता: इस डेटाबेस में ताड़ के पत्ते (Palm Leaf), भोजपत्र (Birch Bark), ताम्रपत्र (Copper Plate) और चर्मपत्र (Parchment) पर लिखी गई प्राचीन पांडुलिपियों को शामिल किया जा रहा है।
- भाषाई और लिपि विस्तार: इसमें संस्कृत, तमिल, ओड़िया, बंगाली, पाली और अपभ्रंश जैसी प्राचीन भाषाओं तथा देवनागरी, ग्रंथ, शारदा, और नेवारी जैसी ऐतिहासिक लिपियों में रचित ग्रंथों का दस्तावेजीकरण किया जा रहा है।
- पंडित डेटाबेस से जुड़ाव (PANDiT Database): इस परियोजना के माध्यम से एकत्रित की गई समस्त अमूल्य जानकारियों को PANDiT (Prosopographical Database of Indic Texts and Records) पोर्टल पर साझा किया जा रहा है, जो दक्षिण एशियाई बौद्धिक इतिहास (South Asian Intellectual History) का एक व्यापक डिजिटल नक्शा तैयार कर रहा है।
- श्रीलंका चरण का विशेष आकर्षण: श्रीलंका का गंगारामया मंदिर (Gangaramaya Temple) इस परियोजना में भागीदार बनने वाला पहला विदेशी संस्थान बना है। यहाँ भारत के सहयोग से स्थानीय विशेषज्ञों द्वारा 100 से अधिक दुर्लभ बौद्ध पांडुलिपियों का डिजिटलीकरण किया जा रहा है जो नवंबर के अंत तक पूर्ण होगा।
भारत के लिए इसका महत्व:
- सांस्कृतिक महाशक्ति (Cultural Soft Power) के रूप में उभार: प्राचीन काल में (दूसरी-तीसरी शताब्दी ईस्वी से) भारतीय उपमहाद्वीप से ज्ञान ग्रंथ बाल्ख, शिनजियांग, तिब्बत, जापान, थाईलैंड और भूटान जैसे देशों में फैले थे।
- सम्हिता परियोजना के माध्यम से भारत अपने इस ऐतिहासिक ‘ज्ञान प्रसारक‘ (Knowledge Disseminator) के दर्जे को पुनः प्राप्त कर रहा है.
- भारत-श्रीलंका द्विपक्षीय संबंधों में प्रगाढ़ता: हिंद महासागर क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव के बीच, भारत श्रीलंका के साथ अपने साझा बौद्ध और सभ्यतागत संबंधों (Shared Buddhist and Civilisational Links) को इस परियोजना के जरिए एक नया रणनीतिक आयाम दे रहा है.
- उपनिवेशिक काल की सांस्कृतिक क्षति की भरपाई: 18वीं शताब्दी के बाद से बड़ी संख्या में भारतीय और दक्षिण एशियाई पांडुलिपियां औपनिवेशिक शासकों द्वारा पश्चिम (यूरोप और उत्तरी अमेरिका) ले जाई गईं।
- यह परियोजना भौतिक रूप से ग्रंथों को वापस लाए बिना डिजिटल माध्यम से भारत की बौद्धिक संपदा को वापस देश से जोड़ने का अनूठा डिजिटल मार्ग है।
- भारतीय ज्ञान प्रणाली (IKS) का पुनरुद्धार: आयुर्वेद (चिकित्सा), गणित, वास्तुकला, दर्शन और कला जैसे क्षेत्रों में भारत की प्राचीन वैज्ञानिक उपलब्धियों को दुनिया के सामने प्रामाणिक रूप से रखने में यह डिजिटल संग्रह (Digital Archive) मील का पत्थर सिद्ध होगा।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
प्रश्न 1: SAMHiTA Project क्या है और इसका पूरा नाम क्या है?
उत्तर: इसका पूरा नाम ‘साउथ एशियन मैनुस्क्रिप्ट हिस्टेरीज एंड टेक्स्चुअल आर्काइव’ (South Asian Manuscript Histories and Textual Archive) है। यह विदेशों में संरक्षित भारतीय और दक्षिण एशियाई पांडुलिपियों का एक डिजिटल संग्रह है।
प्रश्न 2: SAMHiTA Project का मुख्य उद्देश्य क्या है?
उत्तर: इसका मुख्य उद्देश्य दुनिया भर के विभिन्न पुस्तकालयों और संग्रहालयों में बिखरी हुई प्राचीन पांडुलिपियों (Manuscripts) की जानकारी को एक साझा और सुलभ ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर समेकित करना है।
प्रश्न 3: SAMHiTA Digital Archive में किस तरह की Manuscripts को शामिल किया जाता है?
उत्तर: इसमें चिकित्सा, दर्शन, गणित, बौद्ध धर्म और साहित्य से संबंधित उन प्राचीन हस्तलिखित ग्रंथों को शामिल किया जाता है जो ताड़ के पत्तों, भोजपत्रों या ताम्रपत्रों पर विभिन्न लिपियों में लिखे गए हैं।
प्रश्न 4: SAMHiTA Project का PANDiT Database से क्या संबंध है?
उत्तर: साम्हिता परियोजना के माध्यम से खोजी और डिजिटाइज़ की गई पांडुलिपियों की सभी प्रामाणिक ऐतिहासिक कड़ियों तथा डेटा को PANDiT (Prosopographical Database of Indic Texts and Records) नामक वैश्विक डेटाबेस पर होस्ट किया जाता है।
प्रश्न 5: Indian Cultural Heritage और Ancient Manuscripts के संरक्षण में SAMHiTA की क्या भूमिका है?
उत्तर: यह प्राचीन भारतीय ज्ञान विरासत (Indian Knowledge Heritage) को नष्ट होने से बचाती है, औपनिवेशिक दौर में विदेशों में बिखरी कड़ियों को जोड़ती है और डिजिटल कूटनीति के माध्यम से भारत के पड़ोसी देशों से संबंध प्रगाढ़ करती है।
